24 News Update उदयपुर। उदयपुर की भाजपा में आज वरिष्ठ नेता धर्मनारायण जोशी ने बड़ा धमका कर दिया। पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया पर ऐसा तीखा हमला बोला है, जिसने सत्ता, संगठन और संवैधानिक मर्यादाओं की पूरी बहस को झकझोर दिया है। जोशी ने अपने विस्फोटक पत्र में कटारिया पर आरोप लगाया है कि वे राज्यपाल पद पर रहते हुए भी उदयपुर में लगातार जनसुनवाई, राजनीतिक बैठकों और संगठनात्मक हस्तक्षेप के जरिए संवैधानिक सीमाओं को लांघ रहे हैं। उन्होंने टिकट कटवाने की साजिश, चुनावी भीतरघात, आर्थिक षड्यंत्र, विधायकों के फंड से समर्थकों की यात्राएं कराने, संगठन में गुटबाजी फैलाने और व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए पद का उपयोग करने जैसे गंभीर आरोपों की पूरी फाइल खोल दी है। जोशी फाइल्स वाला पत्र सिर्फ एक जवाब नहीं, बल्कि दशकों पुरानी राजनीतिक टकराहट का सार्वजनिक विस्फोट बन गया है। ऐसे—ऐसे खुलासे जिसे पढ़कर आप चौंक जाएंगे— स्वयं को निष्कलंक सिद्ध करने की आपकी कला सर्वविदित जोशी ने कटारिया को लिखा कि सादर प्रणाम्। गत दिनों पूर्व पार्षद डाॅ. विजय जी विप्लवी द्वारा आपकी बार-बार उदयपुर यात्राओं, जनसुनवाई तथा प्रशासनिक-राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर महामहिम राष्ट्रपति जी को पत्र प्रेषित किया था। वे अधिवक्ता हैं, उन्होंने अपने पत्र में विधिक प्रावधानों का स्पष्ट उल्लेख भी किया – विशेषतः राज्यपाल पदधारित व्यक्ति की अपने गृहराज्य की यात्राओं की संवैधानिक मर्यादाओं व उदयपुर में आप द्वारा प्रतिमाह की जाने वाली जनसुनवाई के संदर्भ में। यद्यपि डाॅ. विप्लवी मेरे निकट सहयोगी है, तथापि मैंने उनके पत्र समर्थन या विरोध में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। किंतु आश्चर्य तब हुआ जब उनके पत्र पर पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर में आपने तथ्यात्मक स्पष्ट उत्तर देने के स्थान पर मेरे लिये अनर्गल, निराधार एवं भ्रामक वक्तव्य देना अधिक उचित समझा। विप्लवी जी ने अपने पत्र में जो विषय रखे, वो यक्ष प्रश्न बनकर आज भी है और आप निरूत्तर होकर विषयान्तर कर रहे है। जिसके पास मूल मुद्दे का उत्तर न हो, वो इधर-उधर की बातें ही करता हैं। आपकी पत्रकार वार्ता और सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियों क्लिप्स में मेरे संदर्भ में की गई टिप्पणियां सुनकर मुझे कोई विशेष आश्चर्य नहीं हुआ। लगभग पांच दशकों के परिचय ने आपके स्वभाव, वैचारिक धरातल, शिष्टाचारिक कृपणता और राजनीतिक चातुर्य को भलीभांति समझने का अवसर मिला है। भ्रामक तथ्यों को भावनात्मक भाषण के आवरण में प्रस्तुत कर, बीच-बीच में संवेदना व करूणा का अभिनय कर स्वयं को निष्कलंक सिद्ध करने की आपकी कला सर्वविदित है। जीवन के चौथे आश्रम में, एक संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा भ्रामक, निराधार व मनगढंत वक्तव्य देना न केवल व्यक्तिगत द्वेष व पूर्वाग्रह है, वरन् संवैधानिक व सामाजिक मर्यादाओं व परम्पराओं का उपहास भी है। चूंकि आपने मुझे लक्षित कर लांछन लगाने का प्रयास किया, अतः अनिच्छा के बावजूद यह पत्र लिखना आवश्यक हो गया। कृपया निम्न बिन्दुओं पर आत्ममंथन कर उत्तर देने का साहस जुटाये, यद्यपि निराधार बात करने वाले व्यक्ति के लिये विषयवार उत्तर देना असंभव होता है। 