उदयपुर, 23 फरवरी। कृषि में घटते जल संसाधनों और बढ़ती लागत के बीच किसानों को कम पानी में अधिक उत्पादन के गुर सिखाने के उद्देश्य से महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशालय के अंतर्गत संचालित अखिल भारतीय समन्वित सिंचाई जल प्रबंधन अनुसंधान परियोजना द्वारा एक दिवसीय किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम कृषि विज्ञान केन्द्र, चित्तौड़गढ़ द्वारा गोद लिए गए गांव पायरी (बड़ी सादड़ी) में सम्पन्न हुआ।
सिंचाई जल की गुणवत्ता पर विशेष जोर
परियोजना प्रभारी डॉ. के.के. यादव ने किसानों को सिंचाई जल के बहु-स्तरीय उपयोग और उसकी गुणवत्ता के महत्व पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जल की सही जांच, उचित मात्रा और समय पर सिंचाई से न केवल उत्पादन बढ़ाया जा सकता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है।
कम पानी में अधिक पैदावार के उपाय
कृषि विज्ञान केन्द्र, चित्तौड़गढ़ के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रतनलाल सोलंकी ने संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उचित उर्वरक उपयोग और वैज्ञानिक पद्धतियों से कम जल में भी बेहतर उत्पादन संभव है।
स्वचालित भूमिगत ड्रिप पद्धति पर प्रशिक्षण
प्रौद्योगिकी एवं अभियांत्रिकी महाविद्यालय, उदयपुर के डॉ. मनजीत सिंह ने स्वचालित भूमिगत ड्रिप सिंचाई प्रणाली के माध्यम से जल बचत और फसल उत्पादकता बढ़ाने के नवीनतम तरीकों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह तकनीक जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के साथ श्रम और लागत दोनों को कम करती है।
सब्जी फसलों में ड्रिप फर्टिगेशन की जानकारी
नाबार्ड बाड़ी परियोजना के जिला समन्वयक श्री महेश पंवार ने सब्जी फसलों में ड्रिप फर्टिगेशन तकनीक के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने आगामी गर्मी सीजन में भिंडी, टिंडा, तरोई, ग्वारफली और लौकी जैसी फसलों की वैज्ञानिक खेती, सिंचाई प्रबंधन और देखभाल के व्यावहारिक सुझाव दिए।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में कुल 50 किसानों ने सक्रिय भागीदारी की और विशेषज्ञों से सीधे संवाद कर अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त किया।
कार्यक्रम की जानकारी मीडिया प्रकोष्ठ एवं जनसंपर्क अधिकारी डॉ. जी.एल. मीना द्वारा दी गई।

