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जोशी—जोशी विवाद में फिर हुई जोशीली मन की बात, धर्मनारायणजी की चिट्ठी में इस बार कितने तंज और कितने राज!!

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24 News Update उदयपुर। हर बार लगता है कि विवाद का अंत हो गया है मगर हर बार यह साबित हो जाता है कि अभी तो विवाद केवल सुलगा है, आग बहुत सी बाकी है,लपटें बहुत उपर तक जानी है और कइयों को झुलसानी है। जो आग लगा रहे हैं वे खुद भी झुलस रहे हैं और मजे की बात है कि जो आज आग का मजा ले रहे हैं कल उनकी बारी नहीं आएगी इसकी कोई गारंटी नहीं है। राजनीति की इस आग में किसी रोटियां पक रही है, किसकी चल रही है, किसकी चल रही है और किसकी बळ रही है, यह देखना दिलचस्प होता जा रहा है। जनता को खांटी नेता शब्दों की ऐसी खुराक दे रहे हैं कि उसकी भूख बढ़ती ही जा रही है। नए राज जो अब तक वक्त के सीने में दफन थे, अचानक बेपर्दा हो रहे हैं। शायद यह गर्म मौसम का भी असर है जिसमें कई सारे पक्ष एक साथ गरमी खा रहे हैं—जनता इसमें कुल्फी मलाई और लच्छा गोटा का स्वाद ढूंढ रही है। विवाद कहां राजनीति से शुरू हुआ था, कहां धर्म पर चला गया। शब्दों के तीर ऐसे चुभे कि घाव भरे नहीं भर रहे। अबकी बार धर्मनारायणजी जोशी की ओर से ब्रहमास्त्र छोड़ा गया है। देखना है इसका उत्तर कब आता है।
आप पढ़िये इसका मूल पाठ

📜 खुला पत्र

श्रीमान् मांगीलाल जी,
सादर अभिवादन।

विगत 52 वर्षों से अपना परिचय है। मैने आपको बहुत निकट से देखा व जाना। वैसे आप वर्षो से मेरे विरूद्ध प्रत्यक्ष या परोक्ष द्वेषभाव व्यक्त करते रहे हैं, इसका मुझे कोई आश्चर्य भी नहीं, क्यों कि मै आपके वैचारिक स्तर को मैं भली प्रकार जानता हूं। तुरन्त लाभ पाने के लिये तात्कालिक रूप से कुछ भी बयान दे देना, आपकी पुरानी आदत है। लेकिन इस बार आपने राजनीतिक द्वेष व प्रतिस्पर्धा में सामाजिक संगठन को भी विवाद मे लाने का कुप्रयास किया है।

विगत दिनों आप द्वारा विप्र फाउण्डेशन व सर्व ब्रह्म समाज द्वारा आयोजित परशुराम जयन्ती के पंचदिवसीय आयोजन के मध्य निरन्तर मीडिया साक्षात्कार देकर निराधार, तथ्यहीन व भ्रामक बयानबाजी की। इसका मेरे व समाजजनों में रोष हैं, मुझे अनेक समाजजनों ने आपके सम्बन्ध में स्थिति स्पष्ट करने व समाजजनों के रोष से आपको अवगत कराने को कहा है।

आप द्वारा विभिन्न चैनलों पर साक्षात्कारों के बाद चैनल के प्रतिनिधियों ने मुझसे भी सम्पर्क कर साक्षात्कार देने का कहा, लेकिन मैंने एक भी इन्टरव्यू नहीं दिया। किसी का प्रतिवाद करने के लिये उसके स्तर पर आकर बहस करनी पडती है, आपने साक्षात्कारों में जिस स्तरहीन भाषा व मिथ्या तथ्यों का उपयोग किया है, सभ्यता से उसका उत्तर संभव नहीं।

हालांकि आपसे पत्र लिखकर बात करना भी स्वयं का स्तर कम करना ही हैं। फिर भी मैं समाजजनों व शुभचिंतकों के बार-बार आग्रह पर समाज में आप द्वारा फैलाये भ्रामक प्रचार पर समाज में स्थिति स्पष्ट करने के लिये पत्र लिख रहा हूं।

