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जाने तुझे देंगे नहीं…. राठौड़ के बयान ने फिर राजनीति का अलाव सुलगाया, बोले-मालवीया हमारे आदमी

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उदयपुर। बयानों के अलाव एक बार फिर शाम ढलते ही सुलग उठे हैं। सवाल वही है – छापे में क्या मिला, क्या नहीं मिला? महेंद्रजीत सिंह मालवीया पूछ रहे हैं कि सरकार यह तो बताए कि एसीबी की कार्रवाई का अंजाम क्या हुआ। जनता को भी बताया जाए कि छापे के बाद हासिल क्या हुआ।

दूसरी ओर पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने मालवीया पर एसीबी के छापे को राजनीतिक साजिश करार दिया। इसके जवाब में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ सामने आए और दो टूक कहा – मैं इसे ठीक नहीं मानता। अखबार में कोई खबर आए और हम प्रेशर टैक्टिक्स करें, यह ठीक नहीं है।

मदन राठौड़ ने साफ कहा कि जहां तक महेंद्रजीत सिंह मालवीया का मामला है, वे अभी भाजपा में ही हैं, कांग्रेस में कहां गए हैं।

यानी तस्वीर साफ है।
मालवीया कह रहे हैं – मैं कांग्रेस में चला गया।
भाजपा कह रही है – गए ही कहां।
कांग्रेस कह रही है – आए ही कहां।

और जनता पूछ रही है – तो पॉलिटिकली गए कहां?


भाजपा ना जाने क्यों मालवीया का अकाउंट क्लोज नहीं करना चाहती। फुल एंड फाइनल हिसाब करने से बचती नजर आ रही है। एसीबी के करंट वाले तारों के बीच पतंग को फंसा कर रखने में जैसे उसे अलग ही आनंद मिल रहा हो।

मालवीया कह रहे हैं – जमाना ऑनलाइन का है, इस्तीफा भेज दिया।
भाजपा कह रही है – अभी इस्तीफा हुआ ही नहीं है।

इधर एसीबी ने एंट्री लेकर खुद अपनी प्रतिष्ठा को राजनीतिक तौर पर दांव पर लगा दिया है। भाजपा उड़ी हुई नींद में घर वापसी का सपना देख रही है, तो कांग्रेस भी दुविधा के उसी दोराहे पर खड़ी है। ऐसा सपना बुन रही है जो सच हो जाए तो भी फायदे का और न हो तो भी। आखिर खोने के लिए उसके पास है ही क्या।


भाजपा मालवीया के साथ पंचायती चाहती है।
कांग्रेस चाहती है कि पंचायत की जाजम हाथ के सहारे बिछे और इतनी पसर जाए कि उस पर सत्ता की चौपालें सजें। जाजम वहीं बिछानी है, जहां पहले से कोई राजनीतिक बाप बनकर दावा ठोक रहा है।

मामला अब इतना दिलचस्प हो गया है कि जनता इसे टेनिस मैच की तरह देख रही है। गेंद कभी इस पाले में, कभी उस पाले में और दर्शक दीर्घा से तालियां।


मदन राठौड़ कहते हैं – आप देखिए, अगर छापा भी पड़ा है तो हमारे व्यक्ति पर पड़ा है। इसका मतलब हम अपना-पराया नहीं देखते। एजेंसी की कार्रवाई में हस्तक्षेप नहीं करते। हमारी इस प्रक्रिया के लिए तो कांग्रेस को धन्यवाद देना चाहिए।

यानि एसीबी कार्रवाई करे किसी होने वाले कांग्रेसी पर और कांग्रेस धन्यवाद दे भाजपा को। सवाल सीधा है – आखिर क्यों? क्या एसीबी अब शुभकामना और धन्यवाद संदेशों के आदान-प्रदान का जरिया बनती जा रही है?


राठौड़ आगे सफाई देते हैं – कोई भी जांच राजनीतिक एंगल से नहीं होनी चाहिए। हम ऐसा करते भी नहीं हैं। जांच का फैसला एक रात में नहीं हुआ। मीडिया में खबर आई और एसीबी का छापा पड़ गया, यह संयोग है। कांग्रेस की हमेशा से प्रेशर टैक्टिक्स रही है। वह गलत तरीके से हमारे लोगों को परेशान करती थी। चाहे हमारा व्यक्ति हो या कोई दूसरा, हम राजनीतिक दुर्भावना से कार्रवाई नहीं करते।


इस पूरे घटनाक्रम में एसीबी को भी आत्ममंथन करना चाहिए। देशभर में जिस तरह उसकी टाइमिंग को लेकर सवाल उठे हैं, उससे जनता में कोई सकारात्मक संदेश नहीं गया है। अगर कार्रवाई के पक्ष में मजबूत तर्क हैं तो उन्हें तुरंत जनता के सामने रखना चाहिए।

उदयपुर सांसद मन्नालाल रावत का बयान भी कम दिलचस्प नहीं रहा। उन्होंने कहा कि मालवीया के कांग्रेस में जाने से बाप को नुकसान होगा। यानी भाजपा के भीतर भी मालवीया को लेकर भारी कन्फ्यूजन है।

प्रदेशाध्यक्ष का बयान साफ इशारा करता है कि अंदरखाने खिचड़ी पक रही है। मालवीया की मनुहारें चल रही हैं। क्या पता, कल तक सब कुछ सुवासित हो जाए। दम घुटने की जगह भीनी-भीनी खुशबू आने लगे।

हो सकता है एसीबी के आभामंडल में मालवीया को कोई नया पद और कद देने पर सहमति बन जाए। पूरा मामला अब थर्ड अंपायर के फैसले जैसा हो गया है। खिलाड़ी कह रहा है कि कांग्रेस की क्रीज पर बल्ला लगा है, लेकिन कैमरा बार-बार रिप्ले दिखाकर कन्फ्यूज कर रहा है।

आगे क्या होगा – यह देखना दिलचस्प रहेगा।

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