राजस्थान की भर्ती परीक्षाएं अब केवल परीक्षार्थियों की योग्यता परखने का माध्यम नहीं रहीं। वे धीरे-धीरे एक ऐसी असहनीय प्रक्रिया में तब्दील हो चुकी हैं, जहां सबसे पहले अभ्यर्थी का आत्मसम्मान बेशर्मी से उतारा जाता है, फिर उसे परीक्षा कक्ष में बैठने की अनुमति दी जाती है। नकल रोकने के नाम पर सरेआम जो कुछ हो रहा है, वह अनुशासन नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ खड़ी एक असंवेदनशील व्यवस्था की दीवार है, जिसे गिराना जरूरी हो गया है। यह अधिकारों का अतिक्रमण करके बनाई गई अवैध दीवार है, जिसे गिरा कर ही भ्रष्ट नेताओं, पेपर लीक के दलालों और सत्ता को उंगलियों पर नचा रहे महाभ्रष्ट अफसरों की नींद उड़ाई जा सकती है।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए जी-जान लगाकर उम्मीदों के साथ परीक्षा केंद्र पर आने वाला परीक्षार्थी अब ज्ञान का आत्मविश्वास लेकर नहीं, बल्कि इस डर के भीतर प्रवेश करता है कि कहीं उसकी इज्जत न उतरवा दी जाए, कहीं उसे अपराधी की तरह खड़ा न कर दिया जाए, कहीं उसकी आस्थाओं से खिलवाड़ न हो जाए। नैतिकता का कोड तो कब से हमारी लगभग हर संस्था ने ध्वस्त कर दिया है। ऊपर के लेवल पर जबरदस्त सेटिंग के खेल चल रहे हैं, मगर यहां ड्रेस कोड के नाम पर बच्चों को परेशान करने में भर्ती एजेंसियों के मुखियाओं को बड़ा आनंद आने लगा है।
खुद बड़ी गाड़ियों में घूमेंगे, वातानुकूलित सुविधाओं का उपयोग करेंगे, मगर एग्जाम देने आए बच्चों को ठंड में जूते उतरवाकर घंटों तक ठिठुराने का आनंद लेंगे। यह कहां की नैतिकता है? यह ढीठपने की पराकाष्ठा है। मगर इस पर कोई नेता नहीं बोलेगा, कोई जन प्रतिनिधि सवाल नहीं उठाएगा। किसी अफसर को तरस नहीं आएगा?? क्योंकि सब के सब सत्ता के लोभ के गुलाम हो चुके हैं। लकीर के फकीर हो चुके हैं।
बिना अपराध, बिना आरोप—सब संदिग्ध
परीक्षा केंद्रों पर हालात बहुत ही दयनीय हो जाते हैं। डरकर हाथ में प्रवेश पत्र लेकर और खुद को पाक-साफ साबित करने के लिए हर नियम मानकर जब भोला-भाला अभ्यर्थी घंटों तक कष्टकारी यात्रा करके एग्जाम सेंटर पर पहुंचता है, तो वहां के दृश्य देख सहम जाता है। उसे खतरनाक तरीके से हड़काया जाता है और नियमों की दुहाई दी जाती है—यह नहीं किया तो ये हो जाएगा, यह नहीं पहना तो ये हो जाएगा।
बेचारा फुटपाथ पर रात गुजारकर, उनींदा हालत में, भूखे पेट एग्जाम सेंटर पर आया होता है। उसके बाद उससे उम्मीद की जाती है कि सब कुछ परफेक्ट तरीके से और परीक्षा एजेंसी की प्रताड़ना लिस्ट के अनुरूप हो।
यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है। राजस्थान सरकार एक तरफ यह प्रचार करती है कि वह पिछली भर्ती परीक्षाओं के नकलचियों को पकड़ रही है, लेकिन दूसरी तरफ आज की परीक्षाओं में हर ईमानदार अभ्यर्थी को पहले ही दोषी मानकर उसे इस तरह की प्रताड़नाकारी जांच से गुजारना पूरे सिस्टम की विफलता का प्रमाण है। यह न्याय नहीं, यह सामूहिक संदेह की गंदी राजनीति है।
कान की बालियां, दुपट्टा, जूते—अब यही नकल का औजार?
