24 News Update उदयपुर। शहर के आस-पास कई सालों से पहाड़ रोज़ कत्ल हो रहे हैं। कभी रिसोर्ट के नाम पर, कभी होटल के नाम पर, तो कभी हॉस्पिटल के नाम पर। कत्ल के बहाने बदलते रहते हैं, मगर कातिलों की टोली वही रहती है—शहरवासियों की जानी-पहचानी, पहचान छुपाए बिना मुस्कराती हुई। अरावली की छाती पर पड़े ये घाव नए नहीं हैं, बस हर साल थोड़ा गहरे होते जा रहे हैं।
इतने बरसों में अरावली के हत्यारों की कई-कई पीढ़ियां पनप गईं। बाप ने पहाड़ काटा, बेटे ने प्लॉटिंग की और पोते ने “ग्रीन प्रोजेक्ट” का बोर्ड लगा दिया। करोड़ों कूट लिए, फिर भी मन नहीं भरा। लालच ऐसा कि पहाड़ छोटा पड़ गया, मगर भूख और बड़ी हो गई।
धंधा इतना फैल गया कि पहले सकुचाकर, छुपकर और दबी ज़ुबान में नेता लोग अपनी हिस्सेदारी मांगते थे। अफसर भी दबी ज़ुबान में हाथ रंगते, भू माफिया डरता था सामने आने से, टेबल के नीचे से सौदा करते हुए बचते-बचाते दिखते थे। मगर अब तो सब खुल्ला खेल फर्रूखाबादी है। पहाड़ दिखा नहीं कि कटा नहीं—बस बोली लगाने वाला चाहिए। द-लाल यूडीए से लेकर जयपुर-दिल्ली तक पलकें बिछाए बैठे हैं। नक्शे रात में पास होते हैं, रास्ते सुबह निकल आते हैं और शाम तक निर्माण “पुराना” घोषित कर दिया जाता है।
हर प्रॉपर्टी पर नेता—अफसर—भूमाफिया बैठा है
अब तो आम आदमी भी उंगली रखकर बता देता है—इस प्रॉपर्टी में फलां-फलां का निवेश है। फलां के परिवार वाले, फलां आईएएस-आईपीएस के चाचा-भतीजे, फलां नेताजी के स्टेक्स हैं। सबको सब पता है, बस सरकारी रिकॉर्ड को अचानक भूलने की बीमारी लग जाती है। देखने की फुर्सत ना तब थी, ना अब है और ना भविष्य में कभी रहने वाली है। दिल बहलाने के लिए सरकारी विज़िट का खयाल अच्छा है—जैसे मरीज़ को एक्स-रे दिखाकर दवा देने की बजाय फ्रेम में टांग दिया जाए।
गालिब जिंदा होते तो क्या होता….
अगर मिर्ज़ा ग़ालिब आज ज़िंदा होते, तो शायद यूं लिखते— “दो गज ज़मीं भी नसीब न हुई अरावली को,
हमने शहर बसाया, पहाड़ों को दफनाकर।” या फिर अपनी तल्ख़ी में यह भी जोड़ देते— “काग़ज़ों में हरी रही ये धरती तमाम उम्र, हक़ीक़त में हरियाली हमने खुद ही काट दी।” ग़ालिब की ग़ज़ल यहां किसी दीवार पर टंगने से पहले किसी बिल्डर के होर्डिंग में दब जाती। शेर पढ़ते-पढ़ते जेसीबी का हॉर्न बज जाता और शायरी की लय मलबे में बदल जाती।
अब जबकि अरावली ने कराहना शुरू किया है, आवाज़ उठी है, ऐलान-ए-जंग जैसी नौबत आ गई है पहाड़ बचाने की—तो सरकारी अमला भी हरकत में दिखता है। “चलो, कुछ देख आते हैं”, कहते हुए चेंबर से बाहर निकलते हैं। मगर बाहर निकलते ही रिस्क सामने खड़ा हो जाता है। जिधर नज़र घुमाओ, उधर कटे पहाड़, उखड़ी चट्टानें और आधे बने प्रोजेक्ट्स।
विचार तो बहुत उमड़ते होंगे इनके मन में भी
