Site icon 24 News Update

संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में प्रमुख जन गोष्ठी का किया गया आयोजन

Advertisements

24 News Update सागवाड़ा (जयदीप जोशी)। नगर के महिपाल विद्यालय मैदान में ‘हिन्दुत्व, भारत की आत्मा है’ विषय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नगर द्वारा संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में प्रमुख जन गोष्ठी का आयोजन किया गया। जन गोष्ठी के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राजस्थान क्षेत्र के सह क्षेत्रीय कार्यवाह श्री गेंदालाल ने कहा कि संगठन के अभाव, आचरण में धर्म को छोड़ने, पराधीनता के काल में सांस्कृतिक आत्महीनता और स्वार्थ केन्द्रित लालसा के कारण समाज पतन की ओर अग्रसर हुआ एवं पराधीन भी हुआ। अतः व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय चारित्र्य से युक्त समाज के निर्माण के लिये पूजनीय डॉ. हेडगेवार जी ने संघ की स्थापना की। इस हेतु संगठन और संगठन हेतु शाखा पद्धति विकसित की। प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं ने समाज जीवन में भारत केन्द्रित विचार पर चलने वाले संगठन खड़े किये। पूजनीय गुरूजी ने संघ के वैचारिक अधिष्ठान को पुष्ट किया और कार्यकर्ताओं के लिये प्रेरक नेतृत्व दिया। अपने अलौकिक नेतृत्व से समाज के प्रमुख लोगों से संवाद कर संघ कार्य को आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि आपदाओं में संघ कार्यकर्ता सदैव अग्रणी रहे हैं। आपातकाल में अपार कष्ट सहते हुए लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का कार्य संघ ने किया। श्री राम जन्मभूमि आंदोलन और स्वदेशी भाव के जागरण में संघ का कार्य सर्वविदित है। संगठन विस्तार के साथ ही समाज परिवर्तन के विविध कार्य जैसे एकल विद्यालय, एक लाख से अधिक सेवा कार्य समाज के सहयोग से संघ ने किये हैं। संघ कार्य एक राष्ट्रीय आंदोलन है। समाज को संगठित करना संघ का कार्य है। समाज में समाधान ढूँढने का कार्य हमें करना है, अपने जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करना है। मुख्य वक्ता ने एकात्म पर बोलते हुए कहा कि भारत में विविधता में एकता है, ऐसा कहा जाता है। किन्तु अपने यहाँ एक से ही अनेक की सृष्टि हुई है। एक की अभिव्यक्ति विविध रूपों में हुई है। इसलिए कहा जाना चाहिए कि यह ‘एकता में विविधता’ है। वर्ष प्रतिपदा, चातुर्मास एवं मकर संक्रांति जैसे सांस्कृतिक पर्वों का सम्पूर्ण भारत में विशेष महत्व है। ये एकात्म के प्रतीक हैं। उन्होंने हिन्दुत्व पर बोलते हुए कहा कि सभी भारतीय पंथ धर्म मूल्य में विश्वास रखते हैं, जो सत्य, करुणा, शुचिता व तपस पर आधारित हैं। धर्म का अर्थ ‘धार्यते इति धर्म:’ यानी धारण करने योग्य आचरण से है। मानव कल्याण के लिये धर्म की संकल्पना हिन्दुओं का महानतम योगदान है। इन्हें आचरण में लाने वाले सभी मत-पंथ हिन्दुत्व के घटक हैं। शैव, शाक्त, वैष्णव, कबीरपंथी, जैन, सिख, बौद्ध सहित सभी धाराओं में संवाद, समन्वय एवं एकत्व भाव है। उन्होंने पंच परिवर्तन – सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, नागरिक कर्तव्य, स्वबोध और पर्यावरण संरक्षण के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कुटुंब प्रबोधन की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए कहा कि हर भारतीय परिवार को अपने पूर्वजों की कहानियाँ याद रखनी चाहिए और नई पीढ़ी में सामाजिक व राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की भावना जगानी चाहिए। उन्होंने कहा कि लाचित बरफुकन और श्रीमंत शंकरदेव जैसे महापुरुष भले किसी एक प्रदेश में जन्मे हों, परंतु वे पूरे राष्ट्र के प्रेरणास्रोत हैं। मंच पर नगर संघ चालक उमाकांत व्यास भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में स्वयंसेवक, प्रबुद्धजन, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, विभिन्न व्यवसायों से जुड़े लोग तथा समाज के विविध वर्गों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत आमंत्रित अतिथियों के स्वागत के साथ हुई। तत्पश्चात मंचासीन अतिथियों ने भारत माता के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। मंचासीन अतिथियों का औपचारिक परिचय एवं स्वागत किया गया।

Exit mobile version