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नेत्रहीन होते हुए भी जैन शास्त्र कंठस्थ करने वाली बाल ब्रह्मचारिणी पूजा हण्डावत को सरस्वती नेत्रा अलंकरण सम्मान

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24 न्यूज़ अपडेट उदयपुर। नेत्रहीन होते हुए भी जैन शास्त्र कंठस्थ करने वाली बाल ब्रह्मचारिणी सुश्री पूजा हण्डावत को शुक्रवार को पंचम पट्टाचार्य आचार्य वर्धमानसागरजी महाराज के सान्निध्य में पारसोला जैन समाज की ओर से सरस्वती नेत्रा उपाधि से अलंकृत किया गया। इस अवसर पर वर्धमानसागर महाराजश्री के संघ का सान्निध्य रहा व संघ सारथी गज्जूभैया व पारसोला जैन समाज सहित अनेकानेक बाहर से आए भक्तगण भी मौजूद थे। बाल ब्रह्मचारिणी पूजा हण्डावत ने अब तक हजारों उपवास किए व आजीवन नमक का त्याग रखा है। गौरतलब है कि आचार्य श्री की परम्परा में आचार्य श्री शान्ति-वीर-शिव-धर्म-अजित के उपरान्त वर्तमान में पंचम पट््टाचार्य वात्सल्य वारिधि 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज के आदेश, सान्निध्य व निर्देशन में प्रथमाचार्य शान्तिसागर महाराज का आचार्य पद प्रतिष्ठापन शताब्दी महोत्सव वर्ष 2024-25 सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाया जा रहा है। इसका शुभारम्भ पारसोला, राजस्थान में भव्यातिभव्य लाखों श्रद्धालुओं व आचार्य श्री की संघ की सन्निधि में हुआ। सरस्वती की निःस्वार्थ सेवा करने वालों में बा. ब्रह्मचारिणी पूजा हण्डावत का नाम अग्रणी है। बहुआयामी प्रतिभा से युक्त 37 वर्ष में जैनधर्म के सभी छोटे-बड़े ग्रंथों का अध्ययन कर मुनि-आर्यिका संघ में पठन-पाठन करवाना व कंठस्थ करना आपका ध्येय है। इस श्रुति भक्ति से प्रेरित हो, आजीवन नमक त्याग, ब्रह्मचर्य व्रत, क्षुद्र जल त्याग किया है। गणधरवलय विधान के 1452, कर्मदहन के 136, जिन सहस्त्रनाम के 1008, पंचकल्याणक 120 उपवास, आदि अनेक उपनामों की साधना से अपने को साधित कर रही हैं। नेत्र ज्योति नहीं होने पर भी आपका सरस्वती रूपी नेत्र अहर्निश देदीप्यमान प्रकाशमान रहता है।शास्त्र के प्रति अनन्य विनय एवं भक्ति से प्रभावित होकर पावन वर्षा योग एवं आचार्य पद प्रतिष्ठापन शताब्दी महोत्सव समिति की ओर से उन्हें सरस्वती नेत्रा के अलंकरण से अलंकृत किया गया है।

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