मन में विचार बहुत घुमड़ते होंगे इनके भी, मगर आईएएस वाली पढ़ाई और पहाड़ों की असली पॉलिटिकल चढ़ाई में ज़मीन-आसमान का फर्क है। किताबों में पर्यावरण संरक्षण सीधा-सादा लगता है, ज़मीन पर उतरते ही हर पत्थर के नीचे कोई सिफारिश दबे पांव खड़ी मिलती है। रिस्क फैक्टर इतना कि एक को रोकेंगे तो दूसरा बोलेगा—तीसरे को भी रोको। तीसरे को पकड़ने जाएंगे तो पहला कहेगा—लो साहब, मैं तो जयपुर से परमिशन लेकर आया हूं। तब तक दूसरा किसी मंत्रीजी को फोन घुमा देगा और तीसरा बिना किसी खौफ के नया निर्माण शुरू कर देगा। यही अरावली की नियति बन गई है—यहां कानून पीछे-पीछे चलता है और माफिया आगे-आगे रास्ता बनाता है।
अरावली क्षेत्र में अवैध अतिक्रमण और निर्माण की रोकथाम आखिर हो तो कैसे हो? करें तो कौन करे? किस इच्छाशक्ति के साथ करे? सवाल पहाड़ जितने भारी हैं और जवाब फाइलों जितने पतले। हर नई सरकार में पहाड़ बचाने के नारे बदलते हैं, मगर पहाड़ों का कटना नहीं बदलता।
कलेक्टर साहब चौंके, सड़क कैसे बन गई??
इसी बीच आज जिला कलेक्टर नमित मेहता शहर से सटे कैलाशपुरी क्षेत्र में यूडीए अधिकारियों के साथ मौके पर पहुंचे। निरीक्षण हुआ, निर्देश दिए गए। अवैध रास्तों और निर्माण को ध्वस्त करने के आदेश भी जारी हुए। कलेक्टर साहब का गुस्सा वाजिब था—रास्ता बना तो बना कैसे? निर्माण हुआ तो हुआ कैसे?
मगर सिस्टम की रफ्तार अपनी है। पहले जांच होगी, फिर रिपोर्ट बनेगी, फिर फाइल चलेगी और फिर ठंडी आंच पर सरकारी कार्रवाई की खिचड़ी पकेगी। तब तक ज़मीन माफियाओं की स्वीट डिश तैयार हो चुकी होगी हुजूर। पैसा तब तक न जाने किन-किन हवाला चैनलों से उड़कर सुरक्षित ऊंचाइयों पर पहुंच चुका होगा। पहाड़ तब तक या तो आधा कट चुका होगा या पूरी तरह बिक चुका होगा। कलेक्टर साहब ने प्रतिबद्धता जताई कि अरावली क्षेत्र में किसी भी तरह का अतिक्रमण स्वीकार नहीं किया जाएगा। हम इस भावना का पहाड़ जैसा सम्मान करते हैं। ड्रोन सर्वे के निर्देश भी दिए गए हैं। ड्रोन आसमान से सच दिखाएंगे, मगर सवाल यह है—क्या ज़मीन पर उस सच को मानने की हिम्मत भी होगी?
और यहीं हमारा व्यंग्य सरकार को एक सुझाव देता है। जब जयपुर से संक्रांति पर पतंग उड़ाने के फरमान निकल ही चुके हैं, तो पतंगोत्सव पहाड़ों पर ही रख लेते। ड्रोन भी वहीं उड़ जाते, पतंगें भी वहीं लहरातीं और जनता अपनी आंखों से देख लेती कि अरावली का कितना सत्यानाश हो चुका है।
शायद तब हवा बदल जाती। और अगर हवा नहीं बदलती, तो कम से कम पतंगों की डोर ही किसी कटे पहाड़ से उलझकर सवाल पूछ लेती— “आख़िर मेरा कसूर क्या था?” अगर पहाड़ बोल पड़े, तो ग़ालिब का आख़िरी शेर कुछ यूं होता— “काट-काट कर कहा कि विकास हो रहा है, अब पूछते हो ग़ालिब, ये मलबा क्यों बोल रहा है?” उस दिन शायद जनता रो पड़े… और शायद, सिर्फ़ शायद, प्रशासन कांप जाए।
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