24 News Update नई दिल्ली। अरावली पर्वतमाला में जारी अवैध खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कड़ा रुख अपनाया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायालय के प्रतिबंध के बावजूद गैरकानूनी खनन की गतिविधियां जारी हैं। यदि इसे तुरंत नहीं रोका गया, तो ऐसे हालात पैदा होंगे जिन्हें भविष्य में सुधारा नहीं जा सकेगा।
CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने संकेत दिया कि अरावली क्षेत्र में खनन पर प्रभावी रोक लगाने के लिए विशेषज्ञों की एक स्वतंत्र एक्सपर्ट कमेटी गठित की जाएगी। कोर्ट ने राजस्थान सरकार से यह आश्वासन भी लिया कि राज्य में अरावली क्षेत्र के भीतर किसी भी प्रकार का खनन नहीं होने दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के अहम बिंदु
पीठ ने कहा कि पहले से जारी अंतरिम आदेश यथावत रहेंगे। CJI ने टिप्पणी की कि कुछ अवैध गतिविधियां अब भी सामने आ रही हैं, जो पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा हैं। कोर्ट ने नई रिट याचिकाएं दाखिल करने पर भी नाराजगी जताते हुए कहा कि न्यायालय को यह भली-भांति पता है कि इस तरह की याचिकाएं किस उद्देश्य से दायर की जा रही हैं।
हस्तक्षेपकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि अरावली की परिभाषा के पीछे ठोस वैज्ञानिक आधार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि पर्वतमालाओं को केवल कानूनी शब्दों में सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इनमें लगातार भूगर्भीय परिवर्तन होते रहते हैं।
इस पर CJI ने कहा कि मामले की गंभीरता को देखते हुए अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों की आवश्यकता है। कोर्ट ने सभी पक्षों से विशेषज्ञों के नाम सुझाने को कहा और स्पष्ट किया कि चरणबद्ध तरीके से एक्सपर्ट्स की एक टीम बनाई जाएगी।
एक अन्य अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि जमीनी स्तर पर किसानों के साथ काम किया गया है और जियो-टैगिंग जैसे तकनीकी साक्ष्य भी उपलब्ध हैं। पीठ ने कहा कि 29 दिसंबर 2025 के आदेश के संदर्भ में एक व्यापक नोट और महत्वपूर्ण प्रश्न कोर्ट के समक्ष रखे जाएंगे, ताकि संतुलित और दूरगामी फैसला लिया जा सके।
राजस्थान सरकार की ओर से पेश हुए के.एम. नटराजन ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि राज्य सरकार तत्काल यह सुनिश्चित करेगी कि प्रदेश में कहीं भी अवैध खनन न हो। इसके साथ ही कपिल सिब्बल की ओर से दायर अंतरिम आवेदन को पीठ ने स्वीकार कर लिया।
100 मीटर वाली पहाड़ियों के आदेश पर भी हुआ था विवाद
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को एक आदेश में 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों पर खनन की अनुमति दी थी, जिससे देशभर में “100 मीटर” की परिभाषा को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। इसके बाद 29 नवंबर को कोर्ट ने अपने ही आदेश पर रोक लगा दी थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने जांच के लिए एक्सपर्ट कमेटी गठित करने के निर्देश दिए थे और केंद्र सरकार के साथ-साथ अरावली से जुड़े चार राज्यों—राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और हरियाणा—को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
कोर्ट: यह मुकदमा नहीं, संरक्षण का मुद्दा है
सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया कि यह कोई प्रतिद्वंद्वी मुकदमा नहीं है, बल्कि अरावली पर्वतमाला के संरक्षण से जुड़ा मामला है। कोर्ट ने कहा कि 29 दिसंबर 2025 के आदेश में जिन बिंदुओं पर स्वतः संज्ञान लिया गया था, उन्हें ध्यान में रखते हुए अरावली की परिभाषा से जुड़े वैज्ञानिक, पर्यावरणीय, भूवैज्ञानिक और कानूनी पहलुओं की पुनः समीक्षा जरूरी है। इसके लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ निकाय की भूमिका अहम हो सकती है।
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