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अहमदाबाद से चल रहा है प्लास्टिक का ज़हरीला धंधा, उदयपुर में दिखावटी सख्ती, गुजरात का नाम आते ही बंध जाती है नेताओं—अफसरों की घिग्घी

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24 News Update उदयपुर। नगर निगम ने एक बार फिर प्रतिबंधित सिंगल यूज प्लास्टिक के खिलाफ छापेमारी कर ली। ट्रांसपोर्ट नगर से 6 क्विंटल 90 किलो प्लास्टिक जब्त हुआ, अहमदाबाद का नाम आया, अफसरों के बयान आए और कार्रवाई की तस्वीरें जारी कर दी गईं। लेकिन शहर फिर वही सवाल पूछ रहा है—आखिर नगर निगम अहमदाबाद से आने वाले प्लास्टिक पर रोक लगाने की कोशिश क्यों नहीं करता? गोवर्धन विलास स्थित पुण्य ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन के गोदाम से पकड़ी गई खेप कोई पहली नहीं है। यह वही पुरानी कहानी है—बस बदलती है, ट्रक बदलते हैं, गोदाम बदलते हैं, लेकिन प्लास्टिक वही का वही जहरीला वाला ही रहता है। निगम पुलिस निरीक्षक मांगीलाल डांगी की टीम ने कार्रवाई कर 23 कट्टों में भरे काले रंग के प्रतिबंधित कैरी बैग जब्त किए। जांच में सामने आया कि माल अहमदाबाद से मंगवाया गया था। कुछ कट्टे पारस निवासी बलीचा के बताए गए, कुछ योगेश भाई निवासी आसपुर, डूंगरपुर के। कार्रवाई यहीं खत्म।
यहीं सवाल खड़ा होता है कि क्या सिर्फ एक बस से ही प्लास्टिक आया था? अगर एक खेप पकड़ी गई है, तो क्या यह मान लिया जाए कि बाकी सैकड़ों बसें और ट्रक खाली ही आए होंगे। नगर निगम में आईएएस अफसर बैठे हैं। अगर चाहें तो जिला कलेक्टर, संभागीय आयुक्त, आईजी से बात कर अंतरराज्यीय टीमें बन सकती हैं। जैसे अपराधियों को पकड़ने के लिए दूसरे राज्यों में दबिश दी जाती है, वैसे ही गुजरात के अहमदाबाद, सूरत या अन्य शहरों में जाकर कार्रवाई क्यों नहीं हो सकती? या फिर गुजरात का नाम आते ही निगम की हिम्मत जवाब दे जाती है?
अजीब चुप्पी है इस बात को लेकर जाने क्या डर बैठा रहता है। सब जानते हैं कि प्लास्टिक लॉबी कहां से ओपरेट कर रही है। उनके आका कहां से जहर का व्यापार कर रहे हैं। मगर जैसे ही प्लास्टिक के साथ गुजरात का नाम आता है वैसे ही उदयपुर के नेता खामोश, जनप्रतिनिधि मौन, और सिस्टम आंखें मूंद लेता है एक अनजाने डर के मारे। उदयपुर में आज तक किसी एक जनप्रतिनिधि ने यह सवाल नहीं उठाया कि आखिर गुजरात में कौन-सी सरकार है, कौन-से अफसर और कौन-से कारोबारी हैं, जो जहरीला प्रतिबंधित प्लास्टिक राजस्थान और खासकर उदयपुर में भेज रहे हैं। हमारे यहां जहर घोल रहे हैं। आवाज उठाना तो दूर, चर्चा तक नहीं होती जबकि अब तक तो इसके लिए आंदोलन हो जाना चाहिए था। कई मंचों से आवाज उठनी चाहिए थी। मगर बोले कौन?? बिल्ली के गले में कौन घंटी बांधने का रिस्क उठाए।
नगर निगम की कार्रवाई का तरीका भी तयशुदा है। छठे चौमासे जब नींद खुलती है सब्जी मंडी में ठेले वालों पर दबिश, दुकानों पर छापे, थोक व्यापारियों पर कार्रवाई। छोटों पर डंडा, ऊपर वालों को छूट। खबरें छप जाती हैं, वाहवाही मिल जाती है और मामला ठंडा पड़ जाता है। अब क्योंकि स्वच्छता सर्वेक्षण में अच्छी रैंकिंग का लक्ष्य है, तो फिर से अभियान चल रहा है। लेकिन सवाल साफ है कि जब तक प्लास्टिक माफिया के गुजरात में बैठे राक्षस पर वार नहीं होगा, तब तक ये सारे अभियान सिर्फ कागजों और कैमरों तक ही सीमित रहेंगे। नगर निगम आयुक्त अभिषेक खन्ना लगातार सख्ती और अपील की बात कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि रोज कार्रवाई होगी, स्टॉक चाहे बड़ा हो या छोटा, बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन शहर यह भी जानना चाहता है कि क्या यह सख्ती सिर्फ उदयपुर की सीमाओं तक ही रहेगी? क्या गुजरात वालों को भी बख्शा नहीं जाएगा?? या वहां कोई कार्रवाई के लिए भी नहीं जाएगा?? ज़हर बाहर से आ रहा है, और कार्रवाई अंदर ही अंदर हो रही है गजब की फकीरी हो रही हैं जब तक सप्लाई लाइन नहीं टूटेगी, तब तक हर जब्ती सिर्फ एक आंकड़ा होगी—समाधान नहीं।

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