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सुभाषनगर से पासपोर्ट सेवा केंद्र “TATA-बाय-बाय गया….”, उदयपुर से विश्वासघात, शतुर्मुर्ग बने जन प्रतिनिधि, जनता को लगा करोड़ों का चूना, नगर निगम मूकदर्शक

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24 न्यूज अपडेट, उदयपुर।
उदयपुर की जनता के साथ गहरा विश्वासघात हो रहा है।

2016 में जनता के पैसों से बनाए गए सामुदायिक भवन को नगर निगम ने विदेश मंत्रालय को मात्र एक रुपये टोकन मनी पर 20 साल की लीज पर दिया और पासपोर्ट सेवा केंद्र की जो खुशियां आईं थीं, अब वे उदयुपर के अवसरवादी नेताओं, शुतुमुर्ग की तरह मुंह छिपाए बैठे जन प्रतिनिधियों व जी हुजूरी में डूबे अफसरों की घोर लापरवाही से अब बहुत बड़ा दंश बन गई है।

सिस्टम के उस्तादों के हाथों उदयपुर की जनता सरेआम, दिन हादड़े ठग ली गई है। सिस्टम में उपर बैठे लोगों ने बहुत ही सिस्टमैटिक तरीके से उदयपुरवासियों को लाखों का चूना लगा महामूर्ख बना दिया।

उदयपुर की इमोश्नल महामूर्ख जनता तो केवल 1 रूपए के टोकन मनी पर बहुत बड़ा जश्न व उत्सव मनाते हुए सरकार को उपकृत करते हुए पासपोर्ट सेवा केंद्र की सौगात उदयपुर दिलवा खुश हुई थी जिस पर अब ग्रहण लग गया है।

अब कुछ मतलबी, सरकारी महाभ्रष्ट तत्वों ने अफसरों से मिलीभगत करते हुए एक निजी कंपनी को हमारी बरसो ंकी मेहनत ऐसे सौंप दी जैसे इसमें कभी हमारी मेहनत थी ही नहीं, जैसे हमारे कभी इमोशन इसमें मिले-घुले हुए ही नहीं थे।

पांचवी फेल बच्चा भी इस चाल को समझ सकता है, वो चाल यहां के जन प्रजतिनिधियों व कर्णधारो ंको समझ नहीं आ रही है। कमाल है।

ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत ही नहीं है। पासपोर्ट सेवा केंद्र जो एक रूपए में किराए के टोमन मनी पर चल रहा था उसको अब किराए के भवन पर लाखों का किराया देते हुए शिफ्ट कर दिया गया है।

जनता के पैसों से सुभाष नगर में सामुदायिक भवन बनवाया, जनता के पैसों से सुविधाएं जुटाईं, करोड़ों खर्च जनता के हुए। अब सरकारी फरमान लाकर जनता को डबल चूना लगा कर दफ्तर लेकसिटी मॉल में शिफ्ट कर दिया गया है।

ये नया गणित आखिर आया कहां से? कौनसा अफसर नेताओं के संग, कॉरपोरेट प्रतिनिनिधियों के साथ चाय-पानी करते हुए बैठा यह जांच का विषय है।

सीधे सीधे कहें तो भाई, जनता को और कितना चूना लगाओगे। ये जिंदा मक्खी निगलने जैसी बात हो रही है।

और सबसे बड़ी बात है कि इसके कहीं चर्चे तक नहीं हैं। छोटी छोटी बात पर हाय तौबा मचाकर लोगों को बरगलाने वाले जन प्रतिनिधि, उछलने वाले यहां के धाकड़ नेता, सबके होंठ ना जाने कौनसे फेविकॉल से चिपका दिए गए हैं। उनमें उबाल क्यों नहीं आ रहा है?? ना पक्ष ना विपक्ष। क्या जबर्दस्त मिलीभगत का खेल है।


आपको याद दिला दें कि उदयपुर में पासपोर्ट सेवा केंद्र खुलना इस जीवंत शहर के किसी सपने का सच होने जैसा था। इस भवन का नाम तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने महाराणा प्रताप भवन यूं ही तो नहीं रखा होगा।