📌 संगठन से जुड़े तथ्य

यह सर्वविदित है कि माननीय भानुकुमार जी शास्त्री, देवीशंकर जी चौबीसा, नारायणलाल जी शर्मा, देव जी श्रीमाली, किशनलाल जी शर्मा, ख्याली लाल जी पालीवाल, जगत जी नागदा व लोकेश जी द्विवेदी आदि समाजजनों ने उदयपुर में ब्राह्मण एकता परिषद् की स्थापना की। आपने साक्षात्कार में कहा कि यह संगठन आपकी पहल पर बना, स्थापना करने वालों में आप थे। अब आपको बाहर निकाल दिया गया है, आपका बयान निराधार होने के साथ हास्यास्पद भी हैं। किसी भी संगठन के संस्थापक सदस्य वे होते है, जो पंजीयन के समय दाखिल किये जाने वाले संघ विधान पत्र पर हस्ताक्षर करते हैं, संगठन के सभी बैठकों व प्रपत्रों में कहीं भी आपका नाम नहीं हैं। आप चाहेगें तो ब्राह्मण एकता परिषद् की मूल सूची व कार्यवाही विवरण रजिस्टर जो श्री देवीशंकर जी चौबीसा मुझे देकर गये है, मैं आपको दिखा सकता हूं। हां, एक दो बार आप और दिनेश जी भट्ट ब्राह्मण एकता परिषद् के स्नेह सम्मेलन मे भोजन करने गये थे। तब यह सूचना सार्वजनिक हो जाने पर एक वरिष्ठ नेता (जो हम सभी के मार्गदर्शक रहे है) ने जब इस पर नाराजगी व्यक्त की, उसके बाद आप बरसांे तक वापस कार्यक्रमों में नहीं आये। आपने कहा ब्राह्मण एकता परिषद् के भूखण्ड में आपकी भूमिका है। संगठन के संस्थापकों में से नारायणलाल जी शर्मा व किशनलाल जी शर्मा स्वयं यूआईटी में न्यासी थे। न्यास के अध्यक्ष लिखारी साहब स्वयं मा. भानु जी को अपना मार्गदर्शक मानते थे। आप उस समय संयोग से भाजपा के जिलाध्यक्ष व यूआईटी में न्यासी थे। इतना अवश्य है कि आपने अपने स्वभाव के अनुरूप इस प्रस्ताव का विरोध नहीं किया, ये भूखण्ड आवंटन में आपका योगदान हैं। मैने उस समय भूखण्ड के लिये व्यक्तिगत रूप से एक हजार रूपये का योगदान दिया, आपका कोई योगदान रहा हो तो बताये।

वर्ष 2003 में देवीशंकर जी चौबीसा ने भगवान परशुराम जन्मोत्सव के आयोजन में मुझे जुडकर सहयोग करने को कहा, मैने सक्रीय भूमिका का निर्वाह किया। उस वर्ष आप आयोजन में कहीं नहीं थे। तब उदयपुर में ब्राह्मण समाज की 56 उपजातियों को पहली बार एक जाजम पर लाकर यह आयोजन किया। वर्ष 2004 की अक्षय तृतीया पर मेरी पुत्री का विवाह था, मैने चौबीसा साहब से विन्रमतापूर्वक क्षमा मांगी, इस वर्ष में सक्रीय योगदान नहीं कर सकूगां। वर्ष 2005 से 2009 तक भगवान परशुराम सर्व ब्रह्म समाज समिति व 2010 से वर्तमान तक यह आयोजन विप्र फाउण्डेशन व भगवान परशुराम सर्व ब्रह्म समाज समिति के बेनर पर आयोजित हो रहे है। 2005 से निरन्तर प्रतिवर्ष आपका नाम आमंत्रण पत्र में मार्गदर्शक मंडल में प्रकाशित हो रहा है। आपका नाम इस वर्ष भी उसी स्थान पर प्रकाशित हुआ है, फिर भी आपने समाज में भ्रम फैलाने, मेरी छवि को आघात पहुुचाने व झूठी सहानुभूति बटोरने के लिये बयान दिया-‘‘जब तक के.के. शर्मा संगठन का काम देखते थे, मै जुडा हुआ था, लेकिन जब से धर्मनारायण जी ने काम संभाला है, मुझे बाहर कर दिया है।‘‘ पूरा समाज जानता है के.के. शर्मा जी ने और मैने एक साथ यह कार्य हाथ में लिया और आज भी हम साथ ही काम कर रहे है, हम दोनों में से न किसी से अभी- अभी काम संभाला है और न छोडा है।

