24 News Update उदयपुर। बात 2024 की है और नोटिस अब भिजवाया जा रहा है। गजब की प्रशासनिक मिलीभगत है। न्याय मिलना तो दूर, ढंग से जांच होकर मामला कोर्ट की दहलीज तक पहुंचने में जो रोडे अटकाए जा रहे हैं वो सचमुच चिंता में डालने वाले हैं हैरान करने वाले हैं। एक ऐसा मामला जिसमें नवाजात की आंखों की रोशनी से खिलवाड़ किया गया, दस्तावेजों के साथ खेल खेला गया। ऐसे मामले में न्याय तुरंत मिलना था मगर न्याय देने वालों ने ऐसा चक्रव्यू रचा कि पीड़ित पिता एडवोकेट होते हुए भी दो साल से उससे बाहर आने का प्रयास भर कर पाए हैं। हद तो ये है कि देरी करने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं, मामला लटकाने पर कोई प्रशासनिक जांच नहीं। अगर अधिकारी खुद को इस मामले में पीडित की जगह रख कर देखें व उनके साथ भी सिस्टम यही सब करें तो शायद उनके होंश फाख्ता हो जाएंगे। नोटिस देकर कार्रवाई करनी थी यह अफसरों को पता था मगर उन्होंने आनन फानन में कार्रवाई कर दी। पीडित को न्याय दिलाने के लिए या कानूनी लूप होल छोड़ने के लिए यह जांच का विषय है। जो काम दो साल पहले हो जाना था वो अब शुरू हो रहा है। ऐसे में कई सवाल उठ रहे हैं। पीडित बच्चे के पिता योगेश जोशी कहते हैं कि वे हमेशा लड़ते रहेंगे जब तक न्याय नहीं मिल जाता।
मैग्नस अस्पताल को कारण बताओ नोटिस
अब न्याया मिलने की रोशनी हल्की सी दिखी है। मैग्नस अस्पताल को कारण बताओ नोटिस दिया गया हैं। अचानक जिला प्रशासन को याद आ गया है कि नोटिस क्रमांक नै. स्था/2024/4048 दिनांक 06.07.2024 का प्रतिउत्तर अब तक नहीं भेजा गया है। नोटिसमें कहा गया है कि मैग्नस हॉस्पीटल द्वारा अपूर्वा जोशी पत्नी योगेश जोशी के पुत्र के ईलाज में कथित तौरी से घोर लापरवाही बरती जाने से इस कार्यालय के नोटिस क्रमांक नै स्था/2024/4048 दिनांक 6.07.2024 जारी किया गया था। परन्तु आप द्वारा आज दिनांक तक नोटिस का कोई प्रतिउत्तर प्रस्तुत नहीं किया गया हैं। क्यों नहीं आपके विरूद्ध नियमानुसार अग्रिम कार्यवाही प्रस्तावित की जावें। आपके विरूद्ध योगेश पुत्र रमेश चन्द्र जोशी निवासी सेक्टर 14 उदयपुर द्वारा उनके पुत्र में ईलाज के दौरान लापरवाही बरतने पर शिकायती पत्र दिया था कि आपके हॉस्पीटल में अपूर्वी जोशी की डिलीवरी डॉ० शिल्पा गोयल द्वारा की गई और ईलाज में लापरवाही बरती गई जिससे जन्में बच्चे को आजीवन देखने से वंचित होना पड़ा। इस पर आपके हॉस्पीटल के (डॉ० शिल्पा गोयल एवं डॉ० मनोज अग्रवाल) डॉक्टर्स एवं आपके हॉस्पीटल केविरूद्ध शिकायत ज्ञापन प्रस्तुत किये गये। जिला कलक्टर द्वारा नोटिस जारी करने कार्यवाही करने का आदेश दिया जिस पर उच्च न्यायालय में रिट दायर की गई जिस पर उच्च न्यायालय द्वारा आदेश जारी किया गया था कि “अन्तिम निर्णय होने तक आपके चिकित्सालय में पूर्व में भर्ती मरीजो का ईलाज जारी रखते हुए नवीन मरीजो की भर्ती पर नोटिस प्राप्ति के दिनांक से तुरन्त प्रभाव से अस्थायी रोक लगायी जाती है तथा जिला रजिस्ट्रीकरण प्राधिकरण द्वारा अनुमति के पश्चात् ही नये रोगियों की भर्ती प्रारम्भ करेगे।
ईलाज में कथित लापरवाही की गयी जिसके विरूद्ध हॉस्पीटल एवं डॉक्टर के विरूद्ध न्यायालय में चालान पेश हो चुका है एवं जुर्म पुलिस द्वारा प्रमाणित माना है। उपरोक्त तथ्यों एवं परिस्थितियों के मध्येनजर कार्यालय द्वारा नोटिस जारी कर निर्देशित किया गया था कि नोटिस का जवाब पांच दिवस में अधोहस्ताक्षरकर्ता को प्रस्तुत करे। परन्तु आज दिनांक तक नोटिस का प्रतिउत्तर प्रस्तुत नहीं किया गया। अविलम्ब नोटिस का जवाब अधोहस्ताक्षरकर्ता को प्रस्तुत करे अन्यथा नियत समयावधि पश्चात् नियमानुसार कार्यवाही की जावेगी जिसकी समस्त जिम्मेदारी आप स्वयं की रहेगी सूचित रहे।