लेकिन यहां के नेताओं व अफसरों ने लाखों के किराए पर भवन की शिफ्टिंग का फैसला करके उस प्रतापी आभा को ही धुमिल करने का काम कर दिया है।

उदयपुर में वर्ष 2015 में पासपोर्ट केन्द्र खोलने की फाइल तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को उदयपुर में हुए एक कार्यक्रम में सौंपते विस में नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया व उदयपुर के महापौर चन्द्रसिंह कोठारी। इसके बाद कार्यक्रम में ही स्वराज ने उदयपुर में पासपोर्ट केन्द्र खोलने की घोषणा की थी। दोनों नेताओं ने जन आंदोलन का स्वरूप देते हुए इसके लिए दिन रात एक कर दिया था।

जब भवन की बात आई तो नगर निगम ने सुभाषनगर में जनता के टैक्स से करीब 39 लाख रुपये खर्च कर सामुदायिक भवन को ही आनन फानन मे पासपोर्ट कार्यालय के अनुरूप तैयार करवाया था। इसमें लिफ्ट लगवाई, वेटिंग एरिया बनाया, सुविधाएं जोड़ीं।

उसके बाद केवल एक रूपए की टोकन मनी पर भवन पासपोर्ट बनवाने के लिए दे दिया गया। सामुदायिक भवन का सारा क्षेत्रफल एरिया 7328 स्क्वायर फीट पासपोर्ट सेवा केंद्र के ही काम आ रहा था।

ग्राउंड फ्लोर पर जो गेट के पास ओपन एरिया बता रखा है, उस पर भी पब्लिक के लिए वेटिंग एरिया बनवाया हुआ है, जहां जनता के लिए सुविधायुक्त बैठने की व्यवस्था की हुई हैं। जो नक्शे में नहीं दर्शाया हुआ है। इस पर भी निगम ने अतिरिक्त लगभग दस लाख रुपए खर्च कर आम जन हितार्थ सुविधा की ,जिसका खर्च निगम ने ही किया है।

लेकिन आज यही पासपोर्ट सेवा केंद्र को लेकसिटी मॉल में शिफ्ट किया जा रहा है। कल उसका उद्घाटन होना है।

बड़ा सवाल यह है कि जनता से वसूले गए करोड़ों रुपये का हिसाब कौन देगा और उदयपुर की जनता को इस विश्वासघात का जिम्मेदार कौन है?


2022 में खेल शुरू हुआ

आपको बता दें कि 2022 में पासपोर्ट सेवा का नया वर्जन 2.0 आया और इसके लिए टीसीएस को 10 साल का टेंडर मिला। इसके बाद टीसीएस ने इस कार्यालय का टेकओवर कर लिया और नगर निगम व विदेश मंत्रालय के बीच चल रही लीज डीड को अपने नाम ट्रांसफर करवाने की मांग की।

निगम ने यह कहते हुए आपत्ति जताई कि निजी कंपनी को लीज ट्रांसफर नहीं हो सकती।

इसी दौरान किराए का मुद्दा उठा। निगम ने डीएलए रेट के अनुसार 1,52,000 रुपये प्रतिमाह किराया तय किया, जबकि टीसीएस मात्र 60,000 रुपये देने को तैयार थी। इस पर महीनों तक पत्राचार चलता रहा, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला।


बकाया करोड़ों रुपये का हिसाब कौन देगा?

आज की स्थिति यह है कि 1.52 लाख रुपये प्रतिमाह किराया लगातार बकाया है। पिछले 36 महीनों का किराया $ जीएसटी नहीं मिला।

ऐसे में लगभग एक करोड़ रुपये निगम को मिलने चाहिए थे, जो अब तक अटके हुए हैं। यही नहीं 2016 में भवन पर खर्च हुए 39 लाख रुपये की राशि भी विदेश मंत्रालय ने आज तक नहीं लौटाई।

यानी कुल मिलाकर उदयपुर की मासूम जनता का पैसा करोड़ों में डूब गया है। सवाल है कि यह रकम कौन वसूल करेगा? कार्यालय में स्थापित पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर का क्या होगा?