2008 में मेरे विरूद्ध कांग्रेस प्रत्याशी को आर्थिक सहयोग दिलायाआपने कहा कि मैं एक चुनाव में मावली से लौट आया। तथ्य है कि मैंने मावली से 2008 एवं 2018 दोनों चुनाव लडे। 2013 में आपने ही हस्ताक्षर अभियान चलवाकर मेरा टिकट कटवाया था। आपकी स्मृति अभी इतनी भी कमजोर नहीें हुई होगी कि क्यों कि हर बार के टिकट रोकने और कटवाने के लिये चुनाव समिति के भीतर और बाहर आपकी क्या-क्या भूमिका रही, आप बेहतर जानते हैं। आप चाहेगें तो उन पर भी चर्चा होगी।आपने मेरे लिये यह भी कहा कि हम उनको टिकट देने को तैयार बैठे थे मानो संगठन में भाग्य-विधाता, कर्ता -धर्ता एकमात्र आप ही हो। मेरे प्रति आपका यह कथित स्नेह कब जागृत हुआ ? यदि सचमुच शुभचिंतक है, तो 2008 में मेरे विरूद्ध कांग्रेस प्रत्याशी को आर्थिक सहयोग दिलाने के आरोपों पर आप आज तक मौन क्यों है? मुझे हराने की भूमिका में थे आपआप 2008 में मुझे हराने की भूमिका में थे, 2013 में टिकट कटवाने में अग्रणी थे और 2018 में अपनी विवशता बावजूद मेरे टिकट पर अनमने मन से प्रदेश चुनाव समिति की बैठक में सहमत हुए, लेकिन बैठक के बाद आपने क्या षडयंत्र रचा, आपको याद होगा। आपकी योजना तो अच्छी थी, लेकिन वसुन्धरा जी ने आपका षडयंत्र चलने नहीें दिया। आपका षडयंत्र उजागर होते ही भाजपा के एक वरिष्ठ राष्ट्रीय पदाधिकारी ने बैठक के भीतर और बाहर आपको दोहरे व्यवहार के लिये आपको दूरभाष पर क्या कहा था, आप शायद जीवन के अंतिम क्षणों में भी नहीं भूलेगें और अब आपको 2023 में मेरे द्वारा मावली सीट छोडने पर दुःख है! निस्संदेह यह संसार में राजनीति का आठवां आश्चर्य है। संगठन के आदेश पर मावली गया, हारा पर मैदान नहीं छोड़ासंगठन ने 2008 में मुझे नए क्षेत्र मावली में भेजा, जहां मेरा परिचय नहीं था। मैने टिकट के लिये आवेदन या बायोडेटा कभी नहीं लिखा। जब मुझे मुख्यमंत्री वसुन्धरा जी और प्रदेश नेतृत्व ने कहा- ‘आपको चुनाव लडने मावली जाना है। तब भी मैनें कहा था- मेरे लिये अपरिचित क्षेत्र है और वहां वरिष्ठ नेता चपलोत साहब विधायक है, वे निर्विवाद नेता है। उनका टिकट काटकर मैं लडूंगा तो जीतने की कोई संभावना नहीं। लेकिन जब मुझे कहा गया कि बैठक में निर्णय तो कर लिया है, आपको चुनाव लडना ही है। तब मैं संगठन के आदेश पर मावली गया। वहां आप और आपके अनुयायियों के तन, मन और धन से भीतरघात के बावजूद मैं मात्र चार हजार मतों से पराजित हुआ, पर मैनें मैदान नहीं छोडा। फिर 2013 में टिकट कटने के बाद भी मैदान में डटा रहा। 2018 में पुनः अवसर मिला और मावली में उदयपुर संभाग में सर्वाधिक मतों से भाजपा को विजय दिलाई। आपने षडयंत्र व बाधायें खडी कीअब आपको पीडा है कि मैंने सीट क्यों छोडी। यह स्पष्ट कर दूं, मैंने हारकर नहीं, जीतकर सीट छोडी। पन्द्रह वर्षो के कार्य करने के बाद, छः माह पूर्व ही मैंने संगठन नेतृत्व को अपना निर्णय अवगत कराते हुए स्थानीय कार्यकर्ता को अवसर देने और मुुझे उदयपुर से अवसर देने का निवेदन किया था। और मैं यह भी स्पष्ट कर दूं, मैं आपकी तरह राजनीति में नहीं आया, जो विधायक पहले बना हो और पार्टी का सदस्य बाद में! मै तो संभाग संगठन मंत्री के दायित्व के साथ पार्टी में आया, 1994 से 2003 तक अपनी