
24 न्यूज अपडेट. नेशनल डेस्क। प्रयागराज महाकुंभ में राजस्थान के मेवाड़ के स्वामी हितेश्वरानंद सरस्वती महाराज को महामंडलेश्वर की उपाधि दी गई। यह मेवाड़ क्षेत्र के किसी संत का पहला ऐसा अवसर है, जब उन्हें इस प्रतिष्ठित सनातन परंपरा के पद पर आसीन किया गया है। 26 जनवरी को माघ माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी के दिन, श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी ने स्वामी हितेश्वरानंद को महामंडलेश्वर की उपाधि दी। वैदिक मंत्रोच्चार, दूध और गंगाजल से अभिषेक के बाद माला और चादर ओढ़ाकर उनका सम्मान किया गया। इसके बाद एक भव्य भंडारे का आयोजन हुआ।
महानिर्वाणी अखाड़े के बारे में बाएं तो यह अखाड़ा भारत का दूसरा सबसे बड़ा अखाड़ा है, जिसकी स्थापना लगभग 1200 साल पहले हुई थी। अखाड़े में शामिल होने और महामंडलेश्वर बनने के लिए कठोर प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है। कटावला मठ और स्वामी हितेश्वरानंद का योगदान अभूतपूर्व है। कटावला मठ का इतिहास देखें तो महाराणा प्रताप की निर्वाण स्थली चावंड में स्थित यह मठ लगभग 550 साल पुराना है। स्वामी हितेश्वरानंद सरस्वती महाराज, जिन्हें पहले घनश्याम बावजी के नाम से जाना जाता था, इस मठ के पीठाधीश्वर हैं। स्वामी हितेश्वरानंद का जन्म पाली जिले के सुमेरपुर के पास चाणोद गांव में श्रीमाली ब्राह्मण परिवार में हुआ। ब्रह्मचारी जीवन से सीधे संन्यास मार्ग पर अग्रसर हुए। उनके गुरु स्वामी दुर्गेशानंद सरस्वती महाराज ने उन्हें संन्यास दीक्षा दी और नामकरण किया। स्वामी हितेश्वरानंद ने कोरोना काल में अपनी संपत्ति आदिवासी कल्याण के लिए दान कर दी। वे समाज कल्याण और धर्म प्रचार के प्रति समर्पित हैं। महामंडलेश्वर सनातन धर्म के प्रचार, धर्म परंपराओं के पालन और मानवता को सही मार्ग दिखाने का कार्य करते हैं। उनके नेतृत्व में समाज के आध्यात्मिक और सामाजिक विकास का मार्ग प्रशस्त होता है। स्वामी हितेश्वरानंद सरस्वती महाराज का यह सम्मान न केवल राजस्थान बल्कि पूरे सनातन समाज के लिए गौरव का विषय है।
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