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पर्युषण महापर्व तीसरे दिन वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनन्दी महाराज ने दिया हितोउपदेश

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24 News Update सागवाड़ा (जयदीप जोशी)। नगर के निकट्वर्ती भीलूडा में पर्युषण महापर्व के तीसरे दिन शनिवार को स्वाध्याय तपस्वी वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनन्दी महाराज ने शिवगौरी आश्रम भीलूडा से सर्वजन को हितोंउपदेश दिया की पापो को त्यागना और स्वयं को पवित्र करना ही इस पर्व का मुख्य उद्देश्य है।
आचार्य ने बताया कि जिस तरह प्रेशरकुकर में रखी वस्तु नीचे से गर्माहट देने पर जल्दी गर्म हो जाती है क्योंकि ऊपर ढक्कन बन्द रहता है इसलिए कुकर की अंदर की जमा ऊष्मा वस्तु को जल्दी गर्म कर देती है । ठीक उसी तरह क्रोध ईर्ष्या,निंदा,मायाचारी,लोभ,झूठ और द्वेष जब हमारे मन को घेरती है। और अज्ञान व अहंकार रूपी ढक्कन से बन्द करके उसे अन्दर ही अंदर जमा रखते तो मस्तिष्क और शरीर में ऐसे वितत्वो का संचार होता है जिससे प्राणी अनेक रोगों से ग्रस्त तो होता ही हे अपितु आत्मा भी कलुषित हो जाती है। लेकिन जैसे ही कुकर का ढक्कन खोलते हे तो अंदर की ऊष्मा वाष्प बन कर उड जाती है और वस्तु को पुनः शीतल करता है ठीक उसी तरह अज्ञानता का ढक्कन हटाकर अपने विकारों,दोषों और पापो को सदगुरु के सामने स्वीकार कर प्रायश्चित कर लेते है और उन विकारों और दोषो का त्याग करते हे तो हमारा मन- मतिष्क स्वस्थ होकर आत्मशुद्धि होती है। आचार्य ने असत्य,मायाचारी को एक कथा के माध्यम से समझाया कि एक बार एक साधु चौराहे पर ध्यान अवस्था में बैठे हुए थे देखते है कि एक गाय तेज दौडती हुई भागी चली गई थोडी ही देर में उसके पीछे एक व्यक्ति तलवार लेकर उधर आता है उस साधु को पूछा की आपने यहा किसी गाय को जाते हुए देखा तो वो महात्मा साधु तुरन्त समझ गए और सोचने लगे की यदि इसको बता दिया की वो गाय उस तरफ गयी है तो उसे पकड कर ये उसे मार डालेगा और यदि इसे नही देखा ऐसा बोला तो असत्य वचन होगा किन्तु शास्त्रों के सिधान्तो को समझने वाले उस महात्मा ने कहा कि भाई में कब से यहा बैठा हूँ पर कोई भी पशु यहा से नही गया तो वह तलवार धारी व्यक्ति भी साधु की बात को मानकर वहा से चला गया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर आचार्य श्री ने कहा कि आजादी के इस वट वृक्ष की मुख्य जडे तो महाराणा प्रताप,शिवाजी,भगत सिंह,खुदीराम बोस,सुभाष चन्द्र बोस और लाल-बाल-पाल जैसे महान लोगों ने सींची है। जिससे आजादी का वट वृक्ष पल्लवित हुआ।जबकी महात्मा गांधी,वल्लभ भाई ,नेहरू ये तो उस पल्लवित वृक्ष के फूल है जिनका अंतिम चरणों में श्रेष्ठ योगदान रहा।

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