रिपोर्ट—जयवंत भैरविया
24 News Update उदयपुर। उदयपुर में एक स्कूल है डीपीएस। जिसके कर्ता धर्ता इतने पावरफुल हैं कि उसके खिलाफ जमीन घोटाले की जांच में कोई भी सरकार हो पत्ता नहीं हिलता। यूडीए में फुल सेटिंग चलती है। जब—जब जांच होती है, यूडीए डीपीएस के पक्ष में धुआंधारा बल्लेबाजी करना शुरू कर देता है। यही हाल ताज अरावली के मामले में भी है। याने, यूडीए है तो धांधली करने वालों के लिए सब कुछ मुमकिन है। खुल्ला खेल चलता रहता है। कई बार तो लगता है कि यूडीए ही भू माफियाओं जैसी भूमिका निभाना शुरू कर देता है। या यूं कहें कि उपर से जो उनको लाए हैं उनका हर बार आदेश मानना शुरू कर देता है। डीपीएस स्कूल का जमीन घोटाला एक ऐसा महाग्रंथ हो चुका है जिस पर एक थ्रिलर फिल्म भी बनाई जा सकती है। इसके आगे शिकायतकर्ता अस्त पस्त है और डीपीएस बरसों बरस से मस्त—मस्त है। कई बड़े नेताओं और अफसरों की मिलीभगत, नेताओं और जन प्रतिनिधियों का मकड़जाल इस सिस्टम को बहुत ही मजबूती से सपोर्ट करता है। कहां से फंडिंग होती है और कहां तक फंडिंग जाती है इसके किस्से किसी से छिपे नहीं है।
गरीबों के आशियाने ये लोग अट्हास करते हुए उजाड़ देते हैं, उसकी मीडिया पब्लिसिटी भी करते हैं लेकिन हाथियों का नाम आते ही यूडीए में कुछ लोग दुम हिलाने लगते हैं। आज बात होगी एक बार फिर डीपीएस की इस बार सब जानते हैं कि राहु—ल काल नेताओं के लिए लाभ का चौघड़िया लेकर आया है। पौ—बारह, बल्ले बल्ले हो रही है, पांचों उंगलियां घी में और सिर कड़ाई में नजर आ रहा है। ऐसे अमृत काल में जब अमृत बरस रहा हो तो हमने सोचा कि हम भी खबर का अमृत बरसा देते हैंं।
डीपीएस जमीन घोटाला, जांच के नाम पर लीपापोती, यूडीए ने रिपोर्ट में बदले तथ्य
डीपीएस स्कूल उदयपुर से जुड़े बहुचर्चित जमीन घोटाले की पत्रकार जयवंत भैरविया द्वारा की गई शिकायत के बाद तत्कालीन मुख्य सचिव सुधांश पंत ने इस मामले की जांच के आदेश यूआईटी (अब यूडीए) को दिए थे। इसके बाद एक जांच समिति का गठन किया गया, लेकिन जांच की दिशा और निष्कर्ष शुरू से ही संदेह के घेरे में रहे। जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि जिन शर्तों पर डीपीएस को सरकारी जमीन आवंटित की गई थी, उनका आज तक पालन नहीं हुआ। खासकर गरीब, आदिवासी और वंचित वर्ग के बच्चों को दिए जाने वाले प्रवेश को लेकर कोई ठोस प्रमाण नहीं मिले। इसके बावजूद यूडीए द्वारा सरकार को भेजी गई रिपोर्ट में एडमिशन से जुड़े गंभीर तथ्यों को या तो दबा दिया गया या जानबूझकर नजरअंदाज किया गया।
रिपोर्टों में विरोधाभास, सरकार ने जताई आपत्ति
जमीन से जुड़े आंकड़ों को बार-बार बदले जाने पर तत्कालीन शासन उप सचिव ने यूआईटी सचिव हेमेन्द्र नागर को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि भेजी गई रिपोर्टों में गंभीर विरोधाभास हैं। पत्र में यह भी कहा गया कि विस्तृत टिप्पणी प्रस्तुत की जाए, अन्यथा लापरवाही के लिए संबंधित अधिकारी जिम्मेदार माने जाएंगे। इसके बावजूद, यूडीए स्तर पर किसी भी अधिकारी पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
गेप भूमि के बहाने खेल दिया नया खेल