क्षमता से दायित्व निर्वाह कर रहा था, परम्परा के अनुसार संगठन मंत्री प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति या लाभ के पदों के विमुख रहते है, इसलिये मैं चुनाव लडूगां कभी सपने में भी नहीं सोचा था। आपने षडयंत्र व बाधायें खडी की, 2003 में आपने कहा- ये संगठन मंत्री रहा तो मैं पार्टी में काम नहीं करूगां, या तो ये रहेगा या मैं। संगठन के वरिष्ठ लोगों ने कहा गुलाब जी वरिष्ठ है, इनकी बात हमें माननी पडेगी। मैंने आपके व्यवहार पर संगठन के वरिष्ठ लोगों के समक्ष आपको कहा था- ये ऐसे निष्ठुर पिता है, जो अपने युवा पुत्र को योग्य देखकर परेशान हो रहे है, मेरी कोई गलती हो तो बताओ, जब वहां भी निरूत्तर थे। आप उस बैठक में दो- तीन बार रोने के बाद भी मेरी दायित्व मुक्ति पर अडे रहे। तब मेरे मन को पीडा हुई और मेरे आत्मसम्मान को भी आघात लगा, बिना अपराध के मुझे दण्डित किया जा रहा है। तब प्रत्यक्षतः चुनावी राजनीति में भाग लेने के निर्णय के साथ संगठन मंत्री के दायित्व से मुक्त हुआ। इसके बाद न तो कभी टिकट के लिये प्रार्थना पत्र या बायोडेटा नहीं दिया और न ही प्रभारी या पर्यवेक्षकों के सामने शक्ति प्रदर्शन या याचना की। आपके न चाहते हुए भी राज्यमंत्री के दर्जे के साथ राजस्थान खेल परिषद् का अध्यक्ष नियुक्त हुआ। संगठन के आदेश पर मावली से दो बार प्रत्याशी रहकर विधायक चुना गया। ये मेरी पूरी यात्रा आप द्वारा मुझे प्रदत्त मेरे सांगठनिक अपमान का आपको समुचित प्रत्युत्तर था। आप की परेशानी यही समाप्त नहीं हुुई, मेरे विधायक कार्यकाल में आप नेता प्रतिपक्ष थे। वहां भी आपका निरन्तर उपेक्षापूर्ण व असहज व्यवहार मै भूल नहीं सकता। सदन में मैं मेरे बोलने का सर्वाधिक तनाव सरकार के मंत्रियों को नहीं आपको अधिक रहता था। यहां तक की मेरे प्रश्न पर पूरक प्रश्न पूछने के लिये भी आप नेता प्रतिपक्ष के रूप में खडे हो जातेे थे। सदन की मर्यादा में मुुझे बैठना पडता। आपने विधानसभा में मेरे कार्य में बाधा व हस्तक्षेप किया, वहीं उदयपुर शहर में शहर व देहात जिला में आपके अनुयायी जिलाध्यक्ष थे, जो बारिश आने पर छाता भी आपसे अनुमति लेकर खोलते थे, अपने हिसाब में संगठन संरचना करते रहे, ताकि मेरा मार्ग बाधित हो। फिर भी मैं प्रयत्नपूर्वक सबसे समन्वय करके चलता रहा। इतना चक्र- कुचक्र करने के बाद मेरे द्वारा सीट छोडने पर आपकी व्यथा स्वाभाविक है, क्योंकि आपने स्वयं पद छोड़ना कभी सीखा ही नहीं। प्रदेशाध्यक्ष बनने के बाद भी प्रदेश महामंत्री बनने का आप जैसा ’’विनम्र कौशल’’ विरले ही देखने को मिलता है। ग्यारह चुनाव लडकर और दीर्घकाल तक सत्तासुख भोगने के उपरांत, असम राजभवन की ओर आपका अनमना प्रस्थान किसी से छिपा नहीं। आप विधानसभा व भाजपा कार्यालय जयपुर से दोनों जगह त्यागपत्र देने के बाद विदाई लेकर राजभवन गये, जयपुर में उन सभी क्षणों का साक्षी मैं हूं। आपकी मनोदशा को मेरे से अधिक कौन जानता हैं। आपके पारिवारिक सदस्यों के उस समय के इंटरव्यू मीडिया में आये थे, सभीने देखे है, उन पर मेरी टिप्पणी आवश्यक भी नहीं। आपने देखा जब परिस्थितियों ने जब करवट ले ही ली है और जब नदी में ‘‘फिसल ही पडे, तो हर-हर गंगे’’ का उद्घोष कर संतोष जताकर राजभवन जाना पडा। आपका एक षडयंत्र जो विफल रहा। राशि जमा क्यों नहीं हुई, इसका