पंचमहाभूतों के संतुलन से ही बचेगा पर्यावरण – प्रो .सारंगदेवोत :::युवा पीढ़ी को सीखना होगा भारतीय विद्या और शिक्षा का ज्ञान – डॉ. राजेन्द्र सिंह
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24 न्यूज अपडेट. उदयपुर। पृथ्वी पर जिस तरह से पर्यावरणीय समस्याओं से आज विश्व जूझ रहा है उसका हल परम्परागत भारतीय ज्ञान में रचा बसा है, जरूरत है तो बस आधुनिक शिक्षा को विद्या के साथ जोड़ने की। ये ही वो संजीवनी संयोजन है जो हमारी धरती मां और पर्यावरण को अमृतपान करवा सकता है। इसके लिए आधुनिक शिक्षा के आकर्षण में बंधी युवा पीढ़ी को भारतीय विद्या से जोड़ना होगा, उसकी वैज्ञानिकता और क्षमताओं से परिचित करवाना होगा , तभी वर्तमान पीढ़ी का भविष्य सुखमय बन पाएगा। उक्त विचार मंगलवार को तरूण भारत संघ के स्वर्ण जयंती वर्ष पर जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय, तरूण भारत संघ, कीवा के संयुक्त तत्वावधान में कुलपति सचिवालय के सभागार में तीसरे दो दिवसीय विश्व जल सम्मेलन में प्रसिद्ध पर्यावरणविद् व मैगसेसे पुरस्कार विजेता पानी वाले बाबा डॉ. राजेंद्र सिंह ने बीज वक्ता के रूप में व्यक्त किए। डॉ. सिंह ने जलीय और पर्यावरणीय समस्याओं पर बोलते हुए कहा कि परम्परागत ज्ञान को अपनाने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य यदि सकारात्मक रूप से पूर्ण करवाया जाए तो हम काफी हद तक पर्यावरण और जल से जुड़ी समस्याओं से निजात पा सकते है। जल, पर्यावरणीय और जैव विविधता संबंधी विकट स्थितियों से निपटने को लेकर आजोजित विश्व जल सम्मेलन में अध्यक्षीय उद्बोधन में विद्यापीठ के कुलपति प्रो. एस. एस. सारंगदेवोत ने परम्परागत भारतीय ज्ञान में पंच महाभूतों का ऐसा समावेश है, पर्यावरण संबंधी हर प्रकार की समस्या का सामाधान उसमें समाहित है। पंचमहाभूतों को संतुलित करके प्रकृति में संतुलन बनाया जा सकता है। संतुलन की ये स्थिति भारतीय जीवन शैली है का हिस्सा रही है। जिसे वर्ततान में हम भूला बैठे है। हमें हमारी जड़ों की ओर लौटते हुए परम्परागत ज्ञान आधारित नवाचारों को अपने जीवन में शामिल करना होगा। उन्होंने समस्याओं संबंधी नीतियों के क्रियान्वयन और उनमें आने वाली समस्याओं के समाधानों की बात करते हुए पर्यावरणीय मुद्दों में सामुदायिक सहभागिता और वैश्विक सहयोग की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। संक्षिप्त विवरणःतरूण भारत संघ के स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय, तरूण भारत संघ और कीवा के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय विश्व जल सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस सम्मेलन में 19 देशों के 100 से अधिक पर्यावरणविद् जल, पर्यावरण और जैव विविधता से संबंधित विषयों पर मंथन कर रहे हैं।
सम्मेलन का प्रमुख उद्देश्य
उद्देश्य
विवरण
परंपरागत ज्ञान की भूमिका
भारतीय ज्ञान परंपरा में पर्यावरण संतुलन के समाधान की खोज
पर्यावरण संरक्षण
जल एवं पर्यावरणीय संकट के समाधान हेतु वैश्विक सहयोग
पंचमहाभूत संतुलन
संतुलित प्रकृति ही पर्यावरण बचाने का मूल आधार
युवा पीढ़ी को जागरूकता
भारतीय विद्या और शिक्षा की वैज्ञानिकता को बढ़ावा देना
सम्मेलन के प्रमुख वक्ता एवं उनके विचार
वक्ता
विचार
डॉ. राजेंद्र सिंह (पानी वाले बाबा)
परंपरागत ज्ञान अपनाने से जल और पर्यावरणीय समस्याओं का हल संभव
प्रो. एस. एस. सारंगदेवोत
पंचमहाभूतों का संतुलन पर्यावरण समस्याओं का समाधान प्रदान कर सकता है
प्रो. अनुनय चौबे
युवाओं को विषय की कक्षाओं से बाहर निकालकर समुदाय से जोड़ना आवश्यक
डॉ. गीतांजलि (जर्मन दूतावास)
धरती के संरक्षण के लिए हर व्यक्ति को अपने स्तर पर योगदान देना जरूरी
प्रो. पृथ्वी यादव
सामुदायिक सहयोग से पर्यावरण सुधार संभव
हेलमुट केंजलमेन (मेक्सिको)
विद्यार्थियों को सामुदायिक सहयोग और कौशल से युक्त बनाना आवश्यक
हेरीबेरिटो वेलिसेनियर (अमेरिका)
परंपरागत ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना और संवाद कायम रखना जरूरी
सम्मेलन में भाग लेने वाले देश और क्षेत्र
देश
भारतीय राज्य
अफ्रीका
महाराष्ट्र
अमेरिका
गुजरात
नॉर्थ अमेरिका
उत्तर प्रदेश
एशिया
उत्तराखंड
यूरोप
मध्य प्रदेश
ऑस्ट्रेलिया
लद्दाख
स्वीडन
दिल्ली
कनाडा
तमिलनाडु
मिस्र
कर्नाटक
पुर्तगाल
राजस्थान
लिथुआनिया
अन्य राज्यों के प्रतिनिधि
मुख्य गतिविधियां और कार्यक्रम
समय
गतिविधि
उद्घाटन
प्रमुख वक्ताओं का संबोधन
विचार विमर्श
जल-पर्यावरण और जैव विविधता पर मंथन
पुस्तक विमोचन
“पानी पंचायत” (डॉ. राजेंद्र सिंह)
संवाद सत्र
विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के साथ विचार-विमर्श
अन्य महत्वपूर्ण बिंदु:
सम्मेलन में जल और पर्यावरणीय समस्याओं पर चर्चा के साथ उनके संभावित समाधानों पर जोर दिया गया।
“पानी पंचायत” पुस्तक का विमोचन किया गया, जिसमें तरूण भारत संघ के जल संरक्षण प्रयासों का वर्णन किया गया।
आयोजन में प्रमुख पर्यावरणविदों और गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति रही।
संचालन डॉ. चन्द्रेछ छतलानी और डॉ. हरीश चौबीसा ने किया, जबकि आभार डॉ. युवराज सिंह राठौड़ ने व्यक्त किया।