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स्वर्ण जयंती पर संवेदना का संदेश: महावीर जैन परिषद के मंच से गूंजा ‘हमदर्द बनो’, पांच समाज स्तंभों का हुआ सम्मान

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उदयपुर, 29 मार्च। धर्म, समाज और संवेदनाओं के संगम का विराट दृश्य रविवार को उस वक्त देखने को मिला, जब सकल जैन समाज की प्रतिनिधि संस्था महावीर जैन परिषद ने श्रमण भगवान महावीर स्वामी के 2625वें जन्म कल्याणक महोत्सव के तहत अपना स्वर्ण जयंती समारोह भव्य रूप से मनाया। हजारों श्रावक-श्राविकाओं की मौजूदगी में आयोजित इस कार्यक्रम में जहां अतीत की विरासत को सम्मान मिला, वहीं भविष्य के लिए संवेदनशील समाज का खाका भी खींचा गया।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन और सामूहिक नमोकार मंत्र जाप के साथ हुई। समारोह में शहर विधायक ताराचंद जैन, भारतवर्षीय 18000 दशा हुमड दिगम्बर समाज के अध्यक्ष दिनेश खोड़निया, मोटिवेशनल स्पीकर डॉ. राजेन्द्र लूंकड़, अरिहंत ग्रुप के सुरेश गुन्देचा, सकल दिगम्बर जैन समाज के अध्यक्ष शांतिलाल वेलावत और धर्मेश नवलखा विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

परिषद के मुख्य संयोजक राजकुमार फत्तावत ने स्वागत उद्बोधन में संस्था की 50 वर्षों की यात्रा को याद करते हुए बताया कि स्व. प्रो. भेरूलाल धाकड़, स्व. एडवोकेट जसवंतलाल मेहता, स्व. महावीर प्रसाद मिंडा, स्व. कालूलाल जैन और देवेंद्र छाप्या जैसे स्तंभों ने इस संगठन को वटवृक्ष बनाया। उन्होंने कहा कि हर लीप ईयर में स्वामी वात्सल्य, 21 सामूहिक विवाह और समाजहित के अनेक कार्य परिषद की पहचान बने हैं।

समारोह में इन पांच स्तंभों—स्व. प्रो. भेरूलाल धाकड़, स्व. जसवंतलाल मेहता, स्व. महावीर प्रसाद मिंडा, स्व. कालूलाल जैन—को मरणोपरांत उनके परिजनों के माध्यम से तथा देवेंद्र छाप्या को लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान से अलंकृत किया गया। अतिथियों ताराचंद जैन, दिनेश खोड़निया, शांतिलाल वेलावत, डॉ. राजेन्द्र लूंकड़, धर्मेश नवलखा, कुलदीप नाहर और महेन्द्र तलेसरा ने मेवाड़ी पगड़ी, उपरणा और स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया।

मुख्य अतिथि दिनेश खोड़निया ने अपने संबोधन में कहा कि 50 वर्षों तक सतत सक्रिय रहना किसी भी संस्था के लिए गौरव की बात है। उन्होंने भगवान महावीर के ‘जियो और जीने दो’ के संदेश को समस्त मानवता के लिए सर्वोच्च सिद्धांत बताते हुए युवाओं को नौकरी के बजाय उद्यमिता की ओर बढ़ने का आह्वान किया।

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा ख्यातनाम वक्ता डॉ. राजेन्द्र लूंकड़ का ओजस्वी संबोधन, जिन्होंने ‘आदर्श परिवार’ विषय पर समाज को आईना दिखाते हुए कहा कि “जहां संवेदना कमजोर हो जाती है, वहां रिश्ते जन्म ही नहीं लेते।” उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के समय में हमसफर बनें या नहीं, लेकिन हमदर्द जरूर बनें। लूंकड़ ने उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि जीवन में पहचान, उद्देश्य और संबंधों की गहराई को समझना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि उदयपुर जैसे शहर में समाज के लिए सोचने वालों की संख्या अधिक है, यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। साथ ही उन्होंने पेंसिल के छह सिद्धांतों के जरिए जीवन के उतार-चढ़ाव, सुधार और पहचान की अहमियत को सरल भाषा में समझाया। परिवारों में बढ़ती दूरियों, टूटते रिश्तों और सामाजिक विखंडन पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि समाज को आदर्श बनाने पर परिवार स्वतः सशक्त हो जाएगा।

इस अवसर पर परिषद के कोषाध्यक्ष कुलदीप नाहर ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सोनिका जैन और दीपक सिंघवी ने किया।

समारोह में राजकुमार फत्तावत, यशवंत आंचलिया, नरेन्द्र सिंघवी, विनोद भोजावत, कुलदीप नाहर, नितुल चण्डालिया, अतुल चण्डालिया, अरूण माण्डोत, लोकेश कोठारी, श्याम नागौरी, महेन्द्र तलेसरा, अशोक कोठारी, विजयलक्ष्मी गलूंडिया, दीपक सिंघवी, भूपेन्द्र गजावत, जितेन्द्र सिसोदिया, वीरेन्द्र महात्मा, अरूण मेहता, नितिन लोढ़ा, ललित कोठारी, मीना कावड़िया, नीतू गजावत, सोनल सिंघवी, प्रिया झगड़ावत, नीता छाजेड़, रचिता मोगरा सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।

अंत में राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ, लेकिन मंच से उठी ‘संवेदना और एकता’ की आवाज देर तक शहर के सामाजिक सरोकारों में गूंजती रही।

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