⚠️ आरोप और प्रतिक्रिया

आपने केवल मुझे टारगेट करने के लिये समाज के गरिमामय व पावन आयोजन को राजनीति की खींचतान में घसीटने कृत्य किया है, जो दुर्भाग्यपूर्ण व निंदाजनक है। संगठन परिवार में कतिपय व्यक्तिगत कारणों से अलग आप जैसे ही कुछ महत्वाकांक्षी लोग जो समाज समाज में भी प्रभावहीन है, आपने उनके साथ अलग मंच पर जुडकर अनर्गल बयानबाजी की। समाज जागरण का प्रयास किसी भी स्थान व मंच से हो,वो स्वागत योग्य है, लेकिन उस मंच उपयोग आप राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के लिये करें,यह दुर्भाग्यपूर्ण है। आप समाज तोडने का प्रयास मीडिया पर करके एकता का उपदेश करते रहे। आप अपने मन से आना बंद कर दो और फिर कहो, मुझे निकाल दिया, क्या ये उचित है? वैसे भी आपने विप्र फाउण्डेशन के आयोजनों में अपनी सुविधा से भाग लिया। आये, मंच पर बैठे, भोजन प्रसाद ग्रहण किया और चल दिये। प्रतिवर्ष इतना बडा आयोजन होता है, लाखों रूपये खर्च होते हैं। आपने कभी कार्यक्रम व्यवस्था के लिये एक सौ रूपये कभी व्यक्तिगत योगदान दिया या किसी से दिलवाया होतो अवश्य बतायें। आप स्वयं नागदा ब्राह्मण समाज 16 खेडा के अध्यक्ष रहे है, आपके कार्यकाल की कोई विशेष उपलब्धि रही हो, तो अवगत करावें।


विप्र फाउण्डेशन ब्राह्मण समाज का सबसे बडा वैश्विक संगठन है। संगठन के चार ऐतिहासिक विप्र महाकुम्भ कोलकाता, गौहाटी, जयपुर व सूरत मे आयोजित हुए, 2013 में उदयपुर के बीएन कॉलेज में 25 हजार विप्रों का विप्र जयघोष आयोजन हुआ, दो वर्ष पूर्व सागवाडा में 40 हजार विप्रो का कुंभ हुआ। इन सभी आयोजनों में आपकी क्या भूमिका रही? समाज को अवगत करावें। मेरा सौभाग्य है कि सात प्रकार के पालीवाल ब्राह्मण (जिसमें आपकी उपजाति भी शामिल है) का सम्मेलन गत वर्ष कांकरोली में आयोजित हुआ। सम्मेलन में 15 हजार समाजजनों की उपस्थिति में मैंने समाजजनों को मंच से आर्थिक योगदान की अपील की। समाजजनों ने मौके पर ही समाज भवन व छात्रावास निर्माण के लिये 55 लाख रूपये का संग्रह की घोषणा की, इसमें आप इस सम्मेलन में पधारे थे या नहीं? समाज के युवाओं को केरियर मार्गदर्शन के लिये जयपुर में करोडों रूपये की लागत से विप्र एक्सीलेंस सेंटर बना है, वही 250 के अधिक छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति प्रदान की गयी है। क्या आपने इसमें कुछ योगदान दिया है? केवल विप्र फाउण्डेशन में अपनी सुविधा के समयानुसार आकर मंच पर बैठना और भोजन करके चले जाने इसके अतिरिक्त आपका कोई योगदान होतो अवश्य बताये। मुझे कहना नहीे चाहिये फिर भी आपको वैचारिक स्तर पर आकर निवेदन करना पड रहा हैं, विप्र बालकों की छात्रवृत्ति योजना के लिये एक लाख रूपये योगदान स्वयं दिया है और अनेक समाजबंधुओं से योगदान कराया है। अरूणाचल प्रदेश में आदितीर्थ परशुराम कंुड पर भगवान परशुराम की भव्य मूर्ति स्थापना प्रकल्प व अन्य संगठनात्मक कार्यों के लिये मैं स्वयं या संगठन के कोई भी पदाधिकारी कहीं भी प्रवास पर जाते है, उसका समस्त व्यय स्वयं वहन करते है। ये विप्र फाउण्डेशन की परम्परा हैं। केवल अपना हित देखकर समाज के मंच का उपयोग करना, केवल सम्मान लेनेे जाना और जब मन हो स्वार्थवश कतिपय रूष्ठ बंधुओं के साथ खडे होकर समाज के विधटन की बयानबाजी करना, क्या समाज में आपका ये योगदान है?

