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सोचिये! कलेक्टर या सांसद ब्लड सेंपल लेकर दौड़ रहे हैं, ब्लड खुद लेकर वार्ड में आ रहे हैं, आधे घंटे थैली को बगल में दबा कर बैठे हैं…..एमबी में ये क्या हो रहा है??? जागो जनप्रतिनिधि जागो!!!

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24 न्यूज अपडेट उदयपुर। ब्लड बैंक में भूलकर भी ना करें रक्तदान की खबर 24 न्यूज अपडेट के माध्यम से उठाए जाने के बाद से हड़कंप मचा हुआ है। अस्पताल प्रशासन को लंबे समय से चली आ रहे मिलीभगत के इस खेल का जवाब देना भारी पड़ रहा है। शिकायकर्ता से फोन पर संपर्क साध कर मामले को ठंडा करने का प्रयास किया जा रहा है। और तो और सीएम पोर्टल तक मामले को मैनेज करने के प्रयास हो रहे हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि जवाब देते नहीं बन पड़ रहा है। रक्तदाता के डोनर कार्ड का सरेआम अपमान अब और अधिक सहन नहीं किया जाएगा। अब आज की खबर में एम एक और बड़ा खुलासा करने जा रहे हैं कि किसकी प्रकार से अस्पताल में लापरवाहियांें का आलम है।
कर देते हैं घनचक्कर, सेम्पल खद लेकर जाना पड़ता है, बगल में दबा कर रखना पड़ती है ब्लड की थैली
उदाहरण के लिए मान लीजिए कि किसी जिले के कलेक्टर साहब के कोई नजदीकी रिश्तेदार बीमार हो गए। उनको एमबी अस्पताल लेकर आए। डाक्टर ने भर्ती कर लिया और कहा कि आपको चार युनिट ब्लड की जरूरत है। कलेक्टर साहब को एक फार्म दिया गया जिसे लेकर वो डाक्टर के पास गए। डाॅक्टर ने वार्ड में वो फार्म भरा और मरीज का रक्त नमूना लेकर कलेक्टर साहब के हाथ में थमा दिया। कलेक्टर साहब से कहा कि जाइये, इसे लेकर ब्लड बैंक में खुद दे आइये। कलेक्टर साहब लंबा रास्ता तय करके खुद सेंपल और फार्म को हाथ में थाम कर ब्लड बैंक पहुंचे। वहां पर सीढ़ियां चढ़कर जूते उतार कर खिड़की के सामने लाइन में लगे। नंबर आने पर फार्म दिया और सेम्पल दिया। उसके बाद उनसे डोनर के बारे में पूछा गया तो उन्होंने डोनर कार्ड दे दिया। कार्ड देखते ही कर्मचारी ने कहा कि यह नहीं चलेगा, डोनर लाइये। काफी हाथाजोड़ी के बाद कलेक्टर साहब वहां पर कन्विंस कर पाए कि ठीक है, आपकी मजबूरी है एक कार्ड से रक्त मिल जाएगा लेकिन चेतावनी है कि अगली तीन युनिट ब्लड के लिए कार्ड नहीं चलेंगे। कलेक्टर साहब पूछते हैं तो सख्त जवाब मिला-पता नहीं कहां से कार्ड लेकर आ जाते हैं, कार्ड नहीं चलेंगे। डोनर लाइये। कलेक्टर साहब सोच में पड़ जाते हैं कि उनके परिवार ने कुछ महीनों पहले ही सामूहिक रूप से रक्तदान किया था। परिवार के अन्य लोग रक्तदान के दायरे में नहीं आते हैं, अब करें तो क्या करें??? बेहद तनाव में आकर रिश्तेदारों को फोन लगाते हैं, दोस्तों से कहते हैं कि भाई, यहां कार्ड नहीं चल रहा है, आप डोनेट कीजिए। मुश्किल से कोई तैयार होता है।