हुआ खुलासाआप मेरी छवि को धूमिल करने के प्रयास में बरसों से लगे है। यह बात अलहदा है कि आप इसमें सफल नहीं हो सकें। बात 1998 की है उस चुनाव में मैं संभाग संगठन मंत्री के नाते उदयपुर संभाग की सीटों की व्यवस्था संभाल रहा था। प्रदेशाध्यक्ष रघुवीर सिंह कौशल व केन्द्र की ओर से कोष प्रभारी रामदास जी अग्रवाल ने संभाग में चुनाव के लिए वित्त व्यवस्था मुझे दी थी। मैंने आपकी जानकारी में ही समस्त राशि का क्षेत्रानुसार वितरण किया। चुनाव के बाद मेरे पास एक बडी धनराशि शेष बची, जो लाखों में थी। मैंने आपको कहा बची हुई राशि मैं क्या करू? तो आपने कहा आपके पास रहने दो, मैं बाद में बताता हूं। मैं कुछ दिन बाद फिर पूछा मैं उन रूपयों का क्या करूं, तो आपने कहा अपने यहां भी रोज कार्यक्रम करने पडते है, आपके पास रहने दो। इस चर्चा के बाद मेरे मन को आपकी बात स्वीकार नहीं हुई, तो मैंने जयपुर जाकर रामदास जी अग्रवाल को राशि जमा करवा दीे। कुछ महिनों बाद मेरे पास प्रदेशाध्यक्ष कौशल जी का फोन आया ’’धर्मनारायण जी आपके पास चुनाव फण्ड के कोई रूपये बचे हुए रखे है’’ तो मैंने कहा ’’मेरे पास कोई रूपये नहीं है, आपको किसने कहा – तो उन्होंने कहा गुलाब जी कह रहे थे।’’ तब मुझे याद आया कौशल जी उस राशि की बात कर रहे है, जो मैं रामदास जी को जमा करवा चुका हूं। मैंने कौशल जी को बताया – मैंने रामदास जी को यह राशि जमा करवा दी है। कौशल जी ने रामदास जी से पुष्टि करके मुझे वापस बताया – रामदास जी ने भी कहा आपकी बची हुई राशि जमा हो गई है। तब विचार किया तो ध्यान में आया कि आपने प्रदेश भाजपा की नजर में मुझे वित्तीय अपराधी ठहराने का कुचक्र किया। मुझे तो कहा राशि अपने पास ही रखना और प्रदेश को कहा चुनाव की बची राशि उनके पास पडी है। मैं आपके कहने पर उस राशि को अपने पास रख लेता तो प्रदेशाध्यक्ष कौशल जी व संगठन की नजरों में आर्थिक अपराधी हो जाता। ईश्वर कृपा से आपका कुचक्र विफल हो गया। इसके बाद आपकी खीज स्वाभाविक और बढी। विधायकों के हवाई फंड पर बड़ा खुलासासमर्थकों की वो मुफ्त गौहाटी हवाई यात्रा विधायकों के यात्रा मद सेफरवरी 2023 में आपने असम के राज्यपाल पद की शपथ ली। शपथ ग्रहण में आपके परिजनों, शुभचिन्तकों, समर्थकों की गौहाटी यात्रा का व्यय राजस्थान विधानसभा के चारविधायकों के व्यक्तिगत विधायक यात्रा मद से किया गया। ये चारों विधायक उदयपुर जिले के है और जनजाति वर्ग से आते है। ये चारों अपना अगला विधानसभा टिकट न कट जाये, इस कारण आपकी मिजाजपूर्सी में हवाई यात्रा का व्यय अपने विधानसभा यात्रा मद से देने को तैयार हो गये। आपके परिजन, मित्र, शुभचिन्तक, समर्थक आपके शपथग्रहण में जाये और उसका व्यय जनजाति का भोला-भाला विधायक अपने यात्रा मद से वहन करें, यह कहां तक उचित व नैतिक है? इन विधायको ने निश्चित ही अपने राजनीतिक भविष्य को आपकी छत्र-छाया में सुरक्षित करने के लिए यह राशि समर्पित की। आपके द्वारा पोषित पल्लवित कुछ सम्पन्न लोगों ने भी इन जनजाति के इन विधायकों के यात्रा मद का बेरहमी से उपयोग किया। चारों विधायकों का गौहाटी शपथग्रहण यात्रा व्यय इस प्रकार है –क्र.