Site icon 24 News Update

वन विभाग के अधिकारियों को चढ़ा सरकारी वाहनों पर लाल- नीली बत्ती लगाने का शौक, आरटीआई में पूछा तो बताया- जीरो

Advertisements

आरटीआई एक्टिविस्ट समाजसेवी जयवंत भैरविया की रिपोर्ट

24 न्यूज अपडेट उदयपुर। वीआईपी रुतबा दिखाने , आम जनता पर अपने अधिकारी होने का धौंस मारने और टोल बचाने के लिए कई प्रशासनिक अधिकारी जिन्हें लोक सेवक या जनता के सेवक कहना अधिक उचित है इनमें से ही कई छोटे बड़े “ सरकारी अधिकारी “ अपने निजी अथवा सरकारी वाहनों पर लाल नीली बत्ती और सायरन लगाकर, नम्बर प्लेट पर लाल पट्टी लगाकर एवं भारत सरकार / राजस्थान सरकार लिखवा वीआईपी रुतबा दिखा धौंस मारते है, ताकि लोग उनसे डरें और टोल नाकों पर टोल भी न देना पड़े। कई अधिकारी तो निजी या सरकारी वाहन पर नीली बत्ती के सहारे विदेशी शराब की दुकानों पर अपना रुतबा दिखा मुफ्त की शराब का मजा भी ले रहे हैं। जबकि इन्हें लगाने का इन्हें अधिकार नही है। आरटीआई में वन विभाग के अधिकारियों पर लाल-पीली बत्ती लगाने पर जब सवाल पूछा गया तो जवाब आया शून्य।
ये कर सकेंगे नीली बत्ती का उपयोग
11 जुलाई, 2006 और इसके बाद जारी अधिसूचना के तहत कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए ड्यूटी के दौरान संभागीय आयुक्त, जिला मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट एवं उपखंड मजिस्ट्रेट नीली बत्ती लगा सकेंगे। ये लोग बत्ती का उपयोग घर से ऑफिस के दौरान नहीं लगा सकेंगे। सिर्फ कानून व्यवस्था के दौरान लग सकेंगे। बाकी समय बत्ती को ढकी रहेगी। वहीं गश्ती ड्यूटी, एस्कॉर्ट, पायलेट, आपात स्थिति नियंत्रण या कानून व्यवस्था के लिए पुलिस, आबकारी, परिवहन विभाग और अग्निशमन वाहन नीली बत्ती लगा सकेंगे। बैंगनी रंग के कांच से ढकी लाल बत्ती का उपयोग एम्बुलेंस के लिए कर सकेंगे।
ये लगा सकेंगे फ्लैशर वाली लालबत्ती
राज्यपाल, मुख्यमंत्री, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व न्यायाधीश, विधानसभा अध्यक्ष, कैबिनेट मंत्री, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष, पूर्व मुख्यमंत्री।
ये बिना फ्लैशर वाली लालबत्ती लगा सकेंगे
राजस्थान विधानसभा के उपाध्यक्ष, राज्य मंत्री, एडवोकेट जनरल, उप मंत्री, मुख्य सचिव, राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष। परंतु अगर चेकिंग अभियान छेड़ा जाए तो नियम विरुद्ध कई अधिकारी इस नीली बत्ती का दुरुपयोग करके कानून का खुला उल्लंघन कर रहे हैं। कानून सबके लिए बराबर है सिर्फ अपना वीआईपीपन बरकरार करने के लिए यह नीली बत्ती लगाकर आम जनता पर रुआब गांठने का काम करते हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्र में भी जब ऐसे अधिकारी जाते हैं तो जनता भयभीत हो जाती है और वह सही बात को भी इन अधिकारियों के सामने नहीं रख पाती। इतना ही नहीं इनके वाहनों में पर्याप्त पुलिस बल से लेकर पूरा तामझाम रहता है जिसकी वजह से जो विकास की योजनाएं चलाई जा रही हैं और जिनका