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शिक्षा विभाग में निदेशक के तुगलकी फरमान के चर्चे : रोज सुबह साढ़े 8 बजे तक भेजें छवि खराब करने वाले नकारात्मक समाचारों की लिस्ट, चूक गए तो होगी कार्रवाई

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24 न्यूज अपडेट उदयपुर। माध्यमिक शिक्षा, राजस्थान, बीकानेर के निदेशक आईएएस अफसर आशीष मोदी की ओर से जारी किया गया एक हास्यास्पद आदेश इन दिनों शिक्षा विभाग और मीडिया जगत में सुर्खियां बंटोर रहा है। इस आदेश में कहा गया है कि क्षेत्राधीन / अधीनस्थ जिला शिक्षा अधिकारी माध्यमिक शिक्षा विभाग से संबंधित प्रमुख समाचार पत्रो में प्रकाशित नकारात्मक समाचार जिससे विभाग की छवि धूमिल होने की आंशका हो या जिसके प्रति विभाग का उत्तरदायित्व निर्धारित होता हो, उसकी प्रकाशित खबर, प्रतिदिन सुबह 8.30 बजे तक विभाग की ई-मेल आई.डी.- newseduvigilance@gmail-com पर दमूमकन अपहपसंदबम/हउंपस.बवउ पर आवश्यक रूप से भिजवाना सुनिश्चित करें। साथ ही ऐसी नकारात्मक खबरो से सम्बन्धित तथ्यात्मक प्रतिवेदन उसी दिन दोपहर 2 बजे तक उक्त मेल आई.डी. पर भिजवाया जाना सुनिश्चित करें । यदि ऐसी कोई नकारात्मक समाचार निदेशालय के संज्ञान में आने से रह जाता है तो इसका सम्पूर्ण उत्तरदायित्व आपका होगा। इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दें। इस आदेश के आने के बाद से चर्चा हो रही है कि आखिर अधिकारी कैसे तय करेंगे कि नकारात्मक खबर क्या है जिससे विभाग की छवि खराब हो रही है। जबकि सभी खबरों का मकसद ही जनता की परेशानी को जनता की सहुलियत के लिए राजनीतिक और सरकारी तंत्र के सामने लाकर उसके समाधान की तरफ प्रवृत्त होना है। हर खबर इसी मकसद से लिखी जाती है।
आपको याद दिला दें कि मीडिया के लिए शिक्षा विभाग खबरों का खजाना होता है क्योंकि धरातल पर वे स्थितियां कभी नहीं होतीं जो आदर्श रूप में आदेशों और सर्कुलरों व नियम-विनियमों में लिखी जाती हैं। शिक्षा का अधिकारी अधिनियम को ही लें तो इसके तहत हर स्कूल में आदर्श रूप में हर तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर होना जरूरी है। छात्र-शिक्षक अनुपात से लेकर हर चीज पहले से बरसों पहले से तय की जा चुकी है मगर क्या आदर्श रूप् में ऐसा हो रहा है। स्कूलों की बिल्डिंग बदहाल हैं, कई जगह तो छत तक नसीब नहीं है। जहां छतें हैं वहां भी थोड़ी सी बारिश में छतें ढहने जैसी खबरें आ रही हैं। पोषाहार में भी कई जगह लोयचा है। टीचर्स के बरसों से तबादले नहीं हुए हैं। कहीं पर डेपुटेशन आदि के मसले हैं। तो क्या इनसे संबंधित खबरों को नकारात्मक माना जाएगा। यह एक तरीके से मीडिया को ही सेंसर करने व लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के अधिकार की सीमाओं में अतिक्रमण का अनुचित प्रयास हो रहा है ताकि समस्याएं बताई ही नहीं जाएं और उपरी स्तर पर सब कुछ फील गुड होता रहे।
एक और पक्ष यह है कि कई बार जन प्रतिनिधि, एसडीएम, कलेक्टर स्कूलों के निरीक्षण पर जाते हैं और कई तरह की खबरे ंआती हैं। मसलन स्कूल में पोषाहार की दिक्कत है, बिल्डिंग में परेशानी है, फर्निचर नहीं है, लैब का अता-पता नहीं है। बच्चों का मानसिक स्तर कमजोर है। बच्चों के पास कॉपी व बैग नहीं है। टॉयलेट की सुविधा नहीं है, शिक्षक इतने कम हैं कि चार-चार कक्षाओं को मर्ज करते हुए एक साथ पढ़ाने की मजबूरी है। यदि इस प्रकार की खबरें छपती हैं तो क्या उन्हें इस आदेश के तहत निगेटिव न्यूज माना जाएगा और संबंधित जन प्रतिनिधि व अफसर से सवाल किए जाएंगे कि उन्होंने इंस्पेक्शन में खामियां निकाल कर खबरनवीसों को नकारात्मक खबर लिखने का मौका ही क्यों दिया।
इसके साथ ही अब इस प्रकार के मामलों को देखने के लिए निचले स्तर पर स्टाफ की तैनाती करनी होगी जो अलसुबह उठ कर अखबार व मीडिया का सूक्ष्म अवलोकन करें और उसके बाद अपने खुद के बनाए मानदंडों के आधार पर तय करें कि खबर सकारात्मक है या नकारात्मक। फिर उसकी कटिंग लेकर उसकी साफ पढ़ी जा सकने वाली स्कैन कॉपी को बड़े साहब को तय समय सीमा में ई-मेल करें। ई-मेल करने के बाद सारा काम छोड़ कर तथ्य जुटाएं कि नकारात्मक तथ्यों की क्या काट हो सकती है ताकि विभाग की छवि को आंच लाने से बच जाएं। उसके तथ्यों को दोपहर तक ई-मेल पर भेजें।
शिक्षाविदों का कहना है कि इस प्रकार के बकवास किस्म के सर्कुलरों की बजाय अफसरों को ग्रांउड लेवल पर उतर कर समस्याओं को देखना और मीडिया के माध्यम से लगातार फीडबैक लेते हुए उनके समाधानों के रास्ते खोजने होंगे। केवल एयरकंडीशंड कमरों में बैठ कर बेतुके सर्कुलर निकालने से भी विभाग की कम जग हंसाई नहीं हो रही है।

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