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272 प्लॉट घोटाला : हाईकोर्ट का एसपी को 45 दिन का अल्टीमेटम, क्या टूट पाएगा सत्ता और भू-माफिया के नेक्सस का खुला खेल

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उदयपुर। नगर निगम का 272 प्लॉट घोटाला अब एक अनंत कथा बन चुका है जिसके किरदार इतने स्वच्छंद हैं कि उन्हें मनमानी स्टोरी प्लांट करने की पूरी प्रशासनिक और पुलिसिया छूट लेकर डांस आफ महाघोटाला करते नजर आ रहे हैं। एक फाइल जो यूडीए से चली, निगम पहुंची और रास्ते में 272 प्लॉट माफिया नेक्सस ने लूट लिए। वाह क्या सीन है??? और पुलिस है कि लूटने वालों में सबका न पता लगा पा रही है ना सजा दिला पा रही है??
अगर जांच एजेंसियां चाहें तो केवल 24 घंटे में घपलेबाजों को बेनकाब कर सकती है। अगर एजेसियां चाहें तो वे सभी चेहरे बेनकाब हो सकते हैं जिनकी चर्चा आजकल जनता में आम हो चली हैं। मगर पैसा बोलता है, पावर बोलता है, रसूख बोलता है…और उनके बोलने से पूरा सिस्टम चुप हो जाता है। रेंगने लगता है केंचूए की तरह। यह कैसी जांच हो रही है उदयपुर के इस महाघोटाले की। एसओजी से लेकर स्थानीय पुलिस तक जांच का सिलसिला इतना धीमा है कि अगर बीरबल की खिचड़ी पकाने वाले कहावत भी इसके आगे पानी भर रही है। अब मामला हाईकोर्ट तक एक बार फिर से पहुंच चुका है। राजस्थान हाईकोर्ट ने उदयपुर एसपी को आदेश दिया है कि 45 दिनों में जांच पूरी कर रिपोर्ट पेश करें, अन्यथा जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि निर्देशों का पालन न करने वाले अधिकारी कानून के दायरे में आएंगे। याने कि आने वाले 45 दिन 272 प्लॉटों के सूरमाओं के लिए अबकी बार ठिठुरन भरे होने वाले हैं।

सब कुछ फर्जी, फिर भी असली जांच एजेंसियां हाथ लगाने से डर रहीं

मामले की शुरुआत 2012 से हुई, जब यूआईटी ने नगर निगम को उदयपुर की कुछ कॉलोनियां हस्तांतरण की। इन कॉलोनियों में बहुत सारे भूखंड खाली थे और अधिकांश कॉर्नर के प्लॉट थे। निगम ने इन पर खुद के बोर्ड लगा रखे थे। लेकिन सार-संभाल नहीं होने पर भूमिदलालों ने कब्जा कर लिया। साफ साफ कहें तो अधिकारियों से लेकर कर्मचारियों तक की मिलीभगत से दलालों से कह दिया गया कि भाई जाओ, बोर्ड उखाड़ो और कब्जा करके जी लो अपनी जिंदगी। तो बोर्ड उखड़ गए, कब्जे हो गए। उसके बाद दलालों ने सोचा कि लगे हाथ फर्जी दस्तावेज बनाकर पूरा राम नाम सत्य कर लेते हैं मामले का। कई भूखंडों के फर्जी दस्तावेज बन गए और कुछ को बेच भी दिया गया। सब कुछ फर्जी, कागज से लेकर मुहर तक। यूं ही तो नहीं बने होंगे। नगर निगम से लेकर यूडीए तक किसी जानकार ने ही बताया होगा कि कागज कैसे बनाने हैं, मुहर कैसे लगानी हैं…। इसके बाद 22 फरवरी 2022 को जब मामला खुल गया। तब नगर निगम ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई, लेकिन जांच 10 साल लंबी खिंच गई। एक दशक तक जांच ही होती रहेगी तो आंच कब आएगी?? तब तक तो घोटाले बाजों की दो तीन पीढ़ियां जिंदगी जी कर परलोक सिधार चुकी होगी?? बड़ा सवाल एक और उठा कि इन भूखंडों का राज आखिर सामने कैसे आया?? क्योंकि चोर—चोर तो मौसेरे भाई होते हैं। बताया यह जा रहा है कि उसको दिया, मुझे नहीं मिला, मुझे कम मिला, मुझे मेरी पसंद का नहीं मिला….कुछ इस तरह की बातों ने रंग में भंग डाल दिया।

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का रुख

चांदपोल निवासी नरेंद्र सिंह राजावत ने गृह विभाग के सचिव, रेंज आईजी, एसपी और हिरणमगरी सीआई के खिलाफ याचिका दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस जांच में जानबूझकर देरी कर रही है। मई 2023 में हाईकोर्ट ने आदेश दिए कि शिकायत आईजी और जांच अधिकारी के समक्ष पेश करें और 15 दिन में निर्णय लें। हाईकोर्ट का आदेश भी नहीं माना। जांच लटकती रही। अबकी बार कोर्ट ने साफ किया है कि एसपी मामले की व्यक्तिगत निगरानी करें और 45 दिनों में रिपोर्ट पेश करें, अन्यथा दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी। याने कि कोर्ट भी समझ रहा है कि न्याय के रास्ते में किरपा कहां पर अटकी हुई है। ऐसे में अब अगर और कोई कानूनी दांव पेच नहीं खेला गया तब उदयपुर 272 प्लॉट घोटाले में सिर्फ मामूली आरोपी नहीं, बल्कि सत्ता, भू-माफिया, पॉलिटिशियन और प्रशासन का नेक्सस सामने आएगा ऐसी उम्मीद की जा सकती है।

राजनीतिक और भू-माफिया नेक्सस
इस मामले के व्हीसल ब्लोअर कांग्रेस के पार्षद अजय पोरवाल हैं मगर वे कांग्रेसी होते हुए भी अपनी ही सरकार से इस मामले की जांच को अंतिम सिरे तक नहीं ले जा पाए। उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जैन ने इस मुद्दे पर विधानसभा आवाज उठाई व इसे 500 करोड़ के घोटाले के रूप में उजागर किया। तब यूडीएच मंत्री जाबर सिंह खर्रा ने कहा कि दोषियों को कोई नहीं बख्शेगा??? मगर हुआ क्या???? 10 साल की देरी और जांच में लचर गति दिखाती है कि सत्ता के संरक्षण में चहेते किस तरह बचाए गए हैं।

एसओजी की कछुआ चाल भी बनी आलोचना का विषय
अब तक केवल पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है इस मामले में । राकेश सोलंकी, दीपक सिंह, किशनलाल, राजेंद्र धाकड़ और राजदीप वाल्मिकी। ये चेहरे लो प्रोफाइल हैं, उनके पीछू किसका हाथ है?? मुख्य नेटवर्क – पॉलिटिशियन, दलाल और भ्रष्ट अधिकारी – अब तक ना जाने किस महान शक्ति की छत्र छाया में छिपे हैं। फर्जी दस्तावेज, नामांतरण, बेच दिए गए भूखंड और दलालों का सक्रिय नेटवर्क साफ दिखा रहा है कि यह मामला सिर्फ 272 प्लॉट नहीं, बल्कि सत्ता और भू-माफिया का गठजोड़ है। हाईकोर्ट का अल्टीमेटम और लगातार लटकती जांच साफ बता रही है कि जिम्मेदार लोग अपने-अपने पद और संरक्षण का इस्तेमाल करके किसी को बचाने का भरसक प्रयास कर रहे है।

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