सत्यापन इन्हीं अधिकारियों को करना है वह सिर्फ खा-खा-खैया तक ही सीमित होकर रह जाती हैं। जनहित में ऐसे अधिकारी अगर कानून का खिलवाड़ करेंगे तो आम जनता से क्या अपेक्षा रखी जा सकती है। हालांकि, लाल और नीली बत्ती का दुरुपयोग लगभग सभी विभागों में किया जा रहा है। छोटे अधिकारियों से लेकर राजस्थान के लगभग सभी अधिकारी केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना का उल्लंघन कर रहें हैं। तो ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किससे उम्मीद की जाए
नियम क्या है
वर्तमान में अवैध रूप से लाल या नीली बत्ती लगाने पर मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 177 के तहत 100 से 300 रुपए तक का जुर्माना करने और बत्ती हटाने का प्रावधान है। इसके साथ ही बत्ती का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध आरोप साबित होने पर सीसीए नियम 17/16 के अंतर्गत कार्रवाई होती है।
अवैध रूप से बत्ती लगाने पर कार्रवाई
अवैधरूप से लाल या नीली बत्ती का उपयोग करने पर मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 177 के तहत अधिकारियों और कर्मचारियों के विरूद्व सीसीए नियम 17/16 के तहत कार्रवाई होती है। दोनों में जांच कमेटी गठित की जाती है। इसमें 17 सीसीए में आरोप साबित होने पर वेतन वृद्धि, 16 सीसीए में सेवामुक्त एवं वेतन वृद्धि रोकी जा सकती है। इसके अतिरिक्त 100 से 300 रुपए तक का जुर्माना किया जा सकता है।
यहां पर लाल बत्तियों का जंक्शन
शहर का चेटक सर्कल स्थित उप वन सरंक्षक कार्यालय का भवन वर्षो पुराना है। लेकिन अधिकारियों को मिले हुए महँगे वाहन परिसर में भरमार में नजर आते है। वाहनों पर लगी हुई लाल नीली बत्तियों के साथ वाहनों पर लिखें भारत सरकार / राजस्थान सरकार , वाहनों की हाई सिक्योरिटी नम्बर प्लेट पर लगी लाल रंग की पट्टी और उस पर भी भारत सरकार लिखा हुआ नजर आता है। हाई सिक्योरिटी नम्बर प्लेट पर लगी लाल रंग की पट्टी तो वाहन के सरकारी होने का प्रमाणपत्र बन गया है। लेकिन अब अधिकारी के नाम व पदसूचक नेम प्लेट अगर नम्बर प्लेट के साथ न लगाई जाए तो फायदा ही क्या है ?, अगर प्लेट न हुई तो सड़को पर वीआईपी अनुभूति कैसे आएगी ? सड़क परिवहन औए राजमार्ग मंत्रालय भारत सरकार द्वारा दिनाँक 23 जून 2017 को निकाली गई अधिसूचना में भाग सस खण्ड 3 व उपखंड 1 के बिंदु संख्या 36 के अनुसार रजिस्ट्रीकृत प्लेटो पर रजिस्ट्रेशन नम्बर के अतिरिक्त कोई भी अक्षर,शब्द, आकृति, चित्र या प्रतीक चिन्ह गढ़े अथवा लिखें नही जा सकते। लेकिन गजट नोटिफिकेशन की पालना करना टप्च् अनुभूति के मार्ग में रुकावट डालती है इसलिए नियमों कानूनों को जानने के बावजूद गजट नोटिफिकेशन का जमकर उल्लंघन वन विभाग के अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है।
आवेदन पर वन विभाग ने दिया हास्यास्पद व विधिविरुद्ध जवाब
चाही गई सूचना :-
(1) ऑनलाइन आवेदन संख्या 224236317053256 दिनाँक 18 जनवरी 2024 पर वन विभाग द्वारा आज दिन तक चलाई गई सम्पूर्ण नोटशीट की सत्यापित सूचना प्रदान की जाए।