निगम की देनदारी और बकाया

निगम की ओर से 40 लाख रुपये कैश तथा जुलाई 2022 से टीसीएस के संचालन की राशि लगभग 1 करोड़ रुपये लंबित है। 36 महीने का बकाया किराया (1.52 लाख प्रतिमाह) और उस पर जीएसटी भी बाकी है। सवाल यह है कि इतने बड़े बकाया को किसने एग्जेम्पट किया और केवल कागजी जमा-खर्च पर क्यों छोड़ दिया गया।


मॉल में शिफ्ट – जनता के साथ धोखा

अब पासपोर्ट सेवा केंद्र को लेकसिटी मॉल में शिफ्ट किया जा रहा है। यह कदम जनता की सुविधाओं पर कुठाराघात है।

सुभाष नगर स्थित भवन में आराम से वाहन खड़े हो सकते थे, पार्किंग मुफ़्त थी। मॉल में पार्किंग महँगी और सीमित है। सामुदायिक भवन में वेटिंग एरिया और बैठने की जगह थी, मॉल में यह संभव नहीं।

भीड़ और ट्रैफिक से आम लोगों की परेशानी बढ़ेगी।


जनता पूछ रही है सवाल

जब पहले से बेहतर सुविधा उपलब्ध थी तो निजी मॉल में क्यों धकेला जा रहा है? साफ है कि निजी आदमी को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिए यह सब किया जा रहा है।

इसमें नेताओं, जन प्रतिनिधियों व अफसरों तक की भयंकर मिलीभगत है।


नेताओं और मंत्रालय की बेरुख़ी

सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि उदयपुर के जनप्रतिनिधि खामोश बैठे हैं। किसी विधायक, सांसद या पार्षद ने इस मुद्दे पर आवाज़ नहीं उठाई।

उद्घाटन जैसे औपचारिक कार्यक्रमों में भी जनप्रतिनिधि दूरी बनाए हुए हैं ताकि जनता में यह संदेश जाए कि वे तो पक्ष में ही नहीं थे। जबकि ऐसा होने से रोकने की पूरी की पूरी जिम्मेदारी उनकी थी जिसमें वे भयंकर तरीके से विफल रहे।

सवाल उठ रहा है कि विदेश मंत्रालय के अधिकारी पूरे मामले को “मैनेज” करके चुपचाप शिफ्टिंग करवा रहे हैं।

जनता का गुस्सा साफ है व नेताओं की चुप्पी बताती है कि वे या तो मिलीभगत में हैं या उन्हें जनता के दर्द की कोई परवाह नहीं।


कोटा में पासपोर्ट केंद्र खुलाना भी था धोखा

उदयपुर का पासपोर्ट सेवा केंद्र सिर्फ शहर ही नहीं, पूरे मेवाड़ और आदिवासी अंचल की जरूरत था। यहां रोज़ाना 250 आवेदन आते हैं। जबकि कोटा में मुश्किल से 60-70 आवेदन होते हैं। ऐसे में कोटा का जो रीजनल पासपोर्ट केंद्र है वह भी उदयपुर के भरोसे ही चल रहा है। तब भी हाई पावर जैक के चलते उदयपुर के नेता पानी भरते रह ेगए और केंद्र कोटा चला गया। सवाल यह उठता है कि क्या मेवाड के नेता हर बार चुप्पी साधने और पानी भरते रहने के लिए ही चुने गए हैं।

आखिर कब वे निर्णाय मामलों में खुद उठ खड़े होकर जनता के मन की बात करने का साहस करेंगे???


जनता का सवाल, मामले की जांच कौन कराएगा? शिफ्टिंग का रहस्य : कौन है असली लाभार्थी?


टैक्स जनता दे, मज़ा प्राइवेट कंपनियां लें?

यह पूरा प्रकरण दिखाता है कि उदयपुर की जनता टैक्स देती है, निगम इमारतें बनाता है, पर फायदा कोई और उठाता है।

यदि यही चलता रहा तो कल हर सरकारी दफ्तर मॉल और फाइव स्टार होटल में चला जाएगा।

जनता पूछ रही है कि –
“आठ साल पहले जनता के पैसों से जो भवन बना, उसका हिसाब कौन देगा?”

कौन देगा जनता की पाई-पाई का हिसाब?”
“क्यों जनता के हितों से समझौता कर निगम और मंत्रालय चुप बैठे हैं?”
“किसके दबाव में सब कुछ हो रहा है?”

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