राजस्थान के विभिन्न परीक्षा केंद्रों से बार-बार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जहां महिला अभ्यर्थियों की कान की बालियां कैंची से कटवाई जा रही हैं। जबकि नकल करने वाले तो ब्लूटूथ से नकल करके नौकरी लग गए। पेपर सरगना नेताओं के संरक्षण में करोड़ों के वारे-न्यारे कर गए।
कान की बालियां क्या आंखों से दिखती नहीं हैं या फिर चेक करते समय गुरूर का ऐसा चश्मा चढ़ा होता है कि कुछ और दिखाई ही नहीं देता? कल ही खबर आई कि दुपट्टा उतरवाकर लड़कियों को सार्वजनिक रूप से असहज किया जा रहा है। इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या होगा?
मगर क्या किसी को इसके लिए सजा मिली—नहीं। क्योंकि नीचे से ऊपर तक सब मिले हुए हैं, पूरा तंत्र एक-दूसरे को बचाने में लगा है।
जूते-मोज़े उतरवाकर सर्दी में घंटों बिठाना कहां की बुद्धिमानी है? यह पढ़े-लिखे मूर्खों की महामूर्खता ही कही जाएगी। परीक्षार्थी नंगे पांव परीक्षा देते हुए चार घंटे तक ठिठुरता रहेगा—यह देखकर भर्ती परीक्षा के शिक्षकों से लेकर आला अफसरों तक को मजा तो बहुत आता होगा। उनका ईगो बहुत सैटिस्फाई होता होगा।
और जो लोग परीक्षा केंद्र के बाहर शर्ट के बटन और बाहें काटते होंगे, उन्हें नींद बहुत अच्छी आती होगी इस पराक्रमी काम को करने के बाद। उनकी पीढ़ियां धन्य हो जाती होंगी। बुढ़ापे में तीसरी पीढ़ी को सुनाने के लिए किस्से का जुगाड़ होने पर वे कितने खुश होते होंगे???
मगर इससे किसी को क्या फर्क पड़ता है? परीक्षार्थी ठंड में मर जाए, उनकी बला से। उन्हें तो ऊपर से आए आदेश को लकीर का फकीर बनकर अक्षरशः आत्मसात करना है।
यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता। क्या नकल अब दुपट्टे, बाली, बटन, बेल्ट और जूतों-मोज़ों से होने लगी है? अगर सच में ऐसा है, तो फिर सरकार बताए—मेटल डिटेक्टर, जिसे घुमा-घुमाकर परीक्षार्थी के हर अंग पर टच करवाते हो, उसकी जरूरत क्या है? बायोमेट्रिक की जरूरत क्या है? सीसीटीवी और वीडियो जनता के टैक्स के पैसों से क्या भाड़ झोंकने के लिए लगवाते हो? फ्लाइंग स्क्वॉड क्या टीए-डीए लेने के लिए फिरकी बनकर घूमती है?
या फिर यह सब सिर्फ दिखावे के औजार हैं और असली सख्ती कमजोर अभ्यर्थी पर ही उतरनी है?
चार घंटे की परीक्षा, लेकिन भरोसा शून्य
एक सामान्य भर्ती परीक्षा में प्रवेश द्वार पर सख्त तलाशी होती है। अंदर पहुंचते ही दोबारा जांच होती है। परीक्षा कक्ष में निगरानी ऐसी कि दाएं-बाएं नजर चली जाए तो घुड़की का प्रसाद मिल जाता है। बीच परीक्षा फ्लाइंग स्क्वॉड और उससे पहले लोकल निगरानी दल की धमक—फिल्मी स्टाइल में।
इतनी परतों की निगरानी के बाद भी यदि व्यवस्था को अपने अभ्यर्थियों पर भरोसा नहीं है, तो साफ है कि नाकामी ड्रेस कोड की नहीं, सिस्टम की है।
भर्ती परीक्षाओं के मूर्ख आकाओं, यहां सिस्टम कितना भी स्ट्रांग कर लो, नकल करने वाले तो स्ट्रांग रूम से पेपर उठवा लेंगे। तब क्या करोगे?
अब तक जहां-जहां नकल हुई, क्या वहां चेक करने वालों को सस्पेंड किया गया? क्या फ्लाइंग स्क्वॉड की नौकरी गई? क्या परीक्षा केंद्र के प्रमुख पर कोई जांच की आंच आई? नहीं, क्योंकि ऐसा तो कभी होना नहीं है।
लोग फोटो बदलकर, फर्जी साइन करके परीक्षा दे गए। जिनके डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन में भी जबरदस्त भ्रष्टाचार हुआ, वे पांच-पांच साल की नौकरी के बाद पकड़े जा रहे हैं। तो पहला सवाल यह बनता है कि उनके एग्जाम सेंटर के सभी परीक्षकों को सस्पेंड क्यों नहीं किया गया? डॉक्यूमेंट जांच करने वालों की नौकरी अब तक क्यों बरकरार है?
