24 News Update जयपुर। देश में साइबर अपराधों की बढ़ती जांच के नाम पर आम नागरिकों के बैंक खाते फ्रीज किए जाने की कार्रवाई पर राजस्थान हाईकोर्ट ने कड़ा और दूरगामी फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति का पूरा बैंक खाता फ्रीज करना न तो कानूनी है और न ही संविधान सम्मत।
हाईकोर्ट ने राजस्थान पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि अब साइबर अपराध के मामलों में बैंक खाता फ्रीज करने से पहले मजिस्ट्रेट की अनुमति अनिवार्य होगी। बिना न्यायिक आदेश के की गई ऐसी कार्रवाई कानून का खुला उल्लंघन मानी जाएगी।
पुलिस नहीं, मजिस्ट्रेट के पास अधिकार
जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने अपने ऐतिहासिक आदेश में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं की व्याख्या करते हुए कहा कि धारा 106 के तहत पुलिस को केवल सीमित जब्ती (Seizure) का अधिकार है।
जबकि धारा 107 के अंतर्गत किसी भी प्रकार की अटैचमेंट, डेबिट फ्रीज या पूर्ण खाता फ्रीज करने का अधिकार केवल मजिस्ट्रेट को प्राप्त है, पुलिस को नहीं।
कोर्ट ने दो टूक कहा कि मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना किसी भी बैंक खाते को पूरी तरह फ्रीज करना अवैध है।
पूरे खाते पर रोक ‘अनुचित और असंगत’
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी खाते में केवल एक सीमित राशि ही संदिग्ध है, तो पूरे खाते को फ्रीज करना न तो तार्किक है और न ही न्यायसंगत।
ऐसी स्थिति में केवल विवादित राशि पर लियन या होल्ड लगाया जाना चाहिए, ताकि व्यक्ति की रोजमर्रा की आजीविका प्रभावित न हो।
पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
कोर्ट ने कहा कि साइबर अपराध के नाम पर व्यापारियों और आम नागरिकों के खाते बड़े पैमाने पर फ्रीज किए जा रहे थे, जिससे पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
जस्टिस जैन ने अपने फैसले में युवाओं की गिरफ्तारी, खातों की फ्रीजिंग और भुगतान संस्थानों पर दबाव बनाने की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जताई।
हाईकोर्ट ने इस स्थिति को “न्याय के नाम पर प्रक्रिया का दुरुपयोग” बताते हुए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए।
क्या था मामला
हाईकोर्ट में दो अलग-अलग याचिकाओं के जरिए जमानत मांगी गई थी।
एक मामले में आरोपी धर्मेन्द्र चावड़ा था, जबकि दूसरे में विक्रम सिंह। दोनों ही मामलों में पुलिस ने साइबर अपराध के आरोपों में एफआईआर दर्ज की थी। पहले मामले में आरोप था कि एक बैंक खाते का इस्तेमाल साइबर ठगी के लिए हुआ। दूसरे मामले में पुलिस ने केवल मोबाइल फोन की तलाशी के आधार पर युवक को साइबर अपराध से जोड़ दिया।
चौंकाने वाली बात यह रही कि दोनों ही मामलों में न तो कोई वास्तविक पीड़ित सामने आया और न ही किसी ठगी की पुष्टि हुई। इसके बावजूद पुलिस ने गिरफ्तारी की और बैंकों, वॉलेट कंपनियों व पेमेंट एग्रीगेटर्स से जानकारी मांगते हुए खातों को फ्रीज करा दिया।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने बताया कि सिर्फ वर्ष 2025 में ही 100 से अधिक साइबर अपराध से जुड़े मामले जमानत स्तर पर उसके सामने आए।
इनमें से लगभग 80% मामलों में एफआईआर स्वयं पुलिस द्वारा दर्ज की गई थी और करीब 90% आरोपी पहली बार अपराध में नामजद किए गए युवा थे, जिनकी उम्र 18 से 30 वर्ष के बीच थी।
कोर्ट ने कहा कि अधिकांश आरोपी बेरोजगार या अल्प-आय वर्ग से आते हैं और उनके खिलाफ कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
कोर्ट की टिप्पणी थी—
“साइबर अपराध रोकने के नाम पर यदि निर्दोष युवाओं को जेल भेजा जाएगा, तो यह न्याय नहीं बल्कि सामाजिक अन्याय होगा।”
संविधान के अधिकारों पर चोट
हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस द्वारा सीधे बैंकों को पत्र लिखकर पूरा खाता फ्रीज कर देना न केवल BNSS का उल्लंघन है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और आजीविका के अधिकार पर सीधा आघात भी है।
डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर भी टिप्पणी
फैसले में NPCI, बैंकों, भुगतान एग्रीगेटर्स और वॉलेट कंपनियों की भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा की गई। कोर्ट ने कहा कि NPCI प्रतिमाह करोड़ों डिजिटल लेन-देन संभालता है और हर छोटे ट्रांजैक्शन की जानकारी मांगना न तो व्यावहारिक है और न ही कानूनी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि डिजिटल भुगतान प्रणाली आरबीआई और भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 के तहत संचालित होती है, न कि पुलिस के विवेक पर। यदि किसी संदिग्ध लेन-देन की जांच जरूरी हो, तो पुलिस को नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) और CFCFRMS प्रणाली के माध्यम से ही कार्रवाई करनी चाहिए।
‘ब्लैंकेट फ्रीजिंग’ पर सख्त …

