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ममता कुलकर्णी के महामंडलेश्वर बनने पर विवाद, सीधे पदवी देने पर नाराजगी

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24 न्यज अपडेट, नेशनल डेस्क। पूर्व अभिनेत्री ममता कुलकर्णी के किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर बनने के फैसले ने सामाजिक और धार्मिक हलकों में चर्चा और विवाद को जन्म दिया है। इस परंपरा को लेकर संत समाज के विभिन्न पक्षों ने भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएं दी हैं। शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप महाराज ने किन्नर अखाड़े को मान्यता देना “महापाप” बताया है। ममता के चयन को सनातन धर्म के खिलाफ और अनुशासनहीनता का प्रतीक कहा है। दावा किया कि ममता कुलकर्णी का नाम व्यापार के लिए इस्तेमाल होगा। सुझाव दिया कि स्त्री के लिए संन्यास उचित नहीं है। अखाड़ा परिषद अध्यक्ष रविंद्र पुरी ने ममता को आशीर्वाद देते हुए कहा कि वैराग्य कभी भी किसी पर आ सकता है। पूर्व जीवन को महत्व न देते हुए ममता को धर्म प्रचार में योगदान देने की सलाह दी। आगाह किया कि महामंडलेश्वर का पद सिर्फ नाम के लिए न हो। जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने किसी को भी संन्यास लेने का अधिकार होने की बात कही। किन्नर अखाड़े को निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी। निरंजनी आनंद अखाड़ा की ओर से बताया गया कि महामंडलेश्वर बनने की प्रक्रिया में योग्यता और धर्म प्रचार के कार्यों की जांच पर जोर दिया। महामंडलेश्वर बनने की प्रक्रिया और परंपराएं, अखाड़ों की स्वायत्ततारू प्रत्येक अखाड़ा स्वतंत्र रूप से अपने नियम बनाता है। किसी व्यक्ति के धर्म प्रचार, राष्ट्रहित और सामाजिक कार्यों में योगदान को आधार बनाया जाता है। किन्नर अखाड़ा 2019 में मान्यता प्राप्त इस अखाड़े के पास अपने फैसले लेने का अधिकार है। विवाद की जड़ ममता कुलकर्णी का अतीत है जिसमें ड्रग्स के मामलों में विवादित पृष्ठभूमि होने के कारण यह निर्णय अधिक चर्चित हो गया। धार्मिक परंपराओं का उल्लंघनरू पारंपरिक अखाड़ों का मानना है कि इस तरह के चयन से सनातन धर्म की गरिमा को नुकसान पहुंच सकता है। आधुनिकता बनाम परंपरा की बात सोचें तो किन्नर अखाड़े द्वारा नए दृष्टिकोण अपनाने से पारंपरिक अखाड़ों में मतभेद है। कहा जा सकता है कि ममता कुलकर्णी के महामंडलेश्वर बनने का निर्णय सनातन परंपराओं और सामाजिक धारणाओं के बीच एक नई बहस का कारण बना है। जहां कुछ इसे धार्मिक परंपरा के आधुनिक विस्तार के रूप में देख रहे हैं, वहीं कुछ इसे धर्म का व्यापारिक उपयोग मानते हैं। यह विवाद धर्म और समाज में बदलाव के बढ़ते प्रभावों का प्रतीक है।

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