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विधानसभा में ‘फागुन’ के रंगों से सजी मुख्यमंत्री की कविता, विकास के रंग और विपक्ष पर व्यंग्य की बौछार

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जयपुर। राजस्थान विधानसभा में एप्रोप्रिएशन बिल पर बहस का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने इस बार परंपरागत भाषण के बजाय कविता के माध्यम से अपनी बात रखी। फागुन और होली के प्रतीकों से सजी इस कविता में उन्होंने सरकार के दो वर्षों के कामकाज का उल्लेख करते हुए विपक्ष पर तीखा व्यंग्य किया। कविता में ‘रंग’, ‘फागुन’, ‘सच’, ‘विकास’ और ‘सेवा’ जैसे प्रतीकों के जरिए राजनीतिक संदेश देने का प्रयास किया गया।

मुख्यमंत्री ने कविता की शुरुआत फागुन और होली के प्रतीकों से करते हुए की—“फागुन आया, रंग लाया, सच का दर्पण संग लाया।” इसके माध्यम से उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि सदन में सच सामने आएगा और सरकार के कामकाज का प्रतिबिंब दिखाई देगा। आगे की पंक्तियों में उन्होंने अपनी सरकार के काम को “पसीने से घोला गया रंग” बताते हुए कहा कि जनता के सपनों को मेहनत से आकार दिया गया है।

कविता का बड़ा हिस्सा विपक्ष पर राजनीतिक कटाक्ष से भरा रहा। मुख्यमंत्री ने विपक्ष को “हर मौसम में काला” बताते हुए कहा कि होली जैसे उत्सव में भी विपक्ष रंग नहीं, बल्कि आरोपों का जंजाल फैलाता है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार आंकड़ों और काम के आधार पर बात करती है, जबकि विपक्ष केवल शोर मचाता है।

कविता के अगले हिस्से में उन्होंने पिछली सरकार पर सीधे आरोप लगाते हुए पेपर लीक, भ्रष्टाचार, आपसी खींचतान और तुष्टिकरण की राजनीति का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पिछली सत्ता के दौरान युवाओं की मेहनत के बावजूद प्रश्नपत्र बिकते रहे और व्यवस्था कमजोर पड़ गई थी। साथ ही उन्होंने बेरोजगारी, महंगाई और कानून-व्यवस्था को लेकर भी पूर्व सरकार पर निशाना साधा।

इसके बाद मुख्यमंत्री ने वर्तमान सरकार की उपलब्धियों को कविता के माध्यम से गिनाया। उन्होंने दावा किया कि अब पेपर लीक पर सख्त रोक लगी है, भर्ती प्रक्रियाएं पारदर्शी हुई हैं और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खुले हैं। “राइजिंग राजस्थान” जैसे निवेश और विकास के अभियानों का उल्लेख करते हुए उन्होंने राज्य में उद्योग और निवेश बढ़ने का दावा किया।
कानून-व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने कहा कि अब अपराधियों और माफिया पर सख्त कार्रवाई हो रही है और कानून का राज स्थापित हुआ है। किसानों के लिए सिंचाई, बीज और सहायता योजनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने गांवों तक विकास पहुंचाने का दावा किया।

कविता में कई पंक्तियाँ बार-बार दोहराई भी गईं, जैसे—“होली है तो सच भी बोलें, रंग नहीं अब मुखौटे खोलें”, “हम पर छींटे जितने मारो, हम उतना ही और निखरेंगे” और “कर्म ही असली रंग हमारे।” इन दोहरावों के जरिए मुख्यमंत्री ने यह संदेश देने की कोशिश की कि उनकी सरकार सेवा और काम के आधार पर राजनीति कर रही है।


कविता के अंतिम हिस्से में उन्होंने विपक्ष को चेतावनी देते हुए कहा कि जनता सब देख रही है और अब भ्रम फैलाने की राजनीति ज्यादा दिन नहीं चलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि रंग बदलना आसान है, लेकिन जनता का भरोसा एक बार मिल जाए तो उसे मिटाना असंभव है।


सदन में प्रस्तुत यह कविता राजनीतिक संदेशों से भरपूर रही, जिसमें होली के रंगों के बहाने सरकार की उपलब्धियों का बखान और विपक्ष पर तीखे व्यंग्य दोनों नजर आए।

फागुन और रंगों के बहाने सत्ता-विपक्ष पर व्यंग्य

फागुन आया, रंग लाया, सच का दर्पण संग लाया।
आज सदन में रंग बिखरें हैं, सच के चेहरे खुद निखरें हैं।

हमने पसीने से रंग घोला, धरती पर विश्वास बोला।
जनता के हर एक सपने को, मेहनत से आकार पिरोया।

