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बेटी को विदाई में कार दो या न दो, संस्कार अवश्य दें : राष्ट्रसंत पुलक सागर महाराज

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ज्ञान गंगा महोत्सव के चौथे दिन राष्ट्रसंत ने कहा – बेटियों को केवल डिग्रियों नहीं, जीवन जीने की कला भी सिखाएं


24 News Update उदयपुर, 23 जुलाई। टाउन हॉल नगर निगम प्रांगण में चल रहे 27 दिवसीय ज्ञान गंगा महोत्सव के चौथे दिन राष्ट्रसंत आचार्य श्री पुलक सागर महाराज ने हजारों श्रद्धालुओं के समक्ष अत्यंत मार्मिक और यथार्थपरक प्रवचन दिए। उन्होंने कहा कि वर्तमान समाज में बेटियों को केवल आधुनिकता की ओर धकेलने के बजाय उन्हें जीवन जीने की मूल कला, सहनशीलता, धैर्य, ममता और त्याग का पाठ सिखाना आवश्यक है।

“परिवार में कपड़े नहीं, मन मैचिंग करें”
आचार्य श्री ने कहा कि – “आजकल परिवारों में त्योहारों या कार्यक्रमों में मैचिंग कपड़े पहनने का चलन हो गया है, लेकिन मन एक-दूसरे से नहीं मिलते। अगर मनों में सामंजस्य हो जाए तो परिवार स्वर्ग बन जाए।”
उन्होंने कहा कि धर्म केवल मंदिरों या तीर्थों तक सीमित नहीं है, बल्कि “घर को तीर्थ बनाना” ही सच्ची धार्मिकता है। जब घर में प्रेम, ममता, आदर, और समझ का वातावरण होता है, तो ईश्वर भी वहीं वास करते हैं।

बेटियों की परवरिश में मां और बाप दोनों की बड़ी भूमिका
राष्ट्रसंत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बेटियों के संस्कार गढ़ने की जिम्मेदारी मां-बाप दोनों की है। “मां जितना स्नेह देती है, पिता उतनी ही छांव देता है। लेकिन अक्सर मां बेटियों को सिर्फ सुख की कल्पनाएं देती है, कठिनाइयों के लिए तैयार नहीं करती।”
उन्होंने कहा कि जो मां अपनी बेटी से कहती है कि “कुछ भी हो, मुझे बताना”, वह अनजाने में उसके ससुराल को तोड़ने का बीज बो रही है। वहीं वह मां जो बेटी से कहती है “हर परिस्थिति में खुद को संभालना सीख”, वही उसकी सच्ची मार्गदर्शिका है।

“सास की डांट सहो, मां की गोद हमेशा नहीं मिलती”
आचार्य श्री ने कहा कि जब बेटी पीहर में अधिक दिन रहने लगती है, तो मोहल्ले में बातें बनती हैं। “बेटी के लिए मां की गोद आरामदायक होती है, लेकिन जीवन की सच्ची परीक्षा ससुराल में होती है।”
उन्होंने बेटियों को समझाते हुए कहा कि – “सास की गालियां सहेजना सिखो, क्योंकि घर वही होता है जो थोड़ा कठिन हो, पर अपना होता है।”

“संस्कारों का कोई विकल्प नहीं”
उन्होंने एक बार फिर दोहराया – “कार दी या नहीं, गहने दिए या नहीं, ये मायने नहीं रखता; बेटी को संस्कार दिए या नहीं – यही सबसे बड़ा प्रश्न है।”
साथ ही उन्होंने आधुनिक समाज की प्रवृत्तियों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि – “आज की शिक्षा व्यवस्था केवल किताबी ज्ञान दे रही है, लेकिन व्यवहारिक जीवन के लिए जरूरी सहनशीलता, संवाद, और समर्पण की शिक्षा नहीं दे रही।”

“अगर बेटी ससुराल को स्वर्ग बनाना चाहे, तो वह बन सकता है”
प्रवचन में जब उन्होंने संत के मंत्र वाली कथा सुनाई, तो पूरे पंडाल में भावुकता और मौन छा गया। उन्होंने बताया कि – “किसी भी घर को स्वर्ग या नरक बनाना उस घर में रहने वाली स्त्री के व्यवहार पर निर्भर करता है।”
जो महिला प्रेम, आदर और सेवा भाव से घर में रहती है, वही सबसे बड़ी देवी होती है।

नगर के गणमान्यजन रहे उपस्थित
कार्यक्रम में पूर्व विधायक प्रीति गजेंद्र शक्तावत, यूडीए कमिश्नर राहुल जैन, महेन्द्र टाया, अरुण मांडोत, गिरीश जोशी, अरविंद चौधरी, पवन प्रधान आदि अतिथियों ने धर्मसभा में भाग लिया।
अनिल सिपरिया परिवार ने पाद प्रक्षालन, सुनील सिपरिया परिवार ने शास्त्र भेंट की। गायरियावास बहुमंडल द्वारा मंगलाचरण प्रस्तुत किया गया।

हजारों की संख्या में जुटे श्रद्धालु
राजकुमार फत्तावत, प्रकाश सिंघवी, विप्लव कुमार जैन, पारस सिंघवी, नीलकमल अजमेरा, शांतिलाल मानोत, शांतिलाल नागदा, शांतिलाल भोजन, आदिश खोडनिया सहित उदयपुर, डूंगरपुर, सागवाड़ा, साबला, बांसवाड़ा, धरियावद, भीण्डर, कानोड़ सहित विभिन्न क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु कार्यक्रम में उपस्थित रहे और राष्ट्रसंत की वाणी से जीवन दर्शन का लाभ लिया।

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