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यहां होता है गोबर, गूगल, लोबान, कपूर से बने कंडों से बनी होलिका का दहन

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24 न्यूज अपडेट़.बांसवाड़ा। होली का पर्व पर्यावरण जागरूकता से भी जुड़ गया है। बरसों पहले जब जल, जंगल और जमीन की खूब उपलब्धता थी तब होली के लिए सेमल के पेड़ों को काम में लेना आम बात थी। जंग से सेमल का पेड़ काट कर उससे होली बनाई जाती। मगर कालांतर में होली गांव-गांव व गली-गली बनने लगी। पहले गांव में एक होती थी अब एक ही शहर में 300 से अधिक होलियां जलती हैं। ऐसे में समस्या यह हुई कि होली के लिए लकडी आखिर कहां से लाएं। ऐसे में अंधाधुंध रूप से सेमल के पेड़ काटे गए और अब हालत ये है कि जो मेवाड़-वागड़ सेमल के सुर्ख लाल फूलों वाले पेड़ के लिए जाना जाता था वहां पर सेमल के पेड़ देखने तक को नहीं मिलते हैं। कहीं सुदूर जंगलों में ही इसके दर्शन होते हैं। ऐसे में जागरूक लोगों ने सोचा कि क्यों नहीं परम्पराओं में पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी जोड़ा जाए। होली ऐसी मनाई जाए कि होलिका दहन के दौरान भी सबको अच्छे स्वास्थ्य की भी सौगात मिल जाए। ऐसे में तैयार होने लगे मशीन से निर्मित गौकाष्ठ। बांसवाड़ा में इस बार होलिका दहन के लिए मंदारेश्वर स्थित गोशाला ने बड़ी संख्या में गौकाष्ठ और कंडे तैयार हो रही है। खास बात यह है कि ये सब मशीन से तैयार हो रहे हैं एक मशीन हर रोज 50 से अधिक गौकाष्ठ तैयार कर रही है। इनकी लंबाई भी अच्छी खासी, ढाई फीट की है। इनमें गोबर के अंदर गूगल, लोबान, जौ तिल, कपूर सरीखे हवान सामग्री और सूखा कटा चारा का मिश्रण है। इनको जलाने से हवन जैसी अनुभूति होती है। वातावरण शुद्धि का उपक्रम होता है। यहां पर अब तक 15 हजार से अधिक कंडे बनाए जा चुके हैं। लेखराज फाउंडेशन के शैलेंद्र सराफ बताते हैं कि होली से बहुत पहले ही यह काम शुरू कर दिया। मशीनों से गोकाष्ठ बनाने से यह यह आमजन के लिए रियायती दर पर उपलब्ध है।
इस गोशाला में 200 गायें हैं जिनसे हर रोज रोजाना 50 किलो गोबर मिलता है। ऐसे में गोबर की उपलब्धता की कोई समस्या नहीं है। गोबर से खाद, गौकाष्ठ और कंडे तीनों ही बनाए जा रहे हैं। एक गौकाष्ठ को सूखने में 3 दिन लगते हैं। इनके उपयोग के प्रति अब लोगों में खासी जागरूकता आ रही है। इससे गौ सेवा का सुख भी मिलता है। पेड़ों को भी कटने से रोकते हैं। क्योंकि मनुष्य का पूरा जीवन ही पेड़ों पर टिका हुआ हैं।

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