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सरकारी नौकरी छोड़ संत बने बांसवाड़ा के दिशांत — माँ-बाप के इकलौते बेटे ने सांसारिक सुखों से मुंह मोड़ चुना वैराग्य मार्ग

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24 न्यूज अपडेट, बांसवाड़ा। धर्मनगरी बागीदौरा की मिट्टी एक बार फिर अध्यात्म की खुशबू से महक उठी है। यहाँ के 29 वर्षीय दिशांत जैन — जो अब तक एक सरकारी लाइब्रेरियन के रूप में सेवा दे रहे थे — ने सांसारिक जीवन को त्यागकर संत बनने का निर्णय लिया। शुक्रवार को मध्यप्रदेश के जबलपुर में आचार्य समयसागर के सान्निध्य में उन्होंने दीक्षा ग्रहण कर संयम और तप की राह पर पहला कदम रखा।

सरकारी नौकरी से संतत्व तक — एक अद्भुत यात्रा
साल 2018 में राउमावि राखो में पुस्तकालयाध्यक्ष के पद पर नियुक्त हुए दिशांत का जीवन हमेशा अनुशासन, सेवा और संयम से भरा रहा। माता-पिता के इकलौते बेटे होने के बावजूद, उन्होंने सांसारिक मोह-माया को त्यागने का कठिन निर्णय लिया। दिल को छू लेने वाली बात यह है कि उनकी बहन ने भी पहले ही ब्रह्मचर्य अपनाकर संयम पथ चुना था — और अब भाई ने भी वही राह पकड़ ली।

बागीदौरा की गौरवशाली परंपरा का विस्तार
आचार्य विद्यासागर और आचार्य समयसागर की कृपा से बागीदौरा सदियों से जैन धर्म की तपोभूमि रही है। यही भूमि वह स्थान है, जहाँ से आचार्य समतासागर, आर्यिका श्वेतमति माताजी और कई ब्रह्मचारिणी दीवियाँ वैराग्य की राह पर चलीं। अब दिशांत का नाम भी उसी गौरवशाली परंपरा में जुड़ गया है। नगर में श्रद्धा और गर्व का वातावरण है — लोग इसे बागीदौरा की “धार्मिक पुनर्जागरण की घड़ी” कह रहे हैं।

बाल्यकाल से ही संयम की राह
डॉ. निखिल जैन के अनुसार दिशांत का जन्म 29 सितंबर 1996 को हुआ था। बचपन से ही उन्होंने जैन धर्म के नियमों का सख्ती से पालन किया — रात में अन्न-जल त्याग, अष्टमी और चतुर्दशी पर एकासन, और नित्य स्वाध्याय उनकी दिनचर्या का हिस्सा रहे। विनोद पानेरी बड़ोदिया के अनुसार, दिशांत न केवल एक कर्मठ अधिकारी थे, बल्कि खेलकूद में भी सक्रिय रहे और सदैव घर का बना शुद्ध भोजन ही ग्रहण करते थे।

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