24 News Update उदयपुर। नगर निगम द्वारा आयड नदी के दोनों किनारों पर करीब 1.25 करोड़ रुपए की लागत से कराई जा रही चैनलिंक फेंसिंग अब पर्यावरण संरक्षण से ज्यादा अतिक्रमण को स्थायी रूप देने की कवायद के रूप में देखी जा रही है। हैरानी की बात यह है कि नदी का बिना वैधानिक सीमांकन किए बिना ही फेंसिंग कार्य तेज़ी से आगे बढ़ाया जा रहा है, जिससे नदी के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र पर पहले से मौजूद कब्जों को सरकारी मुहर मिलने का खतरा पैदा हो गया है।
शनिवार को नगर निगम आयुक्त अभिषेक खन्ना द्वारा एआरसी (एनुअल रिपेयर कॉन्ट्रैक्ट) के तहत कराए जा रहे विभिन्न विकास कार्यों का भौतिक सत्यापन किया गया। इस निरीक्षण में आयड नदी में चैनलिंक फेंसिंग और नाला टेपिंग कार्य भी शामिल रहा। आपको बता दें कि नदी के मूल प्रवाह क्षेत्र और उसकी वास्तविक चौड़ाई को लेकर अब तक कई दावे विधायक से लेकर अधिकारियों तक ने किए मगर जमीन पर अब तक कोई स्पष्ट सीमांकन सामने नहीं आया है। कोई रजवाडों का नक्शा बताता है तो कोई आजादी के बाद लगे मोटाम की याद दिलाता है जबकि यही किसी भी प्रकार के निर्माण से पहले की अनिवार्य शर्त है।
सीमांकन बिना फेंसिंग = कब्जे की हदबंदी
शहर के पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक आयड नदी की राजस्व और भौगोलिक सीमा तय नहीं होती, तब तक की गई कोई भी फेंसिंग वास्तव में नदी को नहीं, बल्कि अतिक्रमणकारियों की जमीन को सुरक्षित कर रही है। फेंसिंग के खंभे जहां-जहां गड़े हैं, वहीं भविष्य में यही नदी की सीमा है का तर्क खड़ा किया जा सकेगा—यानी आज की चूक कल का स्थायी दस्तावेज़। याने कल लोग कहेंगे कि सरकारी फेंसिंग है, यही तो सीमांकन है। हमने थोडे ना सीमांकन करवाया।
नाला टेपिंग बनाम प्राकृतिक नदी
निरीक्षण के दौरान आयड नदी में सीवर नाला टेपिंग कार्य का भी जायजा लिया गया। उद्देश्य बताया गया कि दूषित पानी को नदी में जाने से रोका जाए, लेकिन सवाल यह है कि जब नदी को प्राकृतिक स्वरूप में रहने ही नहीं दिया जा रहा। इतना पानी आने व नदी के ऐसी की तैसी होने के बाद भी उसमें भराव डलवाया गया, लाल मिटटी डलवाई गई। लोग पूछ रहे हैं कि ये किस आधारपर हो रहा है जबकि अगली बारिश में फिर सब बह जाना है। ये किस इंजीनियर की खोपड़ी की उपज है, मगर इस पर अधिकारियों की नजर ही नहीं जा रही है।
इंटरलॉकिंग टाइल्स के लिए टूटेंगे रेम्प
निरीक्षण में न्यू भूपालपुरा क्षेत्र में 80 लाख रुपए की लागत से हो रहे इंटरलॉकिंग टाइल्स कार्य को लेकर भी गंभीर तकनीकी सवाल सामने आए हैं। आपको बता दें कि टाइल्स के नीचे की जमीन को कच्चा और जल-संचरण योग्य छोड़ने के बजाय सीमेंट का अत्यधिक उपयोग किया जा रहा है। इससे बरसात का पानी जमीन में उतरने के बजाय सतह पर बह रहा है, जो भविष्य में जलभराव और शहरी बाढ़ की वजह बन सकता है। उल्लेखनीय है कि इस तकनीकी पहलू की स्वतंत्र जांच या हाइड्रोलॉजिकल मूल्यांकन की कोई जानकारी सामने नहीं आई है। बताया गया कि जिनके रेम्प बीच में आ रहे हैं उनको तोड़ कर टाइल्स लगाएंगे।
फेंसिंग तोड़ने पर मुकदमा करेंगे, नीति पर सवाल बरकरार
निरीक्षण के दौरान गट्ठानी फार्म हाउस के पास फेंसिंग तोड़े जाने की शिकायत पर आयुक्त ने सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामले दर्ज करने के निर्देश दिए। कार्रवाई अपनी जगह उचित है, लेकिन बुनियादी सवाल जस का तस है—क्या यह फेंसिंग वास्तव में नदी की है या नदी के भीतर हो चुके कब्जों की? नगर निगम आयुक्त ने निरीक्षण के अंत में सभी कार्यों को तकनीकी मानकों के अनुरूप और उच्च गुणवत्ता से पूर्ण करने के निर्देश दिए। लेकिन शहर पूछ रहा है कि तकनीकी मानकों में क्या नदी का सीमांकन और प्राकृतिक प्रवाह भी शामिल है या नहीं? नदी की जो हत्या हो रही है उसको कौन बचाएगा??

