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सवाल : सांसद मन्नालाल रावत ने सदन में क्यों मांगे उदयपुर व आसपास के जिलों के मनरेगा के आंकड़े?? आंकड़ों से उभरी तस्वीर – लगातार घटते जा रहे हैं काम के मौके?? कहीं आधे तो कहीं एक चौथाई को ही मिल रहा काम!!!

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24 न्यूज अपडेट, उदयपुर। उदयपुर सांसद डॉ. मन्ना लाल रावत ने आज लोकसभा में एक अतारांकित प्रश्न पूछा जिसमें मनरेगा के कुछ आंकड़े मांगे गए। ये सभी आंकड़े उदयपुर में संभागीय आयुक्त स्तर पर भी मांगे जा सकते थे। इसमें उन्होंने उदयपुर, डूंगरपुर, सलूम्बर और प्रतापगढ़ जिलों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (एमजीएनआरईजीएस) के तहत काम कर रहे लोगों को जातिवार, ब्लॉकवार आदि ब्योरे भी मांगे। अब सवाल यह उठ रहा है कि सभी आंकड़े जब स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध हैं तो उनके बारे में संसद में सवाल पूछने का क्या लॉजिकल ऑचित्य बनता है? आंकड़ों का संग्रहण जिला स्तर पर जो मांगा गया है उससे भी अधिक डीटेल में सांसद के कहने पर लिया जा सकता है तो आंकडे स्थानीय स्तर पर नहीं मांग कर संसद में अतारांकित प्रश्न के माध्यम से मांगे जाने का कारण आखिर क्या रहा होगा?
सांसद को मिले आंकड़ों को विश्लेषण करने पर हमने पाया कि इस लगातार मनरेगा में काम के अवसर कम होते जा रहे हैं। उदयपुर, डूंगरपुर, सलूम्बर और प्रतापगढ़ जिलों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (एमजीएनआरईजीएस) के तहत काम करने वालों की संख्या कम होती जा रही है। इसके अलावा पंजीकरण करवाने वालों की संख्या के मुकाबले काम के अवसर आधे या उससे ही कहीं अधिक हैं। यह संख्या बता रही है कि इसमें और अधिक बढोत्तरी करने की जरूरत है क्योंकि बेरोजगारों की संख्या जनसंख्या के अनुपात में लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में काम के अवसर लगातार बढ़ने चाहिए थे जबकि यहां पर तो कम होते जा रहे हैं। पाठक भी चार्ट का अवलोकन करके इन तथ्यों को जांच सकते हैं। यदि इनकी विवेचना में हमसे कोई त्रुटि हुई है तो पाठक बता सकते हैं ताकि संशोधन किया जा सके।
उदयपुर में कुल 1207164 लोगों ने मनरेगा के लिए पंजीकरण करवा रखा है। जबकि इस फाइनेंशियल इयर में अब तक 359589 लोगों को ही काम मिल सका है। अर्थात लगभग एक चौथाई को ही काम मिला है। डूंगरपुर में 806637 लोगों ने पंजीकरण करवाया मनरेगा में काम के लिए मगर 435600 लोगों को ही काम मिला। अर्थात करीब आधे लोगों को काम मिला। प्रतापगढ़ में 422884 लोगों ने पंजीकरण करवाया मनरेगा में काम के लिए लेकिन 279711 को ही काम मिल पाया। इसके पीछे क्या कारण रहे, यह तो अफसर व सरकारी तंत्र में काम करने वाले ही बता सकते हैं। इसके अलावा फाइनेंशियल इयर के बचे हुए महीनों में कामों की संख्या बढ़ जाएगी यह भी देखना होगा लेकिन संख्या इतनी नहीं बढ़ सकती कि सभी काम मांगने वालों को काम मिल जाए। इसका निष्कर्ष यह निकल रहा है कि आदिवासी इलाकों में काम मांगने वालों की संख्या के मुकाबले आधों व कहीं कहीं एक चौथाई को ही मनरेगा में काम मिल रहा है।

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