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राजपूताना से राजस्थान विषय पर गोष्ठी, इतिहास के पुनर्पाठ पर जोर

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24 News Update उदयपुर। राजस्थान दिवस के अवसर पर राजपूताना से राजस्थान विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हुए वक्ताओं ने इतिहास लेखन में सुधार और पुनर्पाठ की आवश्यकता बताई। कार्यक्रम का आयोजन राजस्थान विद्यापीठ एवं भारतीय इतिहास संकलन समिति, उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।
मुख्य अतिथि डॉ. बालमुकुंद पांडे ने कहा कि इतिहास लेखन के माध्यम से भारत की ज्ञान परंपरा, संघर्ष क्षमता और स्वाभिमान को कमजोर करने के प्रयास हुए हैं, जबकि भारतीय समाज ने कभी दासता को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि इतिहास में केवल सत्ता परिवर्तन से जुड़े युद्धों को प्रमुखता मिली, जबकि अनेक संघर्षों और बलिदानों को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया। उन्होंने विकृत इतिहास को व्यवस्थित कर त्रुटिरहित बनाने की आवश्यकता जताई, ताकि समाज अपने वास्तविक अतीत से परिचित हो सके।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. एस. एस. सारंगदेवोत ने कहा कि इतिहास केवल तिथियों और युद्धों का विवरण नहीं, बल्कि समाज की जीवंत परंपराओं और मूल्यों का प्रतिबिंब है। उन्होंने महाराणा प्रताप के जीवन को स्वाभिमान और संघर्ष की परंपरा का उदाहरण बताया तथा मेवाड़ में एकलिंगजी को राज्य का स्वामी मानने और शासकों द्वारा स्वयं को ‘दीवान’ कहने की परंपरा को उत्तरदायित्व और सेवा भावना का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि राजपूताना की परंपरा में लोकतंत्र की जड़ें निहित हैं।
मुख्य वक्ता प्रो. शिव कुमार मिश्रा ने कहा कि राजस्थान के इतिहास को समझने के लिए प्राचीन काल से चली आ रही एकीकरण प्रक्रिया और बाहरी आक्रमणों के विरुद्ध संघर्षों को समग्र रूप में देखना आवश्यक है। उन्होंने बसंतगढ़ क्षेत्र के साक्ष्यों का उल्लेख करते हुए प्राचीन सभ्यता और गणतांत्रिक परंपराओं की उपस्थिति बताई तथा महाराणा सांगा के नेतृत्व में हुए युद्धों को ऐतिहासिक निरंतरता का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि राजस्थान का निर्माण एक चरणबद्ध प्रक्रिया थी, जिसमें विभिन्न रियासतों के विलय के साथ जनसहभागिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
इससे पूर्व विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. मनीष श्रीमाली ने कहा कि राजपूताना से राजस्थान की यात्रा में चित्तौड़गढ़ दुर्ग का विशेष महत्व रहा है और मध्यकालीन संघर्ष तथा एकीकरण की प्रक्रिया इस यात्रा के प्रमुख आधार रहे हैं।
कार्यक्रम की शुरुआत में प्राचार्य प्रो. सरोज गर्ग ने अतिथियों का स्वागत किया। इस अवसर पर डॉ. प्रियंका कोठारी एवं डॉ. पोवेल भारद्वार द्वारा लिखित पुस्तक फोरेंसिक इनसाइट्स का विमोचन किया गया।
गोष्ठी में इतिहास संकलन समिति के महानगर अध्यक्ष डॉ. महामाया प्रसाद चैबीसा, महानगर मंत्री दीपक शर्मा, जिला मंत्री चेनशंकर दशोरा, प्रांत महासचिव डॉ. विवेक भटनागर, डॉ. मनीष श्रीमाली, गौरी शंकर दवे, प्रो. दिग्विजय भटनागर, रमेश शुक्ला, प्रो. सरोज गर्ग, प्रो. बलिदान जैन, प्रो. अमी राठौड, प्रो. रचना राठौड, प्रो. भूरा लाल श्रीमाली सहित इतिहासविद, शिक्षाविद, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। संचालन डॉ. हरीश चौबीसा ने किया तथा आभार डॉ. रचना राठौड ने व्यक्त किया।

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