लेकिन सिस्टम कभी अपनी विफलता स्वीकार नहीं करता। वह हमेशा सबसे कमजोर कंधे पर बंदूक रखता है। कमजोर को प्रताड़ित करने में उसे आनंदानुभूति होती है। छात्र के कंधे पर बंदूक चल रही है।
परीक्षक कोट-सूट-बूट में, छात्र ठंड में ठिठुरता—क्या यही न्याय है?
एग्जाम हॉल का दृश्य ही निराला है। हर परीक्षा केंद्र का दृश्य लगभग एक-सा है। परीक्षक—मास्टरजी—कोट, सूट, बूट, जैकेट और टोपी में, शॉल-मफलर में लिपटे हुए। और परीक्षार्थी—बिना जैकेट, बिना शॉल, एग्जाम सेंटर के बाहर शहीद हुई शर्ट की बांह, कटे हुए बटन वाला स्वेटर पहनकर, नंगे पांव ठंड में कांपता, सहमा हुआ, चुपचाप एग्जाम देता हुआ।
परीक्षा केंद्र के बाहर पड़ी चरण-पादुकाओं की पंक्तियां सिस्टम के फेल्योर की कहानी कह रही हैं।
चार घंटे की परीक्षा में परीक्षार्थी प्रश्नपत्र से नहीं, अपमान, डर और ठंड से लड़ता दिखाई देता है। इसे अनुशासन कहना अनुशासन शब्द का सरेआम अपमान है। यह सीधी-सीधी संस्थागत सामूहिक क्रूरता है।
नकल माफिया भीतर, सख्ती बाहर
अगर सच में नकल रोकनी है, तो पिछले वर्षों के मामलों पर नजर डालिए। सिस्टम में कैसे नकलची घुसकर राज कर रहे हैं। उन्हें शह देने वाले नेता किस बेशर्मी से सत्ता में बने हुए हैं। पेपर लीक, डमी कैंडिडेट, सॉल्वर गैंग, परीक्षा एजेंसियों के प्रमुख व सदस्यों की मिलीभगत—इनमें से एक भी मामला दुपट्टे, जूते या बालियों से जुड़ा नहीं है।
नकल हमेशा सिस्टम के भीतर से हुई। अधिकारियों की मिलीभगत से हुई। तकनीकी और प्रशासनिक खामियों से हुई। लेकिन सजा हर बार गांव से आए गरीब छात्र को मिली। ठंड में परीक्षा देने आई छात्रा को मिली। पहली बार सपने लेकर आए युवा के लिए यह क्रूर अनुभव एक सबक जैसा है कि सिस्टम कायर भी है और क्रूर भी।
आर्थिक रूप से कमजोर और असहाय छात्र भौचक्का रह जाता है कि उसने पिता की कमाई से एक पूरी बांह की शर्ट क्यों खरीदी, एक जोड़ी जूते क्यों खरीद लाया—क्योंकि दोनों इस एग्जाम-भ्रष्ट प्रताड़ना तंत्र के अनुकूल नहीं निकले।
जूते होते हुए भी ठंड में ठिठुरना पड़ा। शर्ट की बांह को सरेआम शहादत देनी पड़ी। ड्रेस कोड अब अनुशासन का नहीं, डर और दमन का औजार बन चुका है।
अब सवालों से व्यवस्था भागती नजर आ रही है। आप धर्म के नाम पर जोश दिखाने वाले नेताओं को इस मुद्दे पर कभी बोलते नहीं सुनेंगे। कोई भी जन प्रतिनिधि इस पर पहल नहीं करेगा। आखिर क्यों? क्योंकि हर एग्जाम को एक बुरा सपना मानकर अभ्यर्थी और उसका परिवार सिस्टम को फॉरगिव कर देता है—“जाने भी दो यार” वाला एटीट्यूड इस समस्या को और बढ़ा देता है।
इसलिए चुप रहना छोड़िए। आवाज उठाइए। यथासंभव विरोध करते हुए नया विचार बनाइए। अब चुप रहना भी अपराध है।
भर्ती परीक्षाओं की पवित्रता कपड़ों से नहीं आएगी। वह आएगी पारदर्शी सिस्टम से, जवाबदेह अधिकारियों से और मजबूत तकनीकी व्यवस्था से।
अगर यही रवैया जारी रहा, तो परीक्षाएं योग्यता की नहीं, अपमान सहने और चुप रहने की प्रतियोगिता बन जाएंगी। और तब यह केवल छात्रों की हार नहीं होगी, बल्कि पूरे शासन तंत्र की नैतिक हार होगी।
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