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“पुत्रवती भव ही क्यों? ‘पुत्रीवती भव’ क्यों नहीं?” — महिला समानता पर उठे तीखे सवाल,अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित विचार गोष्ठी

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उदयपुर, 8 मार्च। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर रविवार को माछला मंगरा स्थित शिराली भवन में आयोजित विचार गोष्ठी में समाज में महिलाओं की स्थिति, बराबरी के अधिकार और मौजूदा चुनौतियों पर गंभीर मंथन हुआ। अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति और भारतीय ट्रेड यूनियन केंद्र (सीटू) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने समाज की परंपरागत सोच पर सवाल उठाते हुए महिलाओं की वास्तविक आजादी और समानता की आवश्यकता पर जोर दिया।

कार्यक्रम की मुख्य वक्ता लेखक और साहित्यकार डॉ. कुसुम मेघवाल ने अपने संबोधन में समाज की मानसिकता पर तीखा प्रश्न उठाते हुए कहा कि जब यह कहा जा रहा है कि महिलाएं आज हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, तो फिर आज भी बड़े-बुजुर्ग आशीर्वाद देते समय केवल “पुत्रवती भव” ही क्यों कहते हैं? “पुत्रीवती भव” क्यों नहीं? उन्होंने कहा कि यह सोच बताती है कि समाज में आज भी बेटियों के प्रति समान दृष्टि विकसित नहीं हो पाई है।
उन्होंने कहा कि महिलाओं की गुलामी की जड़ें पूंजीवादी और सामंती व्यवस्था में गहराई से जमी हुई हैं और जब तक इन व्यवस्थाओं में बदलाव नहीं होगा, तब तक महिलाओं को वास्तविक आजादी और बराबरी का अधिकार मिलना मुश्किल है।

गोष्ठी को संबोधित करते हुए सीटू के जिलाध्यक्ष एवं पूर्व पार्षद राजेश सिंघवी ने एक अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्होंने करीब 50 महिलाओं की सभा में जब यह सवाल किया कि क्या वे अगले जन्म में भी महिला बनना पसंद करेंगी, तो एक भी महिला ने सहमति नहीं दी। उन्होंने कहा कि यह स्थिति समाज में महिलाओं की वास्तविक स्थिति को दर्शाती है।
सिंघवी ने कहा कि भले ही महिलाओं के अधिकारों के लिए कई कानून बने हों, लेकिन केवल कानूनों से महिलाओं को न्याय और समानता नहीं मिल सकती। इसके लिए महिलाओं को अपने रोजमर्रा के संघर्ष को व्यापक सामाजिक बदलाव के संघर्ष से जोड़ना होगा।

कार्यक्रम में सहायक व्याख्याता जया कुंपावत ने कहा कि समाज में महिला के “मां” होने को इतना अधिक महिमामंडित कर दिया गया है कि कई बार वह अपना स्वतंत्र अस्तित्व ही भूल जाती है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को अपने भीतर की झिझक और डर से भी लड़ना होगा और गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का साहस जुटाना होगा। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब महिलाएं अब थोड़ा-थोड़ा स्वतंत्र जीवन जीना सीख रही हैं तो समाज इससे घबराता क्यों है?

डॉ. सीमा जैन ने कहा कि आज भी महिला की स्वतंत्र पहचान नहीं है। जन्म से लेकर मृत्यु तक उसकी पहचान किसी न किसी पुरुष से जोड़ दी जाती है। उन्होंने कहा कि असली स्वतंत्रता तब मानी जाएगी जब महिला को अपने जीवन के सभी निर्णय स्वयं लेने का अधिकार मिलेगा। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या महिला की पहचान सिर्फ किसी की बेटी, पत्नी, मां या बहन होने तक ही सीमित रहनी चाहिए?

राजस्थान मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव यूनियन के सचिव बृजेश चौधरी ने कहा कि आज दुनिया संघर्ष और अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। अगर दुनिया में शांति और मानवीय मूल्यों को स्थापित करना है तो महिलाओं को सत्ता और निर्णय प्रक्रिया में अधिक भागीदारी देनी होगी।

मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव मोना अग्रवाल ने कहा कि जिस घर में महिलाओं का सम्मान होता है वह घर स्वर्ग के समान होता है, लेकिन दुर्भाग्य से महिलाओं को वह सम्मान अब तक पूरी तरह नहीं मिला। उन्होंने महिलाओं से संगठित होकर बदलाव के आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया।

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए पूर्व पार्षद गणपति देवी सालवी ने कहा कि महिलाओं को देवी का दर्जा नहीं चाहिए, उन्हें केवल इंसान समझकर बराबरी का अधिकार दिया जाए। उन्होंने कहा कि एक संतुलित जीवन के लिए आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे सामाजिक-पारिवारिक जीवन का सिद्धांत माना गया है, लेकिन महिलाएं रोज 14 से 18 घंटे तक काम करती हैं और इसके बावजूद उनसे पूछा जाता है कि वे करती ही क्या हैं।

महिला समिति की अध्यक्ष साबिरा अतारी ने कहा कि महिलाओं की समानता की लड़ाई केवल महिलाओं की नहीं बल्कि एक सभ्य समाज की लड़ाई है। उन्होंने कहा कि इसके लिए पुरुषों में भी जागरूकता और संवेदनशीलता विकसित करना जरूरी है।

घरेलू कामगार महिला संगठन की अध्यक्ष रेखा भटनागर ने कहा कि महिलाओं के श्रम का कभी सही मूल्यांकन नहीं किया गया। यदि घर और समाज में महिलाओं के श्रम का आर्थिक मूल्यांकन किया जाए तो पता चलेगा कि दुनिया की सबसे बड़ी अनदेखी महिलाओं के श्रम के साथ हुई है।

निवर्तमान पार्षद राजेंद्र वसीटा ने कहा कि समाज में लाभ से जुड़े काम पुरुषों के हिस्से और अलाभ के काम महिलाओं के हिस्से कर दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं को राजनीति से दूर रखने की सोच भी गलत है, क्योंकि राजनीति ही उनके अधिकार और जीवन स्तर को तय करती है।

घरेलू कामगार महिला संगठन की सचिव लाली सालवी ने कहा कि महिलाओं की योग्यता और काम पर लगातार सवाल उठाकर उनके सामने पहचान का संकट पैदा किया जाता है, लेकिन इसके बावजूद महिलाएं हर चुनौती का सामना कर आगे बढ़ रही हैं और उन्हें गर्व है कि वे महिला हैं।

सभा को संबोधित करते हुए बसंती वैष्णव ने कहा कि भले ही कहा जाता है कि महिलाएं आगे बढ़ रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी इसके विपरीत दिखाई देती है। महिलाओं के पक्ष में बने कानूनों का लाभ भी उन्हें पूरी तरह नहीं मिल पा रहा है।

गोष्ठी में मेवाड़ शक्ति कल्याण ट्रस्ट के नरेंद्र रावल, शमशेर खान, अमजद शेख, अनिल पनोर, सागर मीणा, विजयपाल परमार, रघुनाथ सिंह, भगवती देवी सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपने विचार रखे।

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