सं. नाम विधायक विधानसभा क्षेत्र व्यय राशि फुल सिंह मीणा उदयपुर ग्रामीण 1,12,600/- अमृत लाल मीणा सलुम्बर 9,68,402/- बाबू लाल खराडी झाडोल 5,68,846/- प्रताप गमेती गोगुन्दा 3,81,336/-कुल 20,31,184/- राजस्थान सरकार के बीस लाख रूपये आपके शपथग्रहण में आपके परिजनों व समर्थकों की यात्रा में व्यय किये। क्या यह मार्ग पं दीनदयाल जी के आदर्शो के अनुरूप है। क्या यह यात्रा साधन की शुचिता और हमारी संगठन पद्धति का आदर्श है? कहां है आपकी संगठन निष्ठा ?आप जीवन भर संगठन के निष्ठा के खोखले भाषण देते रहे और जहां अपनी मर्जी के खिलाफ निर्णय हुआ। आपने व आपके चेले ने भाजपों की जडों में तेजाब डाला। राजसमन्द में जिला प्रमुख पद के उपचुनाव में आपके चेलों ने क्राॅस वोटिंग की। भाजपा के बहुमत के बावजूद प्रमुख कांग्रेस का बन गया। इस विषय में आपने किसी को कुछ नहीं कहा, न कार्यवाही को कहा। अपने चेलों को प्रोत्साहन करते रहे। आपने राजस्थान सरकार में मंत्री रहते कोटा की केबिनेट बैठक का बहिष्कार किया। जिस बैठक में गृहकर समाप्ति का प्रस्ताव पारित हुआ। बैठक में नहीं गये पर गृहकर समाप्ति पर उदयपुर में अपना अभिनन्दन करवा लिया। सांवलिया जी में हुई भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक का योजनाबद्ध होकर बहिष्कारकिया। यहां तक की बैठक में जाने के लिये डबोक आये, उपप्रधानमंत्री मा. लालकृष्ण आडवानी के स्वागत में आप उदयपुर में होने के बाद भी नहीं गये। इस संबंध में प्रेस द्वारा पूछने पर आपने कहा यही समझ लो, जानबूझकर नहीं गया। भाजपा विधायक रणधीर सिंह जी भीण्डर व मान्धाता सिंह जी देवगढ के विरूद्ध आपने योजनाबद्ध विरोध कराया। आपने वल्लभनगर में भाजपा के मंच से कांग्रेस तक को वोट देना उचित बताया। आपने वहां पंचायत समिति चुनाव में कांग्रेस से खुला गठजोड भी कर लिया। आपकी मौजूदगी में उदयपुर जिला कार्यालय में हुई बैठक में सांसद किरण जी माहेश्वरी को आपके चेलों ने अपमानित किया, अभद्र टिप्पणियां की। आप मूकदर्शक बनकर देखते रहे। शिवकिशोर जी सनाढ्य के यूआईटी चेयरमेन बनने पर आपने उनकी नियुक्ति के विरोध में भाजपा जिला बैठक में प्रस्ताव पारित कर सरकार व संगठन के कार्यक्रमों के बहिष्ष्कार का निर्णय कराया बडीसादडी के विधायक रहते अपने विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के डूंगला प्रधान कनकमल जी दक के कार्यकाल में आप पंचायत समिति की किसी बैठक या कार्यक्रम में आप नहीं गये। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष के रूप में महेश जी शर्मा व ओम जी माथुर के उदयपुर प्रवास के स्वागत में आपके नेतृत्व में काम कर रहे जिलाध्यक्ष व पदाधिकारी के पदाधिकारी स्वागत में नहीं आते थे। आप अपने चेलों की इस वफादारी से गर्वित रहे। 2019 में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदनलाल जी सैनी के साथ, आपके खास कहे जाने वाले कार्यकर्ताओं ने उदयपुर भाजपा कार्यालय में दुव्र्यवहार, धक्का मुक्की करते हुए कार का कांच फोड दिया। कार्यालय की लाईटे बंद कर दी। प्रदेशाध्यक्ष सैनी जी को बैठक नहीं करने दी। आपने यह कृत्य करने वालों को बाहर का रास्ता दिखाने के बजाय न केवल बचाया अपितु बडे पद देकर प्रोत्साहित भी किया। ऋषि पुरूष सुंदरसिंह जी भण्डारी के नाम का उपयोग आप अपनी छवि चमकाने, अपने कृपापात्रों को सम्मान से उपकृत करने के लिये और भाजपा जिला संगठन के समानान्तर कार्यक्रम करने के लिये कर रहे है। आप पटेल