आपका कृत्य उन समाजजनों की तपस्या पर आघात है, जिन्होनें प्राण-प्रण से इस पौधे को सींचा है। आप प्रायः भाजपा में अपने पराभव को ब्रह्म हत्या की संज्ञा देते है। जो समाज की प्रतिष्ठा को भी कम करता हैं। समाज के उत्थान में हमारा उत्थान हैं। उन्नत समाज- समर्थ राष्ट्र हमारा ध्येय है। आप अपनी वाणी से विप्र के दीन हीन होने का आभास करा रहे है। हम अपनी विचारधारा के किसी भी दल में काम करें, लेकिन दल में जातिगत विषवमन क्यों करें। आप स्वयं विप्र समाज में योगदान नहीं देते है, लेकिन अपने दल में आप विप्र होने के आधार पर पद व महत्व चाहते हैं। यही आपकी समस्या व कुंठा का मूलकारण हैं। प्रारम्भ में एक बडे नेता ने मा. भानुकुमार जी व डॉ. विजय जी श्रीमाली के सामने ब्राह्मण चेहरे के रूप में उपयोग किया। आप राजनीति में भी बार-बार ब्राह्मण होने की हुंकार भरते है, लेकिन भानुकुमार जी शास्त्री, किशनलाल जी शर्मा, नारायणलाल जी शर्मा, शिवकिशोर जी सनाढ्य, दिनेश जी भट्ट, पन्नालाल जी शर्मा से लेकर मेरे स्वयं तक सभी समाजजनों की अपने दल में समय-समय पर विरोध किया है। फिर भी समाजजनों ने सदैव आपकी प्रति सम्मान रखा।

मैंने सदैव प्रयास किया समाज के मंच का उपयोग राजनीति के लिये न हो। समाज में सभी विचारधारा के बंधुओं को साथ जोडकर कार्य किया। अगस्त 2018 में मुझे विप्र फाउण्डेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष का दायित्व मिला। नवम्बर 2018 में मावली विधानसभा से टिकट की घोषणा होते ही दूसरे दिन ही मैने अपने पद से त्यागपत्र दिया। इसी परम्परा का निर्वाह मेरे साथ व मेरे बाद वाले सभी पदाधिकारियों ने भी किया। लेकिन आपने अपने राजनीतिक द्वेष भाव को समाज के संगठन में जोड दिया, इसलिये इस पत्र में राजनीति में पदपिपासा की पूर्ति के लिये आपकी मौकापरस्त व विश्वासघाती भूमिका की चर्चा भी न चाहते हुए भी करनी पड रही है।

आपने भाजपा जिलाध्यक्ष रहते हुए जब प्रथम बार यूआईटी अध्यक्ष बनने का प्रयास किया, सफल नहीं हो सके तो ट्रस्टी बनना स्वीकार कर लिया। आपने यह नहीं कहा मैं तो जिलाध्यक्ष हूं, ट्रस्टी किसी अन्य कार्यकर्ता को बना दो। भाजपा जिलाध्यक्ष रहते हुए भी आप भाजपा शासन के यूआईटी ट्रस्ट में आप नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाते रहे। 1995 में यूआईटी में मनोनयन होना था, आपने कहा तुरन्त जयपुर चलकर बात नहीेें की तो देर हो जायेगी। दूसरे दिन प्रातः विधायक शिवकिशोर जी सनाढ्य, किरण जी माहेश्वरी, दलपत जी सुराणा व मै स्वयं आपके साथ दलपत जी की मारूति कार में जयपुर गये, मुख्यमंत्री शेखावत साहब दक्षिण भारत प्रवास पर जाने वाले थे। दलपत जी ने नॉन-स्टॉप कार चलाकर सीधा जयपुर हवाई अड्डे ले गये, जहां हम सब मा. शेखावत साहब से मिले और आपकी पैरवी की। आपने समय-समय पर शिवकिशोर जी सनाढ्य, किरण जी माहेश्वरी, दलपत जी सुराणा व मेरे साथ क्या व्यवहार किया?

