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नेताओं की सिफारिशों पर तबादले अफसरों को पड़े भारी, हाईकोर्ट ने शीर्ष अफसरों को किया तलब

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24 News Update जयपुर। नेताओं और जनप्रतिनिधियों की सिफारिशों पर शैक्षणिक सत्र के बीच शिक्षकों के बड़े पैमाने पर तबादले करना अब अफसरों को भारी पड़ता दिख रहा है। राजस्थान हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले में सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए साफ संकेत दिया है कि बिना ठोस नीति के “चाकरी आधारित तबादलों” को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
जस्टिस समीर जैन की एकल पीठ ने मिड-सेशन में हजारों शिक्षकों के तबादलों पर हैरानी जताते हुए सरकार से सीधा सवाल किया है कि आखिर किस नीति और किस नियम के तहत शैक्षणिक सत्र के बीच इतनी बड़ी संख्या में तबादले किए गए।
अदालत ने इस गंभीर मुद्दे पर जवाबदेही तय करते हुए मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास और प्रमुख शिक्षा सचिव (शासन सचिव, स्कूल शिक्षा) कृष्ण कुणाल को 23 जनवरी को व्यक्तिगत रूप से हाईकोर्ट में उपस्थित होने के आदेश दिए हैं।
ट्रांसफर बैन के बावजूद हजारों तबादले
यह आदेश मैना गढ़वाल, महेश कुमार सहित अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता संदीप कलवानियां ने अदालत को बताया कि

सरकारी स्कूलों में सामान्यतः 1 जुलाई से तबादले शुरू होते हैं,

प्रदेश में ट्रांसफर बैन लागू है,

इसके बावजूद सरकार ने 3 अगस्त से अब तक 12 हजार से अधिक वरिष्ठ अध्यापक, स्कूल व्याख्याता और प्रिंसिपल के तबादले कर दिए।

अदालत को यह भी बताया गया कि बैन के दौरान सरकार “विशेष अनुमति” के नाम पर बिना किसी स्पष्ट पॉलिसी के सामूहिक तबादले कर रही है, जो प्रशासनिक विवेक से ज्यादा राजनीतिक दबाव का नतीजा प्रतीत होते हैं।

बोर्ड परीक्षा से पहले शिक्षण व्यवस्था से खिलवाड़

कोर्ट के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि 12 फरवरी से बोर्ड परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं, ऐसे संवेदनशील समय में शिक्षकों के तबादलों से न केवल टीचर्स बल्कि लाखों विद्यार्थियों की पढ़ाई पर सीधा और नकारात्मक असर पड़ रहा है।

याचिकाकर्ता मैना गढ़वाल और महेश कुमार सीकर में लेक्चरर पद पर कार्यरत थे।

मैना गढ़वाल का तबादला चूरू

जबकि महेश कुमार का तबादला बीकानेर कर दिया गया,
जिससे उनकी शैक्षणिक जिम्मेदारियों और छात्रों की तैयारी दोनों प्रभावित हुई।

पहले भी दे चुका है हाईकोर्ट कड़ा संदेश

यह पहला मौका नहीं है जब हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर सरकार और अफसरशाही को कटघरे में खड़ा किया हो। इससे पहले भी राजस्थान हाईकोर्ट एक रिपोर्टेबल ऑर्डर में

प्रदेश में स्पष्ट ट्रांसफर पॉलिसी के अभाव,

शैक्षणिक सत्र के बीच सामूहिक तबादलों,

और राजस्थान सिविल सर्विस अपीलेट ट्रिब्यूनल (रेट) की कार्यशैली
पर गंभीर सवाल उठा चुका है।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि देश के अधिकांश राज्यों में कर्मचारियों, विशेषकर शिक्षकों के तबादलों को लेकर न तो कोई व्यापक नीति है और न ही ठोस नियम। जबकि राज्य से यह अपेक्षा की जाती है कि वह संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप सुशासन को बढ़ावा दे।

अब हाईकोर्ट की इस सख्ती के बाद यह साफ हो गया है कि नेताओं की सिफारिशों पर की जा रही अफसरशाही की चाकरी अब न्यायिक जांच के घेरे में है, और आने वाले दिनों में सरकार को इसका ठोस जवाब देना ही होगा।

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