Site icon 24 News Update

नाथद्वारा में श्रीनाथजी मंदिर की होली का डंडारोपण, फाग उत्सव का हुआ शुभारंभ

Advertisements

24 न्यूज अपडेट. नाथद्वारा। पुष्टिमार्ग की प्रधानपीठ श्रीनाथजी मंदिर, नाथद्वारा में परंपरागत रूप से होली का डंडा रोपण किया गया। इसके साथ ही मंदिर परिसर में फाग उत्सव का शुभारंभ हो गया। बुधवार देर शाम होली मंगरा स्थित होलिका दहन स्थल पर विशेष पूजा-अर्चना के पश्चात यह विधि संपन्न हुई। इस अवसर पर भक्तों ने उल्लासपूर्वक कीर्तन और होली की धमाल में भाग लिया। साथ ही, माघ पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्रीजी प्रभु का विशेष अलौकिक श्रृंगार भी किया गया, जिसने भक्तों को दिव्य आनंद की अनुभूति कराई। श्रीनाथजी मंदिर की परंपरा के अनुसार, मुख्य प्रवेश द्वार से होली का डंडा उठाकर सेवकगण कीर्तन करते हुए नगर में शोभायात्रा के रूप में मंदिर मार्ग, लाल बाजार, केशव कॉम्प्लेक्स, फौज मोहल्ला होते हुए होली मंगरा पहुंचे। इस दौरान विभिन्न स्थानों पर बंदूकों की सलामी देकर इस शुभ अवसर का सम्मान किया गया। नाथद्वारा की यह विशाल होली मेवाड़ की सबसे बड़ी होली मानी जाती है, जिसे 108 कांटों की गठरियों से तैयार किया जाता है। यह संरचना लगभग दो मंजिला भवन जितनी ऊंची होती है और इसके निर्माण में एक माह का समय लगता है। इस अवसर पर खर्च भंडार के भंडारी, मंदिर के पंड्या परेश नागर, परछना मुखिया, मशालची एवं अन्य वरिष्ठ सेवक उपस्थित रहे।
होली का डांडाः परंपरा, महत्व और धार्मिक मान्यता
होली का रंगों से भरा उत्सव केवल एक दिन तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसकी तैयारियां हफ्तों पहले से शुरू हो जाती हैं। इन्हीं तैयारियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है होली का डांडा रोपने की परंपरा। हालांकि यह परंपरा शहरों में धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है, लेकिन गांवों और कस्बों में आज भी इसे पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाया जाता है। होली का डांडा होलिका दहन की शुरुआती प्रक्रिया का प्रतीक है। इसे भक्त प्रहलाद और उनकी बुआ होलिका की कथा से जोड़ा जाता है। गांवों और कस्बों में किसी प्रमुख स्थानकृ जैसे चौक, चौराहा या मंदिर परिसरकृपर दो डांडे रोपे जाते हैं, जो आमतौर पर सेम के पौधे से बनाए जाते हैं। यह डांडा सुरक्षित रखा जाता है, जो सत्कर्म, भक्ति और विजय का प्रतीक होता है। इसे होली की अग्नि में भस्म कर दिया जाता है, जो अधर्म और अन्याय के अंत को दर्शाता है।

Exit mobile version