सर्कल स्थित भाजपा कार्यालय को भण्डारी ट्रस्ट में लेने का एक असफल प्रयास कर चुके है, लेकिन आप पद मुक्ति के बाद अपने बैठने की जगह के लिये आप बहुत पहले चिंतित है, मैं आपकी इस चिंता से कभी अंजान नहीं था। बलिचा में भाजपा जिला कार्यालय बनने के बाद आपने कुछ समय पूर्व यह प्रयास पुनः किया। मैने भाजपा के शहर जिलाध्यक्ष जी व मा. शहर विधायक जी से भेंट करके अपना विरोध दर्ज कराया और ऐसा होने पर धरना देने के निर्णय से अवगत कराया। मेरा आग्रह आप इन प्रयासों को विराम देकर भंडारी ट्रस्ट के लिये अलग व्यवस्था’’रणछोड’’ तो आप हो1991 में लोकसभा चुनाव की हार के बाद 1993 में वहां के मौजूदा विधायक छगन जी सिसोदिया का टिकट काट कर आप वहां चुनाव लडने चले गये। आप 1998 में वहां से पलायन करना चाहते थे। तत्कालीन राष्ट्रीय महामंत्री व प्रदेश प्रभारी के.एन. गोविन्दाचार्य जी ने व्यवस्था दी, मुख्यमंत्री सहित किसी भी मंत्री की सीट नहीं बदलेगी। आप मजबूरी में वहां से चुनाव लडे और बहुत मुश्किल से 1200 वोट से जीत पाए। आपकी जीत में तत्कालीन जिला कलक्टर व जिला निर्वाचन अधिकारी श्री सीपी व्यास की भूमिका को आप कैसे भूल सकते हैं? जिन्होने बडीसादडी विधानसभा क्षेत्र की चुनाव ड्यूटी में केन्द्र सरकार के विभागों व अर्द्धसरकारी निगमों जैसे हिन्दुस्तान जिंक, चंदेरिया के कर्मचारियों को लगाया। बडीसादडी की चुनाव डयूटी से शिक्षकों व राज्य कर्मचारियों को बाहर रखा गया। तब आप शिक्षा व देवस्थान मंत्री थे। और व्यास साहब देवस्थान आयुक्त थे। चुनाव के पहले आपने शेखावत साहब से कहकर व्यास सा. को चित्तौड कलक्टर पद पर लगाया था। पंडित जी ने आपके साथ देवस्थान विभाग राजस्थान की देशभर में स्थित चल अचल सम्पत्तियोें के निरीक्षण के साथ की गई सपरिवार यात्राओं का कर्ज चुकाते हुए चुनावी समर में आपको रणनीतिक राहत देकर आपकी लाज बचा दी। वरना प्रदेश भर के शिक्षक आपका स्वागत करने को आतुर थे। फिर 2003 में आप मांगीलाल जी जोशी व किरण जी माहेश्वरी को आमने सामने करके आप उदयपुर आ गये। उदयपुर सीट छोडकर आप बडीसादडी क्यों गये और वापस उदयपुर क्यों आये? भाजपा में हार के डर से सीट बदलने की परम्परा मेवाड में आपने प्रारम्भ की। आप उदयपुर सीट पर कांगे्रस से गिरिजा जी के प्रत्याशी होने की संभावना के मध्य 1993 में उदयपुर छोड गये।प्रदेश के कुछ नेताओं को भावुक बातों के झांसे में लेकर आपने मुख्यमंत्री वसुन्धरा जी के खिलाफ गुटबंदी बैठकें की, नागपुर व दिल्ली तक दौरेे किये। गुट में वसुन्धरा जी के खिलाफ विषवमन करते रहे और अंदरखाने केन्द्र व वसुन्धरा जी को विश्वास दिलाया, मैं आपके साथ हूं। दिल्ली के राजस्थान हाउस में जल हाथ में लेकर अपने कसम खाई थी। आपके वरिष्ठ साथी ने वरिष्ठ नेता अरूण जी जेटली के निवास पर ही कुछ घंटों के आपकी कसम में छिपा छल व धोखा अनुभव किया तो मन में आघात लेकर वार्ता अधूरी छोडकर जयपुर आ गये। आपने अपने उस मित्र की जीवन भर की तपस्या तिरोहित करवा दी।