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महाराज शत्रुदमन सिंह शिवरती की हस्तलिखित पुस्तक ‘साधक सोपान’ का विमोचन बाली (इंडोनेशिया) में

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24 News update उदयपुर। मेवाड़ राजपरिवार के संत तुल्य दिव्यपुरुष स्वर्गीय महाराज शत्रुदमन सिंह शिवरती द्वारा हस्तलिखित ग्रंथ ‘साधक सोपान’ (श्रीमद्भगवद्गीता की टीका) का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विमोचन इंडोनेशिया के पौराणिक स्थल बाली में किया गया। यह ग्रंथ जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय, उदयपुर द्वारा प्रकाशित किया गया है।
यह पुस्तक महाराज शिवरती द्वारा लगभग 20 वर्षों के श्रमसाध्य लेखन का परिणाम है। उन्होंने अपने पूर्वजों संत शिरोमणि मीरा बाई और लोकसंत बावजी चतुरसिंह जी की आध्यात्मिक परंपरा से प्रेरणा लेकर इस ग्रंथ की रचना की।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर हुआ आध्यात्मिक विमोचन
‘साधक सोपान’ का विमोचन सुग्रीवा हिन्दू विश्वविद्यालय, डेनपसार (बाली) में आयोजित समारोह में किया गया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. डी. आर. एस. आई. गुस्ती नागुरा, डॉ. आई. मेड धर्मयसा (रासा आचार्य एवं कुलपति), प्रो. मुरली मनोहर पाठक (कुलपति, एल.बी.एस.एन.एस.यू. एवं महासचिव, वैश्विक संस्कृत मंच), प्रो. श्री प्रकाश सिंह (कुलपति), डॉ. शशांक ए. (कौंसुल जनरल ऑफ इंडिया), डॉ. वयान मिडिओ (लेफ्टिनेंट जनरल, इंडोनेशिया), तथा प्रो. राजेश मिश्रा (सचिव, ग्लोबल संस्कृत फोरम) सहित कई वेद, उपनिषद, भगवद्गीता एवं संस्कृत के विद्वान उपस्थित रहे।

प्रो. अजातशत्रु सिंह शिवरती ने किया मेवाड़ का प्रतिनिधित्व
मेवाड़ से शिवरती घराने के प्रो. अजातशत्रु सिंह शिवरती, निदेशक – शिवरती शोध संस्थान, ने इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर मेवाड़ का प्रतिनिधित्व किया।
उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि – “प्राचीन काल में मेवाड़ और बाली जैसी सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक और वैचारिक आदान-प्रदान के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। वैदिक ज्ञान, योग और सनातन धर्म की विचारधारा ने न केवल भारत में बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया में भी गहरा प्रभाव डाला। बाली की परंपराएँ — जहाँ हिन्दू धर्म, अध्यात्म और सामूहिक जीवन के मूल्य आज भी जीवित हैं — भारत की सनातन संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई हैं। यह समानता इस बात का प्रतीक है कि भारत का सांस्कृतिक प्रकाश सीमाओं से परे जाकर इंडोनेशिया जैसे द्वीपीय राष्ट्रों तक भी फैलता रहा है।”

संस्कृति और अध्यात्म का संगम
विमोचन समारोह में भारत और इंडोनेशिया के अनेक संस्कृतविद, शोधार्थी, शिक्षाविद और पत्रकार उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में बाली की पारंपरिक झलक लिए एक सांस्कृतिक प्रस्तुति भी आयोजित की गई, जिसमें भारत-इंडोनेशिया की साझा आध्यात्मिक विरासत को अभिव्यक्त किया गया।

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