24 न्यूज अपडेट, डूंगरपुर। इस टेण्डर पर यह पंक्तियां चरितार्थ हो रही है-अपनों ने हमें लूटा, गैरों में कहां दम था, अपनी तो कश्ती भी वहीं पर डूबी जहां पानी कम था। मामला डूंगरपुर में हाल ही दिए गए एक टेण्डर के वर्कऑर्डर का है जो मिड डे मील वितरण व्यवस्था से जुड़ा हुआ हैं। मिड डे मील याने कि एमडीएम के इस टेण्डर में जहां देखो वहां पर झोल दिखाई देते हैं। सरकारी सिस्टम किस तरह से किसी एक के लाभ के लिए सभी हदें पार कर जाता है, इसका भी उदाहरण है। इस टेण्डर में हुआ ये है कि अब तक जो सरकारी सिस्टम डूंगरपुर जिले में मिड डे मिल को स्कूलों तक पहुंचाने का काम कर रहा था वह कुल 55 रूपए का खर्च करके यह काम कर रहा था। इसमें कर्मचारियों की तनख्वाह भी मुश्किल से निकल रही थी। जगह-जगह बड़े बड़े गोदामों का मेंटेनेंस हो रहा था। अब वही काम नेताओं और सरकार की मेहरबानी से एक फर्म को 14 रूपए 49 पैसे में दे दिया गया है। साधारण सा गणित समझें तो यह लगभग असंभव है। यदि होगा तो इसमें भ्रष्टाचार जैसा कुछ नहीं होगा इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती है। इसके साथ ही सहकारी समिति जो यह काम कर रही थी, उसको निजी कंपनी को बाईपास करने से कर्मचारी बेरोजगार हो जाएंगे व करोड़ों के गोदामों पर ताले लग जाएंगे जो जनता के सरकारी पैसों से बने हैं।
यह है मामला
क्रय-विक्रय सहकारी समितियों के माध्यम से अब तक स्कूलों में मिड डे मील का जिम्मा दिया जा रहा था। इसके लिए पूरे जिले में गोदाम भी बने हुए हैं। इस व्यवस्था में सरकारी कर्मचारी भी जुड़े हैं तो समिति सदस्यों के रूप में अन्य भी। मिली जुली व्यवस्था होने से निगरानी भी पक्की हो रही थी। सितंबर में जब नया टेण्डर निकाला गया तो सात फर्मों ने पार्टिसिपेट किया। इसमें से एक पार्टी की बिड तकनीकी रूप से सफल मिली तो एक ही पार्टी होने का तर्क देते हुए निरस्त कर दिया गया। दूसरी बार टेण्डर दिसंबर हुआ व फिर से सात पार्टियों ने टेण्डर डाले व इस बार भी एक के नाम पर खुला। टेण्डर फर्म निवेदिता को जनवरी के अंतिम सप्ताह में वर्कऑर्डर जारी किया गया।
यह है पैसों का गणित
सरकारी दर से यह काम कराने में संस्था को 15 प्रति क्विंटल आय से संस्था कार्मिकों का वेतन निकलता है। इस कार्य के लिए वास्तविक व्यय मजदूरी एफसीआई से संस्था गोदाम तक पहुंचाने का 7 रूपया क्विंटल एवं एफसीआई से संस्था तक गोदाम किराया 8 रूपया, संस्था गोदाम से स्कूल तक मजदूरी 7 रूपए तथा संस्था गोदाम से स्कूल तक किराया पीडीएस की दर के अनुसार 33 रूपए वास्तविक है। याने कि कुल 55 प्रति क्विंटल व्यय हो रहा है। जबकि निविदा के अनुसार 14.49 रूपए में कार्य आदेश जारी किया गया है जिसमे अनियमितता होने का संकेत हैं। सवाल उठ रहा है कि इतने कम में यदि संभव था तो अब तक सरकारी स्तर पर क्यों नहीं किया गया। यदि अब होगा तो कैसे हो जाएगा??
किसी रहेगी सिक्योरिटी और गारंटी
निविदा दाता से 25 लाख रुपये की बैंक गारंटी एवं 1,75,000 रुपये सिक्यूरिटी ली जाती है। त्रमासिक आवंटन 13000 क्विंटल गेहूं और चावल की बाज़ार मूल्य 3,25,00,000 करोड़ रुपये की होती है। एक तर्क दिया जा रहा है कि ठेकेदार अपने निजी गोदाम में यह माल भरेगा व यदि चोरी हो गया तो सरकार कैसे वसूल करेगी। संस्था में तो सरकारी कार्मिकों व गोदाम संस्था के स्वयं हो कर बीमित होते हैं। यहां पर जिम्मेदारी किसकी होगी। पूर्व में 3 माह पहले निविदा आमंत्रित की गई थी ंजिसमे में एक ही निविदा टेक्निकल में सफल रही थी, कार्य आदेश नहीं दे कर टेंडर प्रक्रिया को ही निरस्त कर दिया गया था। वर्तमान में भी 7 में से एक ही निविदा टेक्नीकल में सफल होने पर भी कार्य आदेश कैसे जारी हो गया। यह भी आरोप है कि वर्तमान फर्म को लाभ पहुंचाने के लिए उसकी कमियां पूरी करने के लिए बुलाया गया, जबकि अन्य को यह अवसर सुलभ नहीं था। अब तक ऐसा नहीं होता था।
गोदाम को लेकर भी सरकारी दरियादिली
अभी सरकारी गोदामों पर ताले लगना तय है। उनका क्या होगा, यह पता नहीं है। समिति के पास आसपुर, सागवाड़ा व सीमलवाड़ा में गोदाम है। नई संस्थान ने प्रावइेट गोदाम हायर किए हैं। अब फर्म को अन्य जगहों पर गोदाम स्थापित करने का सुलभ अवसर टेण्डर की शर्तों के विपरीत दिया जा रहा है।
Discover more from 24 News Update
Subscribe to get the latest posts sent to your email.