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि यूडीए आयुक्त राहुल जैन ने अतिरिक्त कब्जे की जमीन को “गेप भूमि” बताकर सेटल करने का प्रयास किया और यह तक लिख दिया कि उक्त भूमि का आवंटन अभी शेष है। जबकि “गेप भूमि” जैसा कोई शब्द न तो राजस्व शब्दावली में है और न ही किसी अधिसूचित नीति में। यह शब्द केवल और केवल डीपीएस को बचाने के लिए गढ़ा गया प्रतीत होता है।
इनको है नोटिस लेने से इनकार करने का अधिकार??? फिर भी कार्रवाई नहीं
अप्रैल माह में उदयपुर विकास प्राधिकरण द्वारा गोविंद अग्रवाल को रजिस्टर्ड डाक से नोटिस भेजा गया, जिसमें तीन दिन में दस्तावेजों सहित पालना रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश थे। लेकिन नोटिस लेने से ही इनकार कर दिया गया। इसके बावजूद न तो जमीन निरस्त की गई, न ही किसी तरह की दंडात्मक कार्रवाई की गई—जो अपने-आप में सिस्टम की मंशा पर सवाल खड़े करता है।
तथ्यों की फेहरिस्त जो सिस्टम पर सवाल उठाती है
2005 में करीब 3 लाख वर्ग फीट जमीन का आवंटन, 2023 में लगभग 1 लाख वर्ग फीट जमीन दोबारा रियायती दर पर दी गई, अब तीसरी बार जमीन देने की तैयारी। शर्त थी कि गरीब, आदिवासी और वंचित वर्ग के बच्चों को प्रवेश दिया जाएगा,लेकिन एक भी पात्र बच्चे को प्रवेश नहीं मिला। कार्रवाई के बजाय यूडीए ने इनाम के तौर पर और जमीन आवंटित कर दी।
पहले कब्जा कर लिया, फिर कहा पहनाया कानूनी जामा
डीपीएस प्रबंधन ने पहले यूडीए की जमीन पर कब्जा किया, फिर उसी जमीन को रियायती दर पर आवंटित करवा लिया। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका—आज भी डीपीएस के पास करीब 40 हजार वर्ग फीट यूडीए भूमि पर अवैध कब्जा बताया जा रहा है, जिसमें सड़क का हिस्सा भी शामिल है। अब इसी जमीन को भी संस्था को सौंपने का प्रस्ताव सरकार को भेज दिया गया है।
हर जांच में कब्जा माना, लेकिन खाली नहीं कराया
2016 में यूडीए सचिव रामनिवास मेहता की जांच: 82,628 वर्ग फीट कब्जा माना, 2018 में उज्जवल राठौड़ की रिपोर्ट: 56,524 वर्ग फीट, 2023 में नितेंद्रपाल की रिपोर्ट: 99,870 वर्ग फीट, हर बार कब्जा माना गया, हर बार नोटिस दिया गया, लेकिन कभी जमीन खाली नहीं कराई गई। बल्कि हर बार सरकार को प्रस्ताव भेजकर उसी जमीन को रियायती दर पर देने की सिफारिश की गई। भू-आवंटन नीति-2015 के अनुसार सीनियर सेकेंडरी स्कूल को 4 हजार वर्ग फीट से अधिक जमीन नहीं दी जा सकती। इसके बावजूद डीपीएस को अब तक करीब 4 लाख वर्ग फीट से अधिक जमीन दी जा चुकी है—वह भी नियमों को ताक पर रखकर।
शर्तें कागजों में, हकीकत में शून्य
आवंटन पत्र में साफ लिखा था— संस्था लाभ के लिए कार्य नहीं करेगी, आदिवासी अंचल के बच्चों को 50% फीस में शिक्षा, 25% सीटें SC/ST/OBC/विकलांग/शहीदों के बच्चों के लिए आरक्षित, लेकिन जमीनी हकीकत में इन शर्तों की एक भी पालना नहीं हुई।
सबसे बड़ा सवाल जब हर जांच में कब्जा साबित हुआ, जब शर्तों का खुला उल्लंघन सामने है, जब नीति के खिलाफ बार-बार जमीन दी गई, तो आज तक यूडीए आयुक्त राहुल जैन ने सरकार को जमीन निरस्त करने का एक भी पत्र क्यों नहीं लिखा?