(2) ऑनलाइन आवेदन संख्या 224236317053256 दिनाँक 18 जनवरी 2024 में वन विभाग द्वारा दिनाँक 19 फरवरी 2024 को सूचना देने की जगह ऑनलाइन प्रेषित जवाब पर शून्य सूचना लिख कर हस्ताक्षर करने वाले उप वन सरंक्षक / लोक सूचना अधिकारी के नाम पते व मोबाइल नंबर की सत्यापित सूचना प्रदान की जाए।
(3) वन विभाग के उन समस्त अधिकारियों के नाम व पदनाम की सत्यापित सूचना प्रदान की जाए जिन्हें सूचना के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों की जानकारी है
(4) वन विभाग के उन अधिकारियों के नाम व पदनाम की सूचना प्रदान की जाए जिन्हें अपने वाहनों की हाई सिक्योरिटी नम्बर प्लेट पर लाल पट्टी एवं अन्य पद सूचक नाम की अतिरिक्त प्लेट लगाने के अधिकार व शक्तियां प्राप्त है
वन विभाग ने दिया जवाब :-
बिंदु संख्या 2 की सूचना को बताया प्रश्नात्मक व बिंदु संख्या 3 व 4 की सूचना को बताया शून्य
उल्लेखनीय है कि हस्ताक्षर के नीचे नाम की मोहर या नाम का अंकन के सम्बंध में राजस्थान सरकार के प्रशासनिक सुधार (ग्रुप-1) विभाग के परिपत्र कमांक : प.10 (1) प्र.सु./सम. / अनु-1/2012 जयपुर दिनांक 11.12.2020 अवलोकनीय है जिसके अनुसार समस्त सरकारी अधिकारी / कार्मिको द्वारा जब भी कही हस्ताक्षर किये जो तो अपने हस्ताक्षर के नीचे अपना पूरा नाम, दिनांक एवं पदनाम आवश्यक रूप से अंकित करने का निर्देश दिया गया है।
बावजूद इसके वन विभाग के उच्चाधिकारियों द्वारा विभाग से जारी होने वाले पत्रों पर नाम व पदनाम की मोहर नहीं लगाई जाती ,चूँकि अधिकांश बार उनके द्वारा दिये गए जवाब संदेहास्पद होने के साथ ही गुमराह करने वाले होते हैं इसलिए उन अधिकारियों के विरुद्ध भविष्य में की जा सकने वाली विधिक कार्यवाही होने के भय से वे अपना नाम पत्र पर हस्ताक्षर करते समय नही लिखते यहाँ तक कि त्ज्प् में पूछे जाने पर भी सूचना को प्रश्नात्मक बता पल्ला झाड़ने का प्रयास करते है।
यह था सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीमकोर्ट ने 10 दिसंबर,13 को केंद्र सरकार द्वारा 11 जनवरी, 2002 एवं 25 जुलाई, 2005 को जारी अधिसूचना को उचित मानते हुए राज्य सरकार को उसी के अनुरूप संशोधित अधिसूचना जारी करने के निर्देश दिए थे। वहीं कोर्ट ने मल्टीटोन हॉर्न तथा अन्य सायरन हूटर के अनधिकृत उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए थे। इस आधार पर विभाग ने 11 जुलाई, 2006 में जारी अधिसूचना में संशोधन कर नई अधिसूचना जारी की।
मई 2017 को केंद्र सरकार ने किया था लागू
बता दें कि 19 अप्रैल 2017 को केंद्र सरकार ने 1998 की मोटर वाहन नियमावली के नियम 108 (1-तृतीय) और 108 (2) में संशोधन किया था। वहीं 1 मई 2017 को इसको लागू कर दिया गया था। भारत के तत्कालीन वित्त मंत्री स्वर्गीय अरुण जेटली ने कहा था कि लाल बत्ती पूरी तरह बैन रहेगी, मगर नीली बत्ती इमरजेन्सी वाहनों पर लगेगी।

Exit mobile version