24 न्यूज़ अपडेट उदयपुर. सावित्री बाई फूले भारतीय समाज की एक महान सुधारक और शिक्षिका थीं, जिन्होंने विशेष रूप से वंचित और अस्पृश्य जातियों की बालिकाओं की शिक्षा में योगदान दिया। उन्होंने अपने पति ज्योतिराव फूले के साथ मिलकर 18 पाठशालाओं का संचालन किया, जिसमें उन बच्चों को शिक्षा दी जाती थी, जिन्हें समाज द्वारा अछूत माना जाता था। उनका जीवन संघर्ष और समर्पण का प्रतीक था।
सावित्री बाई ने न केवल शिक्षा का प्रचार किया, बल्कि समाज के अन्यायपूर्ण रवैये के खिलाफ भी संघर्ष किया। वे बालिका शिक्षा की सशक्त समर्थक थीं और उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए भी जोरदार आवाज उठाई। उन्होंने ‘महिला सेवा मंडल’ की स्थापना की और महिलाओं के लिए समान अधिकारों की वकालत की। उनका दृष्टिकोण समाज में समानता और समरसता का था, जो उनके कार्यों से स्पष्ट होता है।
सावित्री बाई का योगदान सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं था। उन्होंने 1897 में पुणे में एक चिकित्सालय की स्थापना की, जब न्युबोनिक प्लेग महामारी के रूप में फैल रहा था। वे संक्रमित क्षेत्रों में पहुंचकर पीड़ितों की मदद करती थीं और इस दौरान वे स्वयं भी प्लेग का शिकार हो गईं। इस महान कार्य के कारण उन्होंने अपनी जान गंवा दी, लेकिन उनका बलिदान मानवता की सेवा का प्रतीक बना।
सावित्री बाई फूले की कविताएँ और लेखन भी समाज सुधारक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। उनका लेखन शिक्षा, समानता और महिलाओं के अधिकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत था। उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से समाज में व्याप्त जातिवाद और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई।
सावित्री बाई का जीवन इस बात का उदाहरण है कि कैसे एक व्यक्ति समाज में बदलाव ला सकता है। वे अपने समय की रूढ़िवादी परंपराओं के खिलाफ खड़ी हुईं और महिलाओं के लिए शिक्षा और समानता की राह खोली। आज जब हम उनके योगदान को याद करते हैं, तो हमें यह समझना चाहिए कि महिला शिक्षा और समाज सुधार के लिए उनके संघर्ष ने समाज को कितना लाभ पहुँचाया। उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि शिक्षा और जागरूकता ही समाज में वास्तविक परिवर्तन ला सकती है।
सावित्री बाई फूले न केवल एक महान शिक्षिका थीं, बल्कि समाज सुधारक, नारीवादी और मानवता की सशक्त प्रतीक भी थीं। उनके योगदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। आज उनके जन्मदिवस पर उनकी कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से उन्हें शत—शत नमन।

