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बेटे का कफ़न लिए कलेक्टर दरबार में पहुँचा पिता, सड़क के किनारे दफनाने को मजबूर

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24 न्यूज अपडेट, जोधपुर। मानवता जब तिरस्कार का शिकार हो जाए, तो केवल इंसान ही नहीं, इंसानियत भी बिलखती है। ऐसा ही कुछ हुआ जोधपुर में, जब विक्रम सांसी अपने नन्हे बेटे के लिए कफ़न संभाले, नम आँखों और टूटे दिल के साथ जिला कलेक्टर के सामने पहुँचा कृ एक ही सवाल लिए हुएः “क्या हमारे मासूम बच्चों को मिट्टी देने के लिए दो गज जमीन भी नसीब नहीं?“
रातानाडा क्षेत्र में दशकों से शांतिपूर्वक बसे सांसी समाज के सामने अब एक ऐसा संकट आ खड़ा हुआ है, जिसे सुनकर संवेदनहीन से संवेदनशील भी हो उठे। श्मशान की मांग कोई विलास नहीं, यह एक बुनियादी हक़ है, एक समाज की अंतिम मर्यादा का प्रश्न है। लेकिन इस समाज को अपने बच्चों तक को खुले मैदानों, सड़कों के किनारे, जानवरों के डर और इंसानों की उपेक्षा के बीच दफनाना पड़ रहा है।
हवा में उड़ गई मानव गरिमा
जहां कभी एयरफोर्स चौकी के पीछे शांत स्थान पर बच्चों को दफनाया जाता था, वहां अब प्रतिबंध है। ऐसे में कोई विकल्प न होने पर विक्रम सांसी अपने दिवंगत पुत्र की निर्जीव देह को लेकर पूरे शहर में जगह खोजता रहा… पर हर दरवाज़ा बंद मिला। अंततः सड़क के किनारे बच्चे को दफनाया गया और उसी पीड़ा के साथ वह कफ़न उठाए हुए, खुद को संभालता हुआ, थककर, टूटा हुआ, अपने पूरे समाज के साथ कलेक्टर कार्यालय पहुँचा।
एक पिता का दुख नहीं, पूरे समाज की वेदना है
सांसी समाज का कहना है कि यह पीड़ा केवल विक्रम की नहीं, हर उस मां-बाप की है, जो अपने मासूम बच्चों को सम्मानजनक अंतिम विदाई तक नहीं दे पा रहे। यह दर्द है उस उपेक्षा का, जो वर्षों से समाज को केवल वोट बैंक समझती रही। वे कहते हैं,
“हमें मुख्यधारा में लाने की बातें तो बहुत हुईं, पर दो गज ज़मीन तक न मिल सकी!“
कलेक्टर से दो स्पष्ट मांगें
पाबूपुरा के पास स्थित बिजलीघर श्मशान भूमि का एक भाग स्थायी रूप से बाल शवों के दफन हेतु आवंटित किया जाए। एयरफोर्स पुलिस चौकी के पीछे पूर्व में प्रयुक्त स्थल को पुनः दफन स्थली के रूप में स्वीकृति दी जाए, क्योंकि यह बस्ती से पर्याप्त दूरी पर है।

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