24 News Update उदयपुर। राजस्थान में सुशासन अब चार पहियों पर सवार हो चुका है—और वो भी टोयोटा फॉर्च्यूनर पर सरपट भाग रहा है। भजनलाल सरकार के दौर में यह ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज हो गई और जनता के पैसों का धुआं करते हुए पहली बार मंत्रियों को सरकारी फॉर्च्यूनर गाड़ियाँ आवंटित की जा रही हैं, ताकि जनसेवा की राह में कहीं उनकी पीठ न दुख जाए। पंथ् है पथरीला पैदल न चलो तुम, कहीं पांवों में छाला न पड़ जाएं…. के दिन अब चले गए। अब तो पेट का पानी भी ना हिले और एसी का तापमान भी लोकतांत्रिक स्तर से नीचे न जाए ऐसी व्यवस्था हो रखी है। आखिर जनता का पैसा है ही सदुपयोग के लिए तो उसका दिल खोल कर इस्तेमाल हो रहा है। सत्ता को सुकून मिलेगा तभी तो विकास का अमृत काल दिखाई देगा।
सरकार ने हाल ही में दो दर्जन से अधिक नई फॉर्च्यूनर के ताज़ा मॉडल खरीदे हैं, एकदम चमामच। अब ये गाड़ियाँ मंत्रियों को एक-एक कर आवंटित की जा रही हैं। बताया जा रहा है कि आज भी कई मंत्रियों को नई गाड़ियों की चाबी सौंप दी गई। यह वही राजस्थान है, जहाँ कभी सरकारी जीप में मंत्री बैठते थे और जनता समझती थी कि नेताजी भी हमारे जैसा है। अब फॉर्च्यूनर में बैठा मंत्री दूर से ही बता देता है कि हम आपके जैसे नहीं हैं, बल्कि यह कह देगा कि हम आपके हैं कौन??
विडंबना यह है कि कई मंत्रियों के पास पहले से निजी फॉर्च्यूनर मौजूद हैं। लेकिन लोकतंत्र में निजी और सरकारी सुख-सुविधा का संतुलन भी तो बहुत ही ज़रूरी हो जाता है। घर की फॉर्च्यूनर थक जाए तो दफ़्तर की फॉर्च्यूनर तैयार खड़ी मिले। इसे ही कहते हैं सरकारी नीतियों को बेहतरीन इंस्तेमाल।
यह अब तक की सबसे महंगी लेकिन सबसे ज़रूरी व्यवस्था बताई जा रही है। क्योंकि मंत्री अगर आराम से नहीं पहुँचेंगे तो जनता तक काम कैसे पहुँचेगा?
अब सवाल यह नहीं कि 13–14 करोड़ रुपये खर्च हुए या नहीं, सवाल यह है कि यह खर्च किस दर्द की दवा है। या फिर दर्द का ही कारण तो नहीं है?? क्या सड़क पर गड्ढे में फिसल कर कुचलते हुए बच्चे नहीं दिखाई देते? क्या स्कूलों की जर्जर हालत और अस्पतालों की व्यवस्थाएं नहीं दिखाई देती हैं। मगर अब फॉर्च्यूनर आ जाने से सब कुछ ठीक हो जाने वाला है। आप अगर खबर पढ़ रहे हैं तो आपको भी मुबारक। सुपर-लग्ज़री फॉर्च्यूनर कि किश्तें आपको ही देनी हैं। आप देख कर खुश होकर किश्त देना चाहते हैं या फिर मंत्रियों के अमृत काल को कोस कर ये तो आपको ही तय करना है।
असल चिंता यह नहीं कि मंत्री आराम से सफ़र कर रहे हैं। चिंता यह है कि अब ये सरकारी नीति बन चुकी है कि ये आराम का मामला है, अपुन की चॉइस का मामला है। सादगी के जुमले को सिर्फ भाषणों में बंधक बना कर रख दिया गया है। गांधी जी कहते थे—सत्ता में बैठे व्यक्ति को जनता के जीवन-स्तर के करीब रहना चाहिए। राजस्थान में प्रयोग उल्टा हो रहा है—सत्ता को ऊपर उठाया जा रहा है, जनता को समझाया जा रहा है कि फॉर्च्यूनर को देख कर सपने देखो, एक दिन उसे पाने की तमन्ना भी पूरी होकर रहेगी।
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