जब आघात लगा राज्यपाल की मर्यादा कोसंवैधानिक दायित्व पर जाने के बावजूद आपकी राजनीतिक पिपासा जागृत ही है और यही विवाद का मूल कारण है। आपने विभिन्न अवसरों पर अपने पद की गरिमा को तार-तार कर दिया:- राज्यपाल रहते आप भाजपा के शहर कोर कमेटी, मंडल व पार्षदों-पूर्व पार्षदों की अघोषित बैठक लेते है, जिसके समाचार मीडिया में आते रहे है। आपने विधानसभा चुनाव में तत्कालीन महापौर गोविन्दसिंह जी टांक के निवास पर भाजपा पार्षदों की बैठक ली। बाहर मीडिया के बंधु आ गये थे। बाहर प्रेस के पूछने पर आपने कहा मैं किसी प्रोटोकाॅल को नहीे मानता। भाजपा उदयपुर शहर व देहात में अपनी पसंद के जिला व मंडल अध्यक्ष बनाने के लिए आपने निरन्तर जयपुर फोन किये। आपके न चाहने के बाद भी कोई प्रदेश भाजपा ने किसी कार्यकर्ता को पदाधिकारी बना दिया। आप हाथ में लट्ठ लेकर उन्हें हटाने की कोशिशों को हवा देने, खेमेबंदी करने, योजना करने की प्रमुख धूरी बने हुए है। क्या यह कृत्य राज्यपाल की मर्यादा के अनुकूल है। दिनांक 25 अगस्त 2024 को सिक्किम के महामहिम राज्यपाल ओमप्रकाश जी माथुर का उदयपुर में नागरिक अभिनंदन समारोह था। आपने इस कार्यक्रम को असफल करने के लिये 16 से 27 अगस्त तक उदयपुर में पडाव डाले रखा। इसके लिये आपने अपना पूर्व निर्धारित कार्यक्रम भी बदल दिया। दूसरी ओर मा. माथुर साहब को जब आपके उदयपुर में ही होने की जानकारी मिली तो वे दूसरे दिन त्रिपुर सुन्दरी, बांसवाडा जाने से पहले स्वयं आपके निवास पर आकर मिलकर गये।5. 3 अप्रेल 2026 को उदयपुर आगमन पर आपने अपना स्वागत शक्ति परीक्षण के रूप में करवाया। अपनी संवैधनिक मर्यादा के पालना में हो रहे विचलन के आरोप या सवालों का उत्तर देने का यह रास्ता तय करने वाले आप भारत के पहले राज्यपाल है।बार- बार चरित्र व लोकप्रियता का दावा संदेह उत्पन्न करता है ?अपने पत्रकार वार्ता में कहा मेरे पर कोई दाग नहीं है। पंजाब में किसी को फोन करके पूछो राज्यपाल कौन है? वो मेरा नाम बता देगें। यह सत्य है तो बार -बार कहना क्यों पड रहा है। आपके यह तथ्य निर्विवाद है कि आप जमीन से जुडे हुए है। आप समर्थकों पर किन किन विषयों में प्रश्न चिन्ह खडे हुए, सभी का वर्णन करूगां तो पत्र दीर्घ व विषयान्तर हो जायेगा। आपके कुछ समर्थकों की कम समय में आर्थिक सम्पन्नता शोध का विषय है। उदयपुर में 272 भूखण्डों के घोटाले पर विधानसभा में सबसे पहले मैं बोला, तो आप परेशान थे। आप जानते थे, यह कृत्य किसका है, पर जब मैं बोल गया, तो लाज बचाने आप क्या करते? नियम 131 में एक ध्यानाकर्षण लगा दिया, उस पर कभी बहस या वक्तव्य की मांग नहीं की। आपके पास नेता प्रतिपक्ष के नाते विषय को उठाने के लिये नियमों में सामान्य विधायक से अधिक अवसर थे, पर सदन में आप इस विषय पर मौन साधे रहै। आपका यह मौन अपराध व घोटाले को अघोषित समर्थन ही था। आपकी जानकारी में था कि 272 प्लाॅट के मामले में आपके छाया की तरह साथ रहने वाले सज्जन के परिजन शामिल है (जो अब जेल भी जा चुके है)। इस घोटाले के सम्बन्ध में आपने सदन में या सदन के बाहर क्या किया, जगजाहिर है।आपके भूमि प्रेम, स्टाम्प ड्यूटी में की वंचना, कोरोना लाॅकडाउन में सरकारी लवाजमा लेकर झाडोल जमीन खरीदने व रजिस्ट्री कराने जाना आपके नैतिक चरित्र की कहानी समाचार पत्रों से लेकर नेशनल मीडिया में साया हुई है। आप चरित्र की बात करते है या भाषण देते है, तो हंसी आती है। बडी का वन भूमि मामला आपको याद होगा ही अब किस दामन के पाक साफ होने की बात कर रहे है।