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बांसवाड़ा सेक्स डिटर्मिनेशन केस: हाईकोर्ट की सख़्त टिप्पणी-‘अनुमान पर नहीं, सबूत पर चलेगा कानून’

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जोधपुर। भ्रूण लिंग जांच से जुड़े चर्चित प्रकरण में राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर मुख्यपीठ ने निचली अदालतों के लिए एक स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया है—कानून संदेह से नहीं, ठोस साक्ष्य से चलता है। जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने बांसवाड़ा की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अनामिका भारद्वाज के खिलाफ भ्रूण हत्या के प्रयास और आपराधिक साजिश से जुड़े आरोपों को निरस्त करते हुए कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है, जिससे यह निष्कर्ष निकले कि गर्भपात कराने की मंशा या दिशा में कोई वास्तविक कदम उठाया गया।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि आरोप तय करते समय ट्रायल कोर्ट औपचारिकता नहीं निभा सकता। यदि उपलब्ध सामग्री केवल मामूली संदेह पैदा करती है, तो आरोपी को डिस्चार्ज करना न्यायिक दायित्व है। लिंग जांच के लिए हामी भरने मात्र से गर्भपात की तैयारी मान लेना तथ्यों से परे अनुमान है।

डिकॉय ऑपरेशन की सीमाएं
मामले की जड़ फरवरी 2017 की कार्रवाई में है, जब पीसीपीएनडीटी ब्यूरो ने डिकॉय ऑपरेशन के आधार पर एफआईआर दर्ज की। छापे में डॉक्टर से 19 हजार और कथित एजेंट से 1 हजार रुपये की बरामदगी हुई। एजेंट के निधन के बाद उसके खिलाफ केस समाप्त हो गया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिंग जांच की तैयारी या फीस लेना, अपने-आप में गर्भपात के प्रयास का प्रमाण नहीं बनता—जब तक गर्भपात की प्रक्रिया शुरू होने, उपकरण मिलने या किसी ठोस “समझौते” का साक्ष्य न हो।

‘मैकेनिकल ऑर्डर’ पर चोट
पहले दौर में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को कारण-सहित आदेश देने का निर्देश दिया था। बावजूद इसके, दोबारा लगभग वैसा ही संक्षिप्त आदेश पारित कर पुराने आरोप दोहरा दिए गए। ताज़ा फैसले में हाईकोर्ट ने इस मैकेनिकल एक्सरसाइज को खारिज करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट अभियोजन का “माउथपीस” नहीं बन सकता।

नतीजा
अदालत ने आईपीसी की धारा 315/511 और 120-बी के तहत लगे आरोप रद्द कर दिए हैं। हालांकि, पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत अन्य आरोपों पर सुनवाई स्वतंत्र रूप से जारी रहेगी। मामला ट्रायल कोर्ट को लौटाया गया है ताकि उपलब्ध सामग्री के आलोक में विधि-सम्मत आदेश पारित किया जा सके।

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