सभी जानते है, लिखने की आवश्यकता नहीं, विस्तार हो जायेगा, फिर भी आप चाहेगे, तो मैं व्यक्तिवार इन सबके साथ आपके व्यवहार पर भी प्रकाश डालूगां। आपने इन सभी का अपमान तो किया ही, पर पुनः स्वार्थवश मदद भी मांगी।
भाई दलपत जी सुराणा तो उनके राजनीतिक जीवन की बलि चढाने में आपकी प्रेरणा व योगदान को गिनाते हुए स्वर्ग सिधार गये।

🧾 राजनीतिक प्रसंग


1998 का विधानसभा टिकट आपको किन प्रयासों से मिला, डॉ. आलोक जी चतुर्वेदी, पारस जी सिंघवी व विजय जी विप्लवी गवाह है। टिकट सूची आने के पूर्व रात्रि को आप सेक्टर 13 मेरे घर पधारे थे। फिर अपने कार्यकर्ता का एसटीडी बूथ खुलवाकर भाजपा के केन्द्रीय महासचिव व राजस्थान प्रभारी के. एन. गोविन्दाचार्य जी व विचार परिवार के केन्द्रीय व प्रदेश पदाधिकारियों के समक्ष आपकी पैरवी की। अलसुबह पारस जी और मैं जयपुर गये और पार्टी का सिम्बल आपको लाकर दिया। चुनाव में प्रारम्भ में निश्चिंत थे, प्रतिद्वंदी प्रत्याशी को हल्का मानते रहे। प्रचार अभियान में आपकी कुछ गलतियों से विचार परिवार में नाराजगी थी। आपने मुझे पता चला चुनाव में आपकी स्थिति ठीक नहीं है। तब मैंने अपना प्रवास बदलकर दूसरे दिन भाजपा के वरिष्ठ श्री मनमोहनराज जी सिंघवी के निवास पर एक बडी बैठक करवाकर 200 मौतबीर लोगों से आपका संवाद करवाकर स्थिति संभालने का हरसंभव प्रयास किया। तब तक आपके अतिआत्मविश्वास, नामांकन जुलूस में शिवकिशोर जी से हुआ दुर्व्यवहार, चादर चढाना, विवादित व्यक्ति से चंदे की थैली भेंट लेने के कारण माहौल बिगड चुका था। आपने तो चुनाव में यहां तक कहा था- जीत तो जायेगें, लेकिन त्रिलोक जी के सामने चुनाव लडने में मजा नहीं आ रहा। अंततः आप चुनाव हार गये। आपने कहा कार्यकर्ता व रूपया बडीसादडी भेजने से मैं यहां चुनाव हार गया। मुझे शिवकिशोर जी सनाढ्य, किरण जी माहेश्वरी व प्रमोद जी सामर ने चुनाव हराया है। आपने कुछ दिन बाद हुए महिला बैंक के चुनाव में किरण जी माहेश्वरी को हराकर अपने प्रतिशोध का प्रथम चरण पूरा किया। तब से उदयपुर की भाजपा में बिखराव आया, जो आज बहुत प्रयासों के बाद भी थम नहीं रहा।

2003 में हमने उदयपुर विधानसभा के लिये आपकी पैरवी की, जिलाध्यक्ष श्री मदनलाल जी मूंदडा, पूरी जिले की टीम व आम कार्यकर्ता आपके पक्ष में आंदोलित थे। 1998 का चुनाव बडीसादडी में श्री गुलाब जी कटारिया बहुत मुश्किल से मात्र 1476वोट से जीते, वे सुरक्षित सीट की तलाश में टिकट लेकर उदयपुर आ गये। हम सभी टिकट के निर्णय पर पुर्नविचार करके आपको टिकट देने की मांग पर डटे थे। पता नहीं किन शर्तों या प्रलोभन में आकर कटारिया साहब के पक्ष में पत्रकार सम्मेलन को सम्बोधित किया, आपने पत्रकार सम्मेलन में यहां तक कहा गुलाबजी मुझे घासा से लाये और नेकर पहनना भी गुलाबजी ने सिखाया। चुनाव के बाद जिला व मंडलों को भंग करके आपकी पैरवी करने वाली पूरी जिला व मंडलों की टीम की राजनीतिक निर्वासन में भेजा गया। हमेशा आपका व्यवहार उस ’’फौजमार सेनापति‘‘ जैसा था, जो अपनी पूरी फौज की शहीदी करवाकर कर भी अपराधबोध में नही था। आपका यह व्यवहार हर बार रहा, आपने विधायक, यूआईटी अध्यक्ष, ट्रस्टी व पार्षद पद के लिये समझौता या सौदा किया। यह अवश्य हुआ, आपको सौदागरों ने मूल्य चुकाया नही, लेकिन हर बार आप उनके झांसे में आते रहे। और अभी हाल में भी आपने स्वयं मीडिया में आकर फिर ढाल बनने का एकतरफा प्यार जता दिया।

