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खन्ना साहब के राज में हाल—बेहाल, निगम में आरटीआई लगाने गए वकील साहब की आपबीती पढ़िये— घंटे, तीन कमरे, कर दिया घनचक्कर!!

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24 News Update उदयपुर। उदयपुर नगर निगम वैसे तो अपने महान कर्मचारियों की वजह से आज से नहीं, बरसों से सुर्खियों में रहा है मगर मौजूदा आयुक्त साहब के कार्यकाल में कर्मचारी कुछ ज्यादा ही स्वच्छंद होकर खुली मनमानी करने लगे हैं। इसका कॉन्फिडेंस उनको लोकल नेताओं की मिलीभगत से मिल रहा है या फिर असरशाही ने ही अंदरखाने खुली छूट दे दी है, यह जांच का विषय है।
आज बात होगी सूचना के अधिकार के एक नायाब मामले की। खबर से पहले डिस्क्लेमर ये है कि इसमें वकील साहब का नाम नहीं लिखा जा रहा है क्योंकि उनकी परमिशन है कि नाम नहीं लिखा जाए। तो हुआ यूं​ कि जब अधिवक्ता साहब आरटीआई आवेदन जमा कराने निगम मुख्यालय पहुंचे तो अजब गजब के बहाने बना कर टालमटोल करने का प्रयास किया गया। एक ऐसी कहानी बन गई, जो सिस्टम की सोच और रवैये पर बड़ा सवाल छोड़ गई।
घटना 11 सितंबर 2025 की है। अधिवक्ता नगर निगम उदयपुर के कार्यालय के कमरा नंबर 28 पहुँचे। उनके हाथ में दो आरटीआई आवेदन थे, यहां वरिष्ठ सहायक देवेन्द्र कसाणा से मुलाकात हुई। आवेदन और 10 रूपए का पोस्टल ऑर्डर सामने रखा गया, व आवेदन लेकर रसीद देने को कहा गया। लेकिन आवेदन लेने से पहले ही नियमों की नई किताब खोल दी। कहा गया कि मोबाइल नंबर लिखना जरूरी है और आधार कार्ड की प्रति भी लगानी होगी। अधिवक्ता ने जब आरटीआई अधिनियम का हवाला दिया और पूछा कि ये शर्तें किस नियम में लिखी हैं, तो जवाब देते नहीं बना।
यहां से कहानी मोड़ लेती है। अधिवक्ता को कमरा नंबर 30, जिसे निगम में स्टोर रूम कहा जाता है, वहां पर भेज दिया गया। वहां वरिष्ठ सहायक हाकरचंद बैठे थे। उम्मीद थी कि यहां बात आगे बढ़ेगी, लेकिन यहां भी वही नियमों की रेडिमेड दीवार पहले से खड़ी थी। बिना मोबाइल नंबर और आधार के आवेदन नहीं लिया जाएगा कहा गया। इतना ही नहीं, यह भी कहा गया कि नगर निगम में अब ऑफलाइन आरटीआई ली ही नहीं जाती, सिर्फ ई-मित्र से आवेदन करना होगा। सवाल उठता है कि अगर ऑफलाइन आरटीआई बंद है, तो फिर आरटीआई कानून क्यों कहता है कि आवेदन साधारण कागज पर भी दिया जा सकता है।
अधिवक्ता ने पूछा कि यह व्यवस्था किस आदेश के तहत लागू है, तो कोई आदेश सामने नहीं आया। उल्टा उन्हें दोबारा देवेन्द्र कसाणा के पास भेज दिया गया।

देवेन्द्र कसाणा को “ऑफिस कोडवर्ड” में डी.एम.सी. के पास भेजा गया। इसके बाद अधिवक्ता को श्री दिलीप भारद्वाज के पास ले जाया गया। दिलीप भारद्वाज ने मौखिक रूप से कहा कि आवेदन की रसीद दे दी जाए और किसी चेतन जी से सूचना लेने को कहा। लेकिन चेतन जी का फोन नहीं लगा।

एक बार फिर अधिवक्ता को वापस कमरा नंबर 30 लाया गया। यहां यह बताया गया कि मोबाइल नंबर और आधार नहीं देने पर नोटिस जारी किया जाएगा और सूचना रोकी जाएगी। सवाल यह उठता है कि सूचना मांगना कब से नोटिस का अपराध बन गया। काफी मशक्कत के बाद अधिवक्ता के दो आरटीआई आवेदनों की सेकंड कॉपी पर केवल क्रमांक और मोहर तो लगा दी गई, लेकिन नाम और हस्ताक्षर वाली मोहर देने से इनकार कर दिया गया, जबकि राज्य सरकार के परिपत्र साफ कहते हैं कि प्राप्ति रसीद पर पूरा विवरण होना चाहिए।

कहानी यहीं नहीं रुकी। अधिवक्ता ने तीसरा आरटीआई आवेदन वहीं पर लिखा और ₹10 नगद शुल्क देने की कोशिश की, लेकिन कहा गया कि नगद नहीं लिया जाएगा, सिर्फ पोस्टल ऑर्डर ही मान्य है। जब लोक सूचना अधिकारी का नाम और कक्ष संख्या पूछी गई, तो जवाब मिला कि इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। सवाल यह भी है कि जिस अधिकारी से सूचना मिलनी है, उसका नाम ही आम नागरिक को पता नहीं चले, तो सूचना का अधिकार किसके भरोसे छोड़ा गया है। ऐसे में यह तो अनुमान लगा ही सके हैं कि निगम के कर्मचारियों को आयुक्त साहब का नाम भी शायद ही पता हो।

बहरहाल, लिखित शिकायत देने के लिए सादा कागज मांगा गया, तो वह भी उपलब्ध नहीं कराया गया। पूरे नगर निगम परिसर में कहीं भी लोक सूचना अधिकारी से संबंधित स्पष्ट सूचना बोर्ड नजर नहीं आया। अधिवक्ता को मजबूर होकर बाहर जाकर पोस्टल ऑर्डर लाना पड़ा। तीसरा आवेदन देने पर फिर आपत्ति खड़ी की गई कि पोस्टल ऑर्डर पुराना है और तारीख स्पष्ट नहीं है।

करीब दो घंटे से ज्यादा समय तक चले इस पूरे घटनाक्रम के बाद आखिरकार तीसरे आवेदन की रसीद दी गई, लेकिन वह भी अधूरी, बिना पूरी पहचान और जिम्मेदारी वाली मोहर के। यह सिर्फ एक अधिवक्ता की परेशानी नहीं थी, बल्कि उस आम नागरिक की कहानी थी, जो नगर निगम में सूचना मांगने जाता है और जवाब की जगह चक्कर पा जाता है।

सवाल अब सिर्फ इतना नहीं है कि आरटीआई क्यों रोकी जा रही है। सवाल यह है कि जब एक कानून जानने वाले वकील को देवेन्द्र कसाणा, हाकरचंद, दिलीप भारद्वाज और अदृश्य चेतन जी के बीच भटकना पड़े, तो आम आदमी किस दरवाजे पर दस्तक देगा। नगर निगम में सूचना का अधिकार आज भी कानून की किताबों में जीवित है, लेकिन दफ्तरों में वह किस हाल में है, यह कहानी उसी सच्चाई को बयां करती है।

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