इस कवायाद के बाद कलेक्टर साहब फिर वार्ड में मरीज के पास लौट जाते हैं। वहां उनको तीन घंटे बाद बताया जाता है कि ब्लड बैंक से ब्लड लेकर आना है। बारी-बारी से सभी मरीजों के तीमारदार नर्सिंग स्टाफ के साथ पैदल परेड करते हुए फिर से ब्लड बैंक जाते हैं। वहां पर रक्त तीमारदारों के हाथों में थमाया जाता है। कलेक्टर साहब भी रक्त को संभालते हुए लेकर पैदल फिर से लंबी दूरी तय कर वार्ड में पहुंचते हैं। रास्ते में उनको श्वान भी दिखाई देते हैं। इसके बाद जब रक्त वार्ड में पहुंच जाता है तब एक और नई बात सामने आती है। वार्ड में कलेक्टर साहब को बताया जाता है कि यह प्रोसेस्ड प्रिजर्व किया गया रक्त है जिसका तापमान बहुत कम है। इसे नाॅर्मल टेम्परेचर तक लाने के लिए आपको इसको करीब आधे घंटे तक बगल में दबा कर रखना होगा। उसके बाद मरीज को खून चढ़ाया जा सकेगा। डाक्टर साहब सोचते हैं कि मैंने तो खबर पढ़ी थी कि अस्पताल हाईटेक हो गया है। सारी व्यवस्थाएं चाक-चैबंद हो गई हैं। कई तरह के कोड एक्टिवेट करते हुए मरीजों की जान बचाने के दावे हो रहे हैं। जब इतना चैकस प्रशासन है तो यहां लापरवाही क्यों है। मरीज का रिश्तेदार खुले में रक्त का सेंपल लेकर जा रहा है, खुद रक्त लेकर वापस वार्ड में आ रहा है। इस दौरान कोई बात हो गई तो क्या होगा? बहरहाल, दो दिन बाद कलेक्टर साहब ब्लड बैंक के कई चक्कर लगा चुके होते हैं। अचानक उनको बताया जाता है कि जो फार्म दिया था वो पूरी तरह से भर चुका है। लिखने की जगह नहीं बची है। अब नया फार्म बनेगा, फार्म लेकर वे फिर से डाक्टर के पास जाते हैं। डाक्टर फिर से ब्लड के सेम्पल लेकर कलेक्टर साहब का पैदल ब्लड बैंक भेजता है। अब कलेक्टर साहब का माथा ठनक जाता है कि जब पहले फार्म के लिए सेंपल ले लिया था तो फिर क्यों लिया गया। उसी से काम चला लेते। जिस मरीज को रक्त चढ़ना है उसका दुबारा सेम्पल क्यों?? परेशान होकर कलेक्टर साहब सांसद, विधायक, पार्षदों व अन्य नेताओं को फोन लगाने का प्रयास करते हैं लेकिन वो तो गोधरा कांड पर बनी पिक्चर देखने गए हुए होते हैं। फोन हीं नही उठाते। इसके बाद सीएम पोर्टल 181 पर फोन लगाते हैं जहां से उनको एक नंबर मिलता है। वे सोचते हैं यहां तुरंत समाधान हो जाएगा। लेकिन उसके एक दिन बाद तक फोन हीं नहीं आता है। सोचते हैं कि स्वास्थ्य महकमा देखने वाले अधिकारी को बताउं। अधिकारी कहते हैं कि अस्पताल अधीक्षक को फोन कीजिए। अस्पताल अधीक्षक बार बार फोन उठाने पर नाॅट रिचेबल हो जाते हैं।
पिक्चर देखने की जगह व्यवस्थाएं दुरूस्त कीजिए नेताजी
…….ये कोई कपोल कल्पित कहानी नहीं है। एमबी अस्ताल में एक मरीज की आपबीती है। यह सब सबके साथ हो रहा है। बस कलेक्टर साहब की जगह खुद का नाम लिख लीजिए। कलेक्टर साहब का नाम इसलिए लिखा गया है ताकि आप मामले की गंभीरता को समझ सकें। यहां पर सांसद भी हो सकते हैं, विधायक भी। क्या आप सोच सकते हैं कि सांसद साहब सेम्पल लेकर पैदल ब्लड बैंक जा रहे हैं व वहां डोनर कार्ड से रक्त लेने के लिए माथापच्ची कर रहे हैं। आपको बात बचकानी व अविश्वसनीय लगेगी लेकिन यदि सांसद को चुनने वाला आम आदमी यह सब झेल रहा है तो फिर सांसद-विधायक कर क्या रहे हैं। जितना समय और धन पिक्चर देखने में लगाते हैं उतना अगर अस्पताल की व्यवस्था देखने में लगा देते हो सिस्टम सुधर जाता। नई व्यवस्थाएं बन जाती।
यहां है बदलाव की जरूरत

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