गंभीर लापरवाही और सिस्टम की मिलीभगत, केस 2 साल से लटका
उदयपुर के मैग्नस हॉस्पिटल के इलाज में घोर लापरवाही और डॉक्टर शिल्पा गोयल व मनोज अग्रवाल की कथित साजिश ने बच्चे की जिंदगी हमेशा के लिए अंधकार में धकेल दी। इस मामले में अब तक न केवल अस्पताल प्रशासन बल्कि उदयपुर जिला प्रशासन और तत्कालीन सीएमएचओ की मिलीभगत उजागर हुई है, जिसने न्याय मिलने की उम्मीद को जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाल दिया। 19 जुलाई 2023 को गर्भवती पत्नी की नियमित जांच के लिए अस्पताल पहुंचे परिवादी को डॉ. शिल्पा गोयल ने बताया कि बच्चे में एमिनियोटिक फ्लूड की मात्रा खतरनाक रूप से कम है। उन्होंने जोर देकर ऑपरेशन की जरूरत बताई और डराते हुए भर्ती कर सर्जरी करवाने को कहा। लेकिन एक ही दिन में दूसरी जांच पर पता चला कि मात्रा नॉर्मल है। तीसरी जांच में फिर से जोखिम बताया गया। इस तरह तीन विरोधाभासी रिपोर्टों के बावजूद अस्पताल ने परिवार को डराकर ऑपरेशन के लिए मजबूर किया।
डिलीवरी के बाद 15 अगस्त 2023 को बच्चे को डिस्चार्ज किया गया। डिस्चार्ज समरी में आरओपी (रेटिनोपैथी ऑफ प्री-मेच्योरिटी) जैसी जरूरी जांच का कोई उल्लेख नहीं था, जबकि यह समयपूर्व जन्मे बच्चों के लिए अनिवार्य है। इसके कारण बच्चे का रेटिना विकसित नहीं हो पाया और अब वह जीवन भर अंधेपन का शिकार हो चुका है। परिवादी ने जब अपने बच्चे को दिल्ली के एम्स और हैदराबाद के अस्पतालों में दिखाया, तो विशेषज्ञों ने कहा कि समय पर आरओपी जांच न कराए जाने के कारण बच्चे की रोशनी अब नहीं बचाई जा सकती।
हर कदम पर डाली रूकावटें, किसका दबाव था
मामला तब और गंभीर हो जाता है जब जांच और न्याय मिलने की प्रक्रिया पर नजर डालें। 4 अप्रैल 2023 को योगेश जोशी ने मामला जिला पुलिस अधीक्षक के पास प्रस्तुत किया, जिसे पुलिस ने सुखेर थाने भेजा। थानाधिकारी ने मामले की जांच के लिए मेडिकल बोर्ड की राय लेने की बात कही, लेकिन 4 माह तक बोर्ड तक का गठन नहीं हुआ।
दिलचस्प बात यह है कि जिला कलेक्टर ने पहले ही जांच करवा ली थी, मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट भी तैयार थी और दोषियों के खिलाफ कार्यवाही के निर्देश दिए गए थे। लेकिन थाना स्तर पर अधिकारी ने कलेक्टर की जांच रिपोर्ट को नकार दिया। यही नहीं, परिवादी को हर स्तर पर दबाव डालकर मामला वापस लेने के लिए मजबूर करने की हर संभव कोशिश की गई। ताजा एफआईआर में अब जाकर 2026 में दर्ज की गई है। डॉ. शिल्पा गोयल और डॉ. मनोज अग्रवाल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 201, 338, 418, 420, 468, 471, 120-बी के तहत अपराध दर्ज किया गया है।
सिस्टम की मिलीभगत और दबाव
पूरे मामले उदयपुर जिला प्रशासन और तत्कालीन सीएमएचओ की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। सवाल उठता है कि एक ही मामले को बार-बार कमेटियों के माध्यम से लटकाने का प्रयास क्यों किया गया और क्यों प्रशासन व स्वास्थ्य विभाग ने अस्पताल के पक्ष में लगातार पैरवी की? इतने समय बाद अस्पताल से जवाब मांगना साफ कर रहा है कि कलेक्टर से लेकर सीएमएचओ तक का इंटरेस्ट मामले में अस्पताल के पक्ष में दिखाई दे रहा था। देखना है कि अब परिवादी को न्याय मिल पाता है या नहीं।