ईश्वर करे आपको आपके पूर्व संविदा सौदों का भी भुगतान हो। एक ठगाया व्यक्ति घायल होता है और घायल की गति घायल ही जानता है, इसलिये आपके मीडिया में इतना उलूल झलूल बोलने पर भी मुझे क्रोध नहीं आया, वरन् संगठन व समाज में आपके बयानों का उपहास देखकर आप पर करूणा व दया आई। काश, आपको तय हुई शर्तो के अनुसार कम से कम पार्षद का पद भी मिल जाता तो उस विजय के साथ आपका राजनीतिक कंुवारापन समाप्त हो जाता, अर्थात् आप जनप्रतिनिधि हो जाते। पर अफसोस ये हुआ नही, पर आप धैर्यवान है, फिर ढाल बनने की घोषणा के साथ भरोसा जताया है, ईश्वर आपकी अग्रिम यात्रा मंगलमय रखे।

1998 के आपके टिकट मे मेरी भूमिका व यूआईटी के लिये जयपुर चलकर पैरवी के लिये धन्यवाद के दो शब्द आपके पास नहीें थे, लेकिन 2008 में मुझे मावली विधानसभा का टिकट मिलते ही आपने विद्रोह का बिगुल बजाते हुए निर्दलीय नामांकन भरा, माहौल बिगाडा, बयानबाजी करके अंतिम समय पर फॉर्म वापस ले लिया, लेकिन प्रचार में नहीं आये, हराने में जुटे रहे। 2009 से 2013 तक आप भाजपा देहात जिला के प्रभारी रहे, मुझे कभी जिला बैठक में नहीं बुलाया, आप जिला प्रभारी के नाम पर पूरा जिला छोडकर केवल मावली मे प्रवास करते रहे।
2013 में मेरा टिकट कटवाने की बैठकों में व हस्ताक्षर अभियान में आप अग्रणी थे। आपको भरोसा दिलाया गया की मेरा टिकट कटा तो फिर आप ही हो। आप इसी आशा में जुटे, मेरा टिकट तो कटने में सफल हो गये, लेकिन आपभी टिकट से वंचित ही रहे। आपके परिजन ने मुझे कहा आप मुझसे मिलाना चाहते है, तो मैने मना कर दिया। फिर भी बार-बार आग्रह पर आपसे मिला आपने कहा पुरानी बातें भूलकर अब साथ में रहेगें, आपका भविष्य है मैं आपकी मदद करूगां।

