Site icon 24 News Update

कब तक छिपाओगे सच : डीपीएस जमीन आवंटन घोटाले की जांच रिपोर्ट दबा कर बैठे गए यूडीए के भ्रष्ट अफसर, सूचना आयोग ने फटकारा, 30 दिन में जानकारी देने के आदेश

Advertisements

24 News Update उदयपुर। उदयपुर विकास प्राधिकरण (यूडीए) द्वारा डीपीएस स्कूल की जमीन से जुड़े आवंटन शर्तों और अनियमितताओं पर बनी जांच रिपोर्ट शिकायतकर्ता से छिपाने का मामला गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। राज्य सूचना आयोग ने प्राधिकरण को फटकार लगाते हुए आदेश दिया है कि पूरी रिपोर्ट 30 दिन के भीतर आवेदक को उपलब्ध कराई जाए।
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब देश के जाने माने आरटीआई एक्टिविस्ट और पत्रकार जयवंत भेरविया ने डीपीएस स्कूल को आवंटित जमीन की शर्तों की पालना न करने, अनियमितताओं और गड़बड़ियों की शिकायत सीधे राज्य के मुख्य सचिव को भेजी। शिकायत में जमीन आवंटन निरस्त करने की भी मांग की गई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने उदयपुर विकास प्राधिकरण को जांच आदेश जारी किया। इसके बाद तत्कालीन आयुक्त राहुल जैन ने मंगलम एजुकेशन सोसायटी (डीपीएस) को आवंटित भूमि की जांच के लिए सात सदस्यीय कमेटी का गठन किया।

जांच कमेटी में शामिल सदस्य
हेमेंद्र नागर-सचिव, प्राधिकरण (अध्यक्ष)
जितेंद्र ओझा-जोन उपायुक्त (सदस्य)
श्रीमती बिंदुबाला-प्रभारी अधिकारी, बिक्री शाखा (सदस्य)
अभिनव शर्मा -तहसीलदार, प्राधिकरण (सदस्य)
बाबूलाल तेली, राजेंद्र सेन और सूरपाल सिंह सोलंकी -भू-अभिलेख निरीक्षक एवं पटवारी (सदस्य)
इस कमेटी ने भूमि आवंटन, मौके पर भूमि की उपलब्धता और शर्तों की पालना की बारीकी से जांच कर 10 दिनों में अपनी तथ्यात्मक रिपोर्ट आयुक्त को सौंपी और राज्य सरकार को भेज दी।
लेकिन विवाद यहीं से शुरू हुआ। पत्रकार जयवंत भेरविया ने इस जांच रिपोर्ट की सत्यापित प्रति सूचना के अधिकार (त्ज्प्) के तहत मांगी। नियम के मुताबिक, प्राधिकरण के लोक सूचना अधिकारी हेमेंद्र नागर को 30 दिन में सूचना देनी थी, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। जब प्रथम अपील आयुक्त राहुल जैन के समक्ष की गई, तब भी सुनवाई नहीं हुई।
इसके बाद मामले को राज्य सूचना आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया गया। आयोग ने सुनवाई के बाद स्पष्ट आदेश दिए कि प्राधिकरण 30 दिन में रिपोर्ट उपलब्ध कराए।

गंभीर सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि उदयपुर विकास प्राधिकरण शिकायतकर्ता और आरटीआई आवेदक से जांच रिपोर्ट क्यों छिपा रहा है? यदि रिपोर्ट राज्य सरकार को भेज दी गई थी तो उसे सार्वजनिक करने में क्या आपत्ति है? अब उपर से आदेश आने पर देनी पड़ेगी तो पहले ही क्यों नहीं दे दी। क्या प्राधिकरण के भीतर कहीं भ्रष्ट अफसरों की मिलीगत से राजनीतिक संरक्षण में डीपीएस स्कूल प्रबंधन को बचाने या लाभ पहुंचाने की मंशा तो नहीं है? इस पूरे प्रकरण ने न केवल उदयपुर विकास प्राधिकरण की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं, बल्कि यह भी उजागर किया है कि आरटीआई कानून को लेकर सरकारी दफ्तरों की लापरवाही किस तरह जनता की जानकारी के अधिकार को कुचल रही है। अब देखना होगा कि सूचना आयोग के आदेश के बाद प्राधिकरण सच सामने लाता है या फिर इस मामले में और पेच उलझते हैं।

Exit mobile version