पर उधर विपक्ष निराला है, हर मौसम में काला है।
होली में भी रंग नहीं, केवल आरोपों का जंजाला है।

हम गुलाल विकास का लाएँ, वे भ्रम की धूल उड़ाएँ।
हम आंकड़ों से बात करें, वे बस शोर मचाएँ, चिल्लाएँ।

इनकी पिचकारी में पानी कम, ज्यादा केवल हवा भरी।
जब-जब सच का रंग चढ़े, इनका नक़ली रंग झड़े।

दो बरस में काम किया है, धरती ने परिणाम दिया है।
मुद्दों में जिनकी पकड़ नहीं, वे बस आरोपों में उलझे रहे।

होली है, तो सच भी बोलें, रंग नहीं अब मुखौटे खोलें।
जनता की आँखें तेज बहुत हैं, अब छल के रंग नहीं घोले।

हम पर छींटे जितने मारो, हम उतना ही और निखरेंगे।
सेवा का रंग गहरा होता, ये रंग कभी ना उतरेंगे।

फागुन की यह गूंज पुकारे, कर्म ही असली रंग हमारे।
जो केवल भाषण रंगते हैं, वक्त उन्हें खुद ही उतारे।

आज होली पर इतना कह दूँ, रंग बदलना आसान बहुत।
पर जनता का जो रंग चढ़े, उसे मिटाना असंभव है।

पूर्व सरकार पर आरोप और वर्तमान सरकार के कामों का उल्लेख

फागुन आया, रंग लाया, सच का दर्पण संग लाया।
आज सदन में रंग बिखरें हैं, सच के चेहरे खुद निखरें हैं।

हमने पसीने से रंग घोला, धरती पर विश्वास बोला।
जनता के हर एक सपने को, मेहनत से आकार पिरोया।

पर पिछली सत्ता का हाल निराला, पेपर लीक का खेल ही काला।
मेहनत करती थी युवा पीढ़ी, प्रश्नपत्र बिके, व्यवस्था ढीली।

भ्रष्टाचार के रंग चढ़ाए, अपनों में ही तीर चलाए।
आपसी लड़ाई, कुर्सी की जंग, जनता रही बस देखती दंग।

तुष्टिकरण की चली पिचकारी, वोटों की थी पूरी तैयारी।
न न्याय मिला, न रोज़गार, बेरोज़गारी का बढ़ता भार।

महंगाई से घर-घर रोया, अपराध ने खुलकर पाँव पसाराया।
कानून व्यवस्था मौन खड़ी थी, आम जन की आवाज़ दबी थी।

अब बदला है रंग जमाना, सेवा को हमने धर्म माना।
पेपर लीक पर रोक कड़ी है, भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी खड़ी है।

रोज़गार के द्वार खुलाए, युवाओं के सपने सजाए।
“राइजिंग राजस्थान” का नारा, निवेश, उद्योग, विकास हमारा।

अपराध पर अब प्रहार हुआ, कानून का फिर से राज हुआ।
माफिया चाहे कितना दौड़े, कानून के आगे घुटने जोड़े।

किसानों के खेतों में खुशहाली, सिंचाई, बीज और मदद निराली।
मेहनतकश का सम्मान बढ़ाया, गाँव-गाँव तक विकास पहुँचाया।

हम आंकड़ों से बात करें, काम के रंग दिन-रात भरें।
वे केवल शोर मचाते हैं, झूठे रंग उछाल छिपाते हैं।

सदन में जो गरजे थे तुम, “चौकड़ी भुला दूँगा” कहकर।
इतिहास बदलने निकले थे, जनता ने चौकड़ी तुम्हें भुला दी।

तुम भूलाने की बात करोगे, हम याद दिलाने आए हैं।
किसने क्या किया प्रदेश में, सब हिसाब बताने आए हैं।

आज होली पर चेतावनी है, अब भ्रम का बाज़ार नहीं चलेगा।
जनता का विश्वास जो जीता, उसे कोई साज़िश से नहीं ढहाएगा।

होली है तो सच भी बोलें, रंग नहीं अब मुखौटे खोलें।
जनता की आँखें तेज बहुत हैं, अब छल के रंग नहीं घोलें।

हम पर छींटे जितने मारो, हम उतना ही और निखरेंगे।
सेवा का रंग गहरा होता, ये रंग कभी ना उतरेंगे।

फागुन की यह गूंज पुकारे, कर्म ही असली रंग हमारे।
जो केवल भाषण रंगते हैं, वक्त उन्हें खुद ही उतारे।

होली है तो हँस भी लें हम, थोड़ा व्यंग्य भी घोल चलें।
रंग बदलने वालों को देखो, पहले पानी से ही धुल चलें।

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