जीवन के संध्याकाल में आपने सरकारी विधायक कोटे से जयपुर में हाउसिंग बोर्ड का एक मकान और ले लिया, जब की जयपुर में हाउसिंग बोर्ड के दो व उदयपुर में एक मकान आपके पास पहले ही है। राजस्थान में हाउसिंग बोर्ड के चार मकान ‘आउट आॅफ टर्न‘ लेने वाले एकमात्र नेता का गौरव आपश्री को ही है। धन्य है आप और धन्य है आपकी नैतिकता व चरित्र के भाषण!स्वयंसेवक होने का स्वांगआपने राजनीति में अपनी सुख-सुविधा के लिये सदैव स्वयंसेवक होने का स्वांग किया। संचलन में घोष बजा लेना, संघ के दो-तीन गीत गा लेना और भाषण में संघ की दुहाई देना, आपके चिरपरिचित चोचले है, जिनको आपने राजनीति में पायदान बनाया। स्वयंसेवकत्व भाषण व प्रचार का विषय नहीं, जीवन जीने के आदर्श का प्रतीक है। संघ ने आदर्श का भाषण नहीं, उसका जीवन में अनुपालन सिखाया है। निम्न विषय है, जिसमें आपने विचार परिवार का निर्देश नहीं माना:- सांगानेर में हज हाउस शिलान्यास में परिवार ने जाने को मना किया था। श्रीमान् घनश्याम जी तिवाडी विभागीय मंत्री व क्षैत्रीय विधायक होने के बाद भी नहीं गये, आप शिलान्यास में शामिल हो गये। भण्डारी ट्रस्ट के गठन के पूर्व परिवार कार्यालय ने एक व्यक्ति को ट्रस्ट में न रखने को कहा, आपने ट्रस्ट पंजीयन आवेदन लम्बित रखा। फिर उक्त निर्देश देने वालों का केन्द्र उदयपुर से बदलने के बाद पंजीयन कराया। जिनके लिये मना किया, वो ट्रस्ट में कर्ताधर्ता है। नगर परिषद् चुनाव 2004 में विचार परिवार ने सभापति पद के लिये वीरेन्द्र बापना को बनाने को कहा, आपने रविन्द्र जी को बना दिया। ज्वलंत प्रष्नआपसे जुडे वर्तमान विवाद में यह प्रश्न चीखकर आपसे उत्तर मांग रहे हैः- क्या आपने राज्यपाल पद धारित करने के बाद अपने राजस्थान और उदयपुर दौरों के क्रम में राज्यपाल (भत्ते और विशेषाधिकार) संशोधन नियम, 2015 की पालना कर रहे है, यदि हां तो अब तक राज्यपाल के रूप में आपके राजस्थान और अन्य प्रदेशों के सभी दौरों की तिथिवार जानकारी सार्वजनिक कर दीजिये। आप सही सिद्ध हुए तो आपके सम्बन्ध में शिकायती पत्र लिखने वाले पूर्व पार्षद स्वयं गलत सिद्ध हो जायेगे। क्या राजस्थान में राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद्, विधायकों का अकाल है? यदि नहीं तो आपको प्रतिमाह उदयपुर आकर जनसुनवाई क्यों करनी पडती है? क्या आपको राजस्थान के प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों को फोन पर व मौखिक निर्देश देने का नैतिक व विधिक अधिकार है। कहीं आप राजस्थान की सरकार, स्थानीय जनप्रतिनिधियों व प्रशासन को नाकारा व अकर्मण्य बताने की परोक्ष कोशिश तो नहीं कर रहे है? उदयपुर में टीन शेड की मरम्मत के भी लोकार्पण पर राज्यपाल के नाते अपना शिलालेख लगाने की क्षुधा का भविष्य में संवरण करने के लिये क्या आपने कोई संकल्प या निर्णय लिया है? वाणी के असंयम से आप अनेक बार विवादों में आये। प्रातःस्मरणीय महाराणा प्रताप के बारे में वाणी की असाधना व असंयम के कारण आपको राज्यपाल के आसन से विडियो जारी करके क्षमायाचना करनी पडी। गरिमामय संवैधानिक पद की मर्यादा को अक्षुण्ण रखने की शपथ आपने ले रखी है, उसकी पालना के लिये आपका क्या संकल्प है? Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation यश गमेती ने थांग-था में उदयपुर ने पहली बार जीता स्वर्ण 2 साल से फरार स्थायी वारंटी चढ़ा पुलिस के हत्थे, झाड़ोल पुलिस की बड़ी कार्रवाई