24 News Update उदयपुर। नगर निगम चुनाव का परिणाम आने के साथ ही उदयपुर की सियासत अब नए सवाल पर अटक गई है कि महापौर आखिर कौन? 53 पार्षदों के साथ भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है, इसलिए सदन में संख्या का संकट नहीं है, लेकिन मेयर के चेहरे को लेकर पार्टी के भीतर समीकरणों की सियासत तेज हो गई है। अभी सारे जीते हुए प्रत्याशी बाड़ेबंदी में है ऐसे में महापौर का कमल भी बाड़े से ही खिलेगा। दूसरी तरफ कांग्रेस भी कमजोर संख्या के बावजूद अपने चेहरे को लेकर राजनीतिक संदेश देने की तैयारी में है। ऐसे में बुधवार को होने वाला नामांकन सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि दोनों दलों की अंदरूनी जुगलबंदी का पहला सार्वजनिक संकेत होगा। भाजपा ने मंगलवार को अपने सभी 53 पार्षदों की बाड़ेबंदी के दौरान प्रत्येक पार्षद से बताया जा रहा है कि तीन-तीन पसंदीदा नाम लिखवाकर राय जानने की औपचारिक कवायद की। हालांकि सबको पता है कि नाम क्या है मगर बाड़ाबंदी में भी लोकतांत्रिक दिखने का भ्रम पैदा किया जा रहा है। उदयपुर शहर के पास हाईवे किनारे होटल में चल रही बैठक में शहर विधायक ताराचंद जैन, ग्रामीण विधायक फूलसिंह मीणा, शहर जिलाध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़, संभाग प्रभारी नाहर जोधा और जिला प्रभारी हरीश पाटीदार सहित संगठन के प्रमुख नेताओं ने पार्षदों से चर्चा की।अब भाजपा के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा प्रमोद सामर और दिनेश भट्ट की है। दोनों की राजनीतिक पृष्ठभूमि और संगठन में पकड़ अलग-अलग है और दोनों के पक्ष में अलग-अलग राजनीतिक समीकरण सक्रिय बताए जा रहे हैं। यही वजह है कि इसे फिलहाल किसी एक नाम की दौड़ के बजाय सामर-भट्ट जुगलबंदी के रूप में देखा जा रहा है। कुछ लोगों में यह भी चर्चा है कि नाम वही होगा जो उदयपुर फाइल्स और उसके बाद की परिस्थितियों को मैनेज करने वाला होगा। उप महापौर पर भी वही होगा जिसका जिक्र कहीं ना कहीं उदयपुर फाइल्स में आया है। और तो और सहमति देने वाला भी वही होगा जिसका नाम उदयपुर फाइल्स में आया होगा। याने इस बार फाइल्स वाले बाड़े में महापौर का कमल खिलने वाला है। सामर बनाम भट्ट नहीं, दोनों को साधने की रणनीति?प्रमोद सामर भाजपा के वरिष्ठ संगठनात्मक चेहरों में गिने जाते हैं और जैन समाज में भी उनकी मजबूत पहचान है। दूसरी तरफ दिनेश भट्ट पूर्व शहर जिलाध्यक्ष रह चुके हैं और संगठन में लंबे अनुभव के साथ ब्राह्मण समाज के प्रमुख चेहरों में हैं। ऐसे में पार्टी यदि सामर को मेयर बनाती है तो भट्ट को उपमहापौर के रूप में साधने की चर्चा है और यदि भट्ट के नाम पर मुहर लगती है तो सामर को उपमहापौर की जिम्मेदारी देकर संतुलन बनाने की संभावना पर भी राजनीतिक गलियारों में बात हो रही है।यानी भाजपा के सामने चुनौती केवल मेयर चुनने की नहीं है। एक चेहरे को आगे करते हुए दूसरे मजबूत दावेदार को साथ रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि मेयर और डिप्टी मेयर के पद को एक ही राजनीतिक पैकेज की तरह देखा जा रहा है। इस बीच शहर विधायक ताराचंद जैन और पंजाब के राज्यपाल केंद्रीय मंत्री गुलाबचंद कटारिया के राजनीतिक खेमे की ओर से दिनेश भट्ट के नाम को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है मगर आर्थिक प्रभाव के चलते उनका नाम बहुत ही धीमी गति से सफर तय कर रहा है। वहीं प्रमोद सामर के समर्थन में संगठन के भीतर लॉबिंग तो हो ही रही है आर्थिक समीकरण भी बहुत तेजी के साथ बन रहे हैं। हालांकि अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व ही करेगा। भाजपा की रेस में और भी हैं दीवाने, मस्ताने, परवानेभाजपा की अंदरूनी तस्वीर केवल सामर और भट्ट तक सीमित नहीं है। पूर्व उपमहापौर पारस सिंघवी भी मेयर पद की दौड़ में बताए जा रहे हैं। बाड़ेबंदी के दौरान उनके पार्षदों से मुलाकात और बातचीत की चर्चा ने इस संभावना को और हवा दी है। पूर्व उपमहापौर महेंद्र सिंह शेखावत, अतुल चंडालिया और पहली बार पार्षद बने पंकज बोराणा के नाम भी चर्चा में हैं। शेखावत के पास उपमहापौर पद का अनुभव है, जबकि अतुल चंडालिया पहले पार्षद रह चुके हैं। पंकज बोराणा पहली बार निगम में पहुंचे हैं और संगठन में महामंत्री तथा पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष की पृष्ठभूमि रखते हैं। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ के रिश्तेदार पंकज बोराणा की सक्रियता भी इस पूरी दौड़ में अलग राजनीतिक चर्चा का विषय बनी हुई है। हालांकि अनुभव के लिहाज से वे अन्य दावेदारों की तुलना में नए हैं। कांग्रेस में टांक-पूनम की जुगलबंदीभाजपा जहां अपने 53 पार्षदों के बीच से चेहरा चुनने में जुटी है, वहीं कांग्रेस के पास संख्या कम होने के बावजूद मेयर चुनाव के लिए अरुण टांक और डॉ. पूनम राठौड़ के रूप में दो प्रमुख विकल्प बताए जा रहे हैं।अरुण टांक का नाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे पहले भी मेयर पद का चुनाव लड़ चुके हैं। 2019 में भाजपा के गोविंद सिंह टांक के मुकाबले अरुण टांक महापौर पद के कांग्रेस प्रत्याशी थे। वह चुनाव भाजपा ने बेहद करीबी अंतर से जीता था। इस बार अरुण टांक ने वार्ड 3 से चुनाव जीतकर फिर निगम में वापसी की है। ऐसे में उन्हें मेयर पद का अनुभव रखने वाले चेहरे के तौर पर देखा जा रहा है। दूसरी ओर डॉ. पूनम राठौड़ का नाम कांग्रेस के भीतर अलग राजनीतिक समीकरण पेश कर रहा है। शहर कांग्रेस जिलाध्यक्ष फतेह सिंह राठौड़ की पत्नी हैं और वार्ड 17 से जीतकर निगम में पहुंची हैं। ऐसे में यदि कांग्रेस उन्हें मैदान में उतारती है तो यह संगठनात्मक नेतृत्व के साथ महिला प्रतिनिधित्व का संदेश भी होगा। भाजपा के पास संख्या, कांग्रेस के पास मुकाबले का चेहरामेयर चुनाव में संख्यात्मक तस्वीर पूरी तरह भाजपा के पक्ष में है। 80 सदस्यीय निगम में भाजपा के पास 53 पार्षद हैं, जबकि कांग्रेस के खाते में 23 सीटें हैं और बाकी सीटें अन्य के पास हैं। इसलिए कांग्रेस का प्रत्याशी जीत के गणित से ज्यादा राजनीतिक उपस्थिति और विपक्ष की भूमिका के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा। भाजपा के लिए असली चुनाव सदन में नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर है। 53 पार्षदों की पसंद जानने के लिए तीन-तीन नाम लिखवाने की कवायद से यह संकेत साफ है कि नेतृत्व किसी एक चेहरे पर सीधे फैसला थोपने के बजाय अंदरूनी राय और समीकरणों को भी तौल रहा है। पर्ची से निकलेगा नाम या संगठन लगाएगा मुहर?भाजपा नेताओं ने पार्षदों को यह संदेश दिया है कि सभी निर्वाचित सदस्य समान हैं और मेयर बनने वाला व्यक्ति पूरे बोर्ड को साथ लेकर चले। यही कारण है कि पार्षदों से तीन नाम लिखवाए गए हैं। लेकिन अंतिम निर्णय केवल पर्ची में मिले नामों के आधार पर होगा या संगठन अपने राजनीतिक आकलन से फैसला करेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। एक बात जरूर तय है कि मेयर के साथ डिप्टी मेयर का नाम भी राजनीतिक संतुलन का बड़ा औजार बन सकता है। सामर-भट्ट में से किसी एक को मेयर और दूसरे को डिप्टी मेयर बनाने का फार्मूला यदि सामने आता है तो भाजपा एक साथ दो प्रमुख दावेदारों को साध सकती है। बुधवार को तस्वीर साफ, लेकिन असली संदेश उसके बादबुधवार को मेयर पद के नामांकन के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों की रणनीति सामने आ जाएगी। भाजपा के लिए सवाल यह होगा कि वह संगठनात्मक अनुभव, सामाजिक समीकरण और पार्षदों की पसंद में किसे प्राथमिकता देती है। कांग्रेस के लिए सवाल यह रहेगा कि वह पुराने अनुभव वाले अरुण टांक पर भरोसा करती है या डॉ. पूनम राठौड़ के जरिए नया राजनीतिक संदेश देती है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प बात यह है कि मेयर की कुर्सी का गणित भाजपा के पक्ष में पहले ही तय दिखाई दे रहा है, लेकिन चेहरे का फैसला अभी भी जुगलबंदी, संतुलन और सियासी संदेश के बीच अटका है। कल नामांकन के साथ एक सवाल का जवाब मिल जाएगा—भाजपा की जुगलबंदी में सामर-भट्ट में किसका ताज सजेगा और कांग्रेस की जुगलबंदी में टांक-पूनम में किसे मैदान मिलेगा? यही चेहरे आने वाले वर्षों में उदयपुर नगर निगम की राजनीति की दिशा तय करने वाले हैं। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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