24 News Update उदयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने बिना दोष सिद्ध हुए किसी आरोपी को छह साल चार महीने तक जेल में रखने को न्यायिक व्यवस्था की गंभीर विफलता करार देते हुए कड़ी नाराज़गी जताई है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि जब न्यायिक प्रक्रिया खुद सजा बन जाए, तो यह कानून के शासन के लिए खतरनाक संकेत है। जस्टिस अनिल कुमार उपमन की पीठ ने संजीवनी क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी के तत्कालीन चेयरमैन शैतान सिंह को जमानत देते हुए इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का घोर उल्लंघन बताया।
अदालत के सामने तथ्य चौंकाने वाले थे—जिन धाराओं में चार्जशीट पेश की गई, उनमें अधिकतम सजा सात साल है, जबकि आरोपी 20 सितंबर 2019 से जेल में बंद था। न तो अब तक चार्ज फ्रेम हुए, न कोई रिकवरी हुई और न ही ट्रायल शुरू हो पाया। एसओजी साल 2020 में जांच पूरी कर चुकी है और सह अभियुक्तों सहित 12 आरोपी पहले ही जमानत पर हैं।
सरकार ने जमानत का विरोध करते हुए देरी का ठीकरा आरोपी पक्ष पर फोड़ा और कहा कि चार्ज पर बहस के लिए बार-बार समय मांगा गया, सुनवाई करीब 60 बार स्थगित हुई। साथ ही आरोपी को आदतन अपराधी बताते हुए 38 अन्य मामलों और करोड़ों के कथित घोटाले का हवाला दिया गया।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने दो टूक कहा कि “सजा से पहले सजा न्याय नहीं है” और ट्रायल में देरी का भार एकतरफा आरोपी पर नहीं डाला जा सकता, खासकर तब जब रिकॉर्ड यह भी दिखाता हो कि अभियोजन ने मामलों को आगे बढ़ाने में अपेक्षित तत्परता नहीं दिखाई।
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