24 न्यूज अपडेट, उदयपुर। रावत उपनाम को जातिसूचक व्याख्या कर अनुसूचित जनजतियों के संवैधानिक हक छीनते हुए भील/भील-मीणा/मीणा को अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में दर्ज करने के विरूद्ध सांसद मन्त्रा लाल रावत द्वारा उठाए गए मामले में अभी तक कोई रिपोर्ट नहीं देने पर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव सहित उदयपुर व चित्तौडगढ कलेकटर को कडी फटकार लगाई है और 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए हैं।आयोग ने चेतावनी दी है कि 15 दिनों में उत्तर प्राप्त नहीं होता है तो आयोग भारत के संविधान के अनुच्छेद 338क के अंतर्गत सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग कर सकता है। साथ ही व्यक्तिगत या प्रतिनिधि के माध्यम से आयोग के समक्ष उपस्थित होने के लिए समन भी जारी कर सकता है।रावत उपनाम की जातिसूचक व्याख्या कर अनुसूचित जनजतियों के संवैधानिक हक छीनते हुए भीलों, भील-मीणा को जबरन अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में दर्ज करने को लेकर उदयपुर सांसद डॉ. मन्त्रा लाल रावत द्वारा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को शिकायत की गई थी। इस पर आयोग ने राजस्थान के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर इस संबंध में कार्रवाईयों को लेकर जवाब मांगा था। कलेक्टर, उदयपुर व चित्तौडगढ से भी इस संबंध में जवाब मांगा गया, लेकिन किसी ने भी इसको गंभीरता से नहीं लिया। इस पर आयोग ने अब सख्त रवैया अपनाया है।सांसद मन्नालाल रावत ने अपनी शिकायत में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष को लिखे पत्र में बताया था कि भीलों को जबरन ओबीसी वर्ग की श्रेणी में दर्ज करने का गोरखधंधा कई सालों से किया जा रहा है, जिसमें जनजाति समाज के भोले भाले लोगों की जमीनें हडपी जा रही है। कांग्रेस कार्यकाल में इसको संवैधानिक बनाने के लिए आदेश भी जारी कर दिए गए जो कि पूर्णतया गलत है। केवल अनुसूचित जनजाति की संपत्ति हडपने के इरादे से ये कृत्य किए गए।सांसद रावत ने उन्हें कानोड निवासी भैरूलाल मीणा से प्राप्त परिवाद का उल्लेख करते हुए आयोग को बताया कि राज्य के जिला उदयपुर एवं चित्तौड़गढ़ क्षेत्र के राजस्व अथवा सक्षम अधिकारियों द्वारा अनुसूचित जनजाति के क्रमांक 1 पर दर्ज भील समाज में परम्परागत पदवी रावत भी है, के आधार पर बड़ी संख्या में इस समाज के लोगो को अनुसूचित जनजाति के संवैधानिक अधिकार यथा कृषि भूमि को अन्य श्रेणी के लोगों को अवैध रूप से बेचान किया जा रहा है। साथ ही इस प्रक्रिया में नियोजन, शिक्षा व राजनीतिक पदों के लिए संवैधानिक आरक्षण सम्बन्धित प्रावधान का भी गम्भीर हनन किया है।सांसद रावत ने स्पष्ट किया कि यह सभी जानते हैं कि दक्षिण राजस्थान के भीलों में गांवों के परम्परागत मुखिया को गमेती, पटेल, गड्डा या रावत कहा जाता है, जिसकी पेसा कानून, 1996 में संवैधानिक मान्यता भी है, परन्तु रावत शब्द के इस सांस्कृतिक पक्ष का समान रूप से उच्चारित अन्य अर्थ में प्रयुक्त कर संवैधानिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में क्षेत्रवासियों द्वारा अवगत कराया है कि यह कार्य पूर्व में कांग्रेस के नेता गुलाब सिंह शक्तावत जब राज्य सरकार में गृहमंत्री थे, तब इस क्षेत्र के भोले-भाले भीलों को बरगलाकर सत्ता का दुरूपयोग कर राज्य सरकार से भीलों में परम्परागत रावत पदवी को रावत (अन्य पिछड़ा वर्ग) में जाति रूप में दर्ज कराने के सम्बन्ध में कुछ सरकारी आदेश भी जारी करवाए गये। जबकि यह संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत राष्ट्रपति द्वारा अनुसूचित जनजाति को परिभाषित करने के सम्बन्ध में जारी लोक अधिसूचना तथा भारत सरकार द्वारा लौकुर समिति, 1965 की अनुशंसा के अनुरूप अनुसूचित जनजाति को परिभाषित करने के लिए जारी एवं शासन में सुस्थापित 5 मानदंडों के पूर्णतः विपरीत होकर दनका संवैधानिक हक छीनने वाला है।सांसद ने अपने पत्र में बताया कि यह एक आपराधिक षडयंत्र है, जो स्थानीय जनजातियों की आजीविका का एकमात्र आधार कृषि भूमि को हड़पने एवं इस अनुसूचित जनजाति के शिक्षा, सार्वजनिक रोजगार व राजनीति में आरक्षण के संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने के एक खतरनाक टूल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।क्षेत्रवासियों द्वारा अवगत कराया गया कि इस प्रक्रिया में पूर्व में इस क्षेत्र में भील समाज के 2-3 लोगों से भोलेपन का लाभ उठाकर स्टाम्प पर यह लिखावकर कि वे रावत है, इस सर्कुलर को अन्य क्षेत्रों में अवैधानिक तरीके से भीलों के सम्बन्ध में जबरन लागू कर दिया गया। उनके द्वारा यह नहीं बताया गया कि रावत लिखने से उनकी श्रेणी अनुसूचित जनजाति से अन्य पिछड़ा वर्ग हो जाएगी।इस प्रकार संवैधानिक सुरक्षा एवं विधिक लाभ से मेवाड के हजारों भील/भील मीणा परिवारों को वंचित कर दिया गया, जो एक बहुत बड़ा षडयन्त्र है। यह अनुसूचित जनजाति के संवैधानिक हक से वंचित करना है. जो बाद में एक राजनीतिक हथकंडा बन गया है।सांसद रावत ने अपने पत्र में आयोग को तथ्यों सहित बताया कि राजस्थान सरकार का एक परिपत्र संख्या प. 5/8/राज-4/83/राज-6/15 दिनांक 1 नवंबर 1996 इस प्रकार जारी किया गया कि भू-अभिलेख रिकॉर्ड में मीणा जाति शब्द के स्थान पर जबरन रावत जाति शब्द लिखाया जाकर अनुसूचित जनजाति के हजारों सदस्यों को अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में जबरन डाल दिया गया, जिससे इन लोगों को आरक्षण सहित कृषि भूमि सम्बन्धी वैधानिक सुरक्षा को भी भारी हानि पहुंचाई गई। तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दबाव में जिला कलक्टर उदयपुर द्वारा आदेश क्रमांक एफ 12/7/1/राज/97/4236-52 दिनांक 11 सितंबर .2000 द्वारा रावत उपनाम वाले भीलों के भू-अभिलेख में रावत अन्य पिछड़ा वर्ग दर्ज करने के लिए अभियान के तौर पर निपटाने के निर्देश भी दिये जो इस षड़यंत्र का स्पष्ट खुलासा करता है।सांसद रावत ने आयोग को इस संबंध में कुछ सत्यापित जमाबन्दी खाते की नकल की प्रतिलिपि भी प्रस्तुत की है। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) 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