फिर 2018में मुझे फिर टिकट से वंचित करने का प्रयास शुरू हुआ, सेक्टर चार के एक ऑफिस में हुई बैठक में आप स्वयं शामिल हुए। मुझे टिकट न देने के लिये पत्र लिखा गया, हस्ताक्षर हुए, आपने यहां सावधानी की आपने हस्ताक्षर करने के लिये यह करकर इंकार किया की मैं भाजपा छोड चुका हूं, जनता सेना के पद पर हूं, इसलिये साईन नहीें करूगां। मुझे टिकट मिला, तो मैं आपसे मिलने आया। आप स्वयं उदयपुर से भाजपा के बागी प्रत्याशी दलपत जी का चुनाव लडाने की भागदौड व उधेडबुन मे थे। फिर भी आप मुझसे मिले और कहा कोई काम हो तो बताना, मै आपके साथ हूं। फिर आप उदयपुर में दलपत जी के चुनाव प्रबधन में व्यस्त हो गये, यह सत्य है इस बार आपने मेरा विरोध नहीं किया। मैं विधायक उसके पूर्व से ही आपके पुत्र व आपके एक सहयोगी, जिसे आप सलाहकार भी मानते है, ने मेरे विरूद्ध सोशल मीडिया पर अभियान चला रखा है, जो आज भी जारी हैं, मैने कभी आपको शिकायत नहीं की। इन सभी का उत्तर देना मुझे आता है। इतना होने पर भी त्यौहारों पर आपके घर भी मिलने आया, लेकिन आप मिलने तो कभी नहीं आये, लेकिन मेरी भाई साहब, भाभी जी व काकाजी के देहावसान पर संवेदना के लिये भी नहीं आये। आपने यह भी कहा मैने किसी कार्यक्रम में आपको मावली नहीं बुलाया। 2018 से 2023 तक आप जनता सेना में थे, मावली में भाजपा की बैठकों में आपका आना संभव नहीं था। मैने व्यक्तिगत स्तर पर कोई आयोजन किया नहीें। पंचायतों आयोजन सम्बन्धित पंचायत के सरपंच तय करते थे। मैनें किसी सरपंच, ग्राम पंचायत या भाजपा मंडल अध्यक्ष के काम में दखल नहीं किया। मैंनंे किसी भी सरपंच को समारोह में फला का बुलाने या ना बुलाने के विषय में चर्चा तक नहीें की।

वैसे भी मावली में अच्छी परम्परा है, सभी पंचायतों में बिना दलगत भेदभाव के पचायतों में सभी को टूर्नामेंट व मेलों में आमं़ित्रत किया जाता है। आपने घासा पशु मेले के अतिथियों से आपका नाम मेरे द्वारा हटाने की बात कही, जो निराधार व असत्य है। यदि आपको किसी ने कहा था तो आपको मुझे बताना था, तभी समाधान हो जाता। वैसे कांग्रेस के तत्कालीन प्रधान व उपप्रधान आपके अधिक निकट थे, इसलिये आपको तो निमन्त्रण आना ही था। मैं तो घासा के मेले में केवल एक बार गया। आपने सही कहा कि अधिकांश बार कांग्रेस वालों ने आपको मावली बुलाया होगा, क्यों कि यह सही है 2008 में आपने जिन कांग्रेस प्रत्याशी की विधायक बनने में मदद की, 2019 में वे और उनके समर्थक आपको अतिथि बनाकर सम्मान क्यों नहीं करेगें? 2003-04 में आपको यूआईटी चेयरमैन का सब्जबाग दिखाया गया था , आप इसी आशा में जुटे रहे। अंततः शिवकिशोर जी यूआईटी चेयरमैन बनकर आ गये। इस बोर्ड का आपने तत्कालीन गृहमंत्री गुलाब जी कटारिया के नेतृत्व में विरोध किया। आपकी पहल पर उदयपुर शहर जिला बैठक की बैठक में राज्य सरकार प्रदेश भाजपा के सभी आयोजनों का बहिष्कार का निर्णय किया। आप बहुत समय तक मुख्यमंत्री वसुन्धरा जी व प्रदेशाध्यक्ष महेष जी शर्मा के स्वागत में भी नहीं आये। आप इस ट्रस्ट में न्यासी थे, बहुत दिनों तक आपने कहा मैं यह पद ग्रहण नहीं करूगां, कुछ दिन बाद अचानक यूआईटी जाना प्रारम्भ किया और वहां भी शिवकिशोर जी के विरोध का झंडा बुलंद किया। यद्यपि शिवकिशोर जी को चेयरमेन बनाने में मेरी कोई भूमिका नहीं थी, तथापि मैं सनाढ्य जी के कार्यभार ग्रहण समारोह में अग्रणी भूमिका में शामिल हुआ। आपने किरण जी को और मुझे सार्वजनिक गालियां देना प्रारम्भ किया, आपने ऐसी कोई गाली शायद छोडी हो, जो आपने न दी हो, आपने एक महिला की गरिमा तक नहीं रखी, हालांकि आपको जब जरूरत हुई आप वापस किरणजी की शरण में दिखे। मुझे आप द्वारा निरन्तर गालियां दिये जाने की जानकारी मिलने पर मैंने आपके निकट मित्र रणजीत जी चण्डालिया व रामजी वैष्णव के साथ समाचार भेजा था- उनको कहना 99 गालियां हो चