उदयपुर। वागड़ की राजनीति कभी विचारधारा के लिए जानी जाती थी। जनजातीय अस्मिता, ज़मीनी संघर्ष और संगठन की जड़ें-ये वहां की राजनीति की पहचान थीं। लेकिन आज वही वागड़ की राजनीति ऐसे मोड़ पर आ खड़ी है, जहां दल बदल अब वैचारिक यात्रा नहीं, बल्कि सुविधाजनक यू-टर्न बन चुका है। नेता इतनी मोटी चमड़ी के हो गए हैं कि कपड़ों की तरह से पार्टियां बदलने का ऐलान कर देते है। बहाना कभी राम मंदिर बनता है तो कभी उन्हें घुटन महसूस होने लगती है।
उंचे कद का नेता वागड़ के पॉलिटिकल सर्कस के मंच पर शीर्षासन करता दिखाई देता है तो उसको भी विश्लेषण में लानत—मनामत भेजना तो बनता है। महेंद्रजीत सिंह मालवीय के मन में एक बार फिर कांग्रेस का हाथ थामने की इच्छा बलवती हो गई और वे उस राह पर आज चल निकले। लेकिन सवालों के बवंडर उनका पीछा नहीं छोड़ने वाले हैं। क्या उन्हें अवसरवाद के पितामह कहें या फिर रंग बदलने वाला राजनेता।
मालवीया की बॉडी लेंगवेज ही बता रही थी कि दो साल से बहुत असहज थे। जिस ठस्से की राजनीति वो करते थे, जिस तरह से खुल्ला खेल खेलने के वे आदि थे, भाजपा में आकर वे ऐसा कोई कमाल नहीं कर सके। जिस जनता ने उनको उनके कामों के लिए सिर माथे बिठाया व बार—बार राजनीति की स्वीट डिश चखन का जोरदार आनंद दिया, उसी ने उन्हें जमीन भी दिखा दी।
राम नाम का चोला ओढ़ने के बावजूद राजनीतिक पिच पर कमाल नहीं दिखा पाए मालवीया। क्योंकि पॉलिटिशियन चाहे जितना भी घाघ क्यों ना हो, जनता उसको हर कास्ट्यूम में पहचान जरूर लेती है। उसकी पसंद कब नापसंद और कभी कभी नफरत के हद तक चली जाती है यह राजनेताओं से अच्छा भला कौन जान सकता है।
आखिर कैसे डबल इंजन के धुएं में घुट गया दम
दो साल पहले मालवीया ने कांग्रेस छोड़ी तब तर्क दिया गया कि कांग्रेस ने राम मंदिर जाने से रोका, और डबल इंजन सरकार के साथ रहकर क्षेत्र का विकास कराना जरूरी है। उस वक्त भाजपा में जाना किसी मजबूरी या वैचारिक मंथन का परिणाम नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से सत्ता-लाभ और राजनीतिक सुरक्षा की तलाश माना गया।
आज वही नेता कह रहे हैं कि भाजपा में उनका “दम घुट रहा था” सवाल सीधा है कि दो साल में ऐसा क्या बदल गया कि दम घुटने लगा? क्या सरकार बदल गई? नहीं। क्या सत्ता हाथ से निकल गई? नहीं। तो फिर घुटन किस बात की थी?
घुटन सत्ता में नहीं, स्वीकार्यता में थी
असल में मालवीया की भाजपा यात्रा शुरू से ही असहज रही। टिकट मिलने के साथ ही पार्टी के भीतर विरोध फूट पड़ा। अर्जुन सिंह बामणिया जैसे पुराने नेता खुलकर मैदान में आ गए। हकरू मईडा जैसे दावेदारों ने टिकट को “सम्मान नहीं, समझौता” बताया। भाजपा ने मालवीय को तो मंच दे दिया, लेकिन पार्टी का मन नहीं दे पाई। यही वह घुटन थी, जो आज बयान बनकर बाहर आई है।
तभी तो वे मंच पर कविता पढ़ते नजर आए कि—
भूरेटिया नी मानूं रे….।
यह भी कौन भूल सकता है कि भाजपा में रहते हुए मालवीय सत्ता पक्ष में हैं। मगर उनकी अलग अलग जन मोर्चों पर उपस्थिति इन दिनों लोगों को खल रही थी। फिर चाहे बात मनरेगा का भुगतान नहीं होना, खाद समय पर नहीं मिलना।
मालवीया ने अपने प्रभाव से सत्ता पक्ष से ऐसा कोई काम नहीं करवाया जिससे उनके कद और विश्वास की वापसी की कोई लकीर खिंची जा सकती हो। जबकि आम तौर पर होता यह है कि नेता चाहे हार जाए, मगर अगर पार्टी की सरकार है तो वो बूंद बूंद विश्वास की सिंचाई करके आने वाले चुनावों तक फील्ड में लगा रहता है।
मगर सत्ता के शीर्ष पर ही दिखने व वहां पर बने रहने के आदि मालवीया को भाजपा की जमीन ज्यादा उर्वरा नहीं लगी। क्योंकि वहां पर तो पहले से ही कई नेता उन्नत खेती करके चांदी उगा रहे हैं।
सच कहें तो भाजपा की राजनीति मालवीया की राजनीतिक को इतना ज्यादा मैच कर गई कि मालवीया के लिए अलग से कुछ कर पाना संभव ही नहीं हो पाया। ऐसे में उनके लिए यह मंथन जरूरी हो गया कि सत्ता में बैठे आत्ममंथन करते रहें या फिर अपनी पुरानी सीट पर फिर से वेकेंसी की तलाश करें।
शीर्ष से शीर्षासन का यह सफर अब आसान तो नहीं रहने वाला है। पार्टी में दो साल में वागड़ की दुनिया में बहुत पानी बह चुका है। नए तटबंध बन चुके हैं। लाभ का गणित बदल चुका है जो सत्ता का हमेशा केंद्र हुआ करता है।
अब देखना यह दिलचस्प होगा कि कमल की पंखुड़ियों मं झुलसने से बच गए मालवीया अब हाथ में हाथ सेंकने वालों से कैसे पार पा सकते हैं।
वापसी से बनेगी हवा, लेकिन तूफान भी
कांग्रेस में मालवीया की वापसी से एक बात तय है कि वागड़ की राजनीति फिर से गरमाएगी। उनके साथ एक बड़ा सामाजिक-राजनीतिक नेटवर्क फिर से लौट रहा है जिसको वो इन दो बरसों में भी लगातार मोबलाइज कर रहे हैं। पंचायत चुनावों में इसका असर दिख सकता है।
संगठन में हलचल होनी तय है व कार्यकर्ता फिर से सक्रिय होकर लौटने की सोचेंगे जो भाजपा के लिए बड़ा यह झटका हो सकता है। मगर यह मत भूलिये कि भाजपा हर डोज का एंटीडोज पहले से बना कर रखती है।
पल भर में दामन छोड़ने वालों व रिश्तों को छिटका कर जाने वालों को कई बार ईडी तक का सामना करना पड़ जाता है। अब लोग कह रहे हैं कि क्या वे सब मामले सेटल हो गए हैं जिनकी चर्चा दबी जुबान में हुआ करती है।
या कुछ लोग तो दाव करते हैं कि उन्हीं की वजह से मालवीयाजी को कमलोन्मुखी होना पड़ गया था। अब मालवीया के अपने पॉलिटिकल स्लीपर वाले और बंद पड़े बंकर हैं जो फिर से सक्रिय हो जाएंगे। इससे सबसे पहले कांग्रेस के हाथों की उंगलियों पर ही आंच आनी हैं मगर भाग्य क्या होगा यह तो उसी हाथ की लकीरें ही तय करेंगी।
लेकिन यह वाला सच भी उतना ही कड़वा
मालवीय की वापसी से कांग्रेस के भीतर के गुटों में फिर से तनाव बढना तय है। अर्जुन सिंह बामणिया की तो इस खबर से ही जमीन आज खिसक गई होगी कि उनके धुर विरोधी की उन्हीं के पार्टी में वापसी हो रही है।
लिमिटेड सीट्स वाली बस में अगर कोई पुराना मुसाफिर आ जाए तो एडजेस्टमेंट की जो चिल्लपों मचती है वो मचनी अब तय लगती है। मालवीया के जाने के बाद और उनके भाजपा में उदम घुटने के कालखंड के बीच बांसवाड़ा-डूंगरपुर की राजनीति में बामणिया गुट की तूती बोल रही थी।
अब कहीं वो नक्कार खाने में तूती की आवाज तो नहीं बन जाएगी। वन-वे ट्रैफिक वाली सड़क पर अचानक पॉलिटिकल ट्रोल तो नहीं दौड़ने शुरू कर देंगे। या फिर इतना ज्यादा यातायात कुप्रबंधन हो जाएगा कि सब कुछ गड्ड मड्ड सा हो जाएगा।
अब फिर टकराव की स्थिति बनने में देर नहीं लगने वाली। चौराहे पर तो बातें आ ही गई है। मावलीया की यह वापसी कांग्रेस के लिए अवसर भी है और जोखिम भी। यदि संतुलन नहीं साधा गया, तो फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो सकता है।
शुचिता गई भाड़ में, अब तो खुली राजनीतिक सौदेबाज़ी
सबसे बड़ा सवाल राजनीति की शुचिता का है। क्या विचारधारा अब केवल बयानबाज़ी तक सीमित रह गई है?
क्या जनता सिर्फ गणित है और पार्टियां केवल वोट लूटने वाले प्लेटफॉर्म?
जब एक नेता दो साल पहले कहता है कि कांग्रेस ने राम मंदिर जाने से रोका, और आज उसी पार्टी में लौटने को आतुर है-तो जनता क्या निष्कर्ष निकाले? यह बदलाव विचार का है या सुविधा का?
वागड़ की जनता भोली नहीं है। उसने लंबे समय तक संघर्ष देखे हैं। वह समझती है कि कौन कब, क्यों और किसके लिए खड़ा होता है। बार-बार बदले गए झंडे अंततः नेता की विश्वसनीयता को ही कमजोर करते हैं।
ये मेरे मन को भाया————वाली राजनीति अब ज्यादा चलने वाली तो नहीं है। फिर चाहे मालवीया हो या कोई और।
वागड़ का मोड़ और आने वाला इम्तिहान
महेंद्रजीत सिंह मालवीया की वापसी कोई साधारण राजनीतिक घटना नहीं है। यह वागड़ की राजनीति में एक बड़ा संकेत है कि आने वाले समय में लड़ाई विचारधारा से कम और सत्ता, संगठन और अस्तित्व की ज्यादा होगी।
अब कांग्रेस पर निर्भर है कि वह इस वापसी को संगठनात्मक मजबूती में बदले या आपसी गुटबाजी वाले संघर्ष में गंवा दे। जनता पर ये है कि वो तय करे—
क्या राजनीति में अब भी शुचिता बची है, या सब कुछ ‘दम घुटने’ और ‘दम निकलने’ के बीच का खेल बनकर रह गया है।
असली दम तो जनता का निकाल रहे हैं ये सब नेता मिल कर। वो कब मिलकर दल बदलूओं का दम निकालेगी यह देखने वाली बात होगी।
क्या वागड़ की राजनीति एक बार फिर निर्णायक दौर में आ गई है। यह दौर तय करेगा कि यहां नेता बनेंगे—या केवल अवसरवादी किरदार। कांग्रेस का भी अस्तित्व फिर दांव पर है वह या तो मिट जाएगी या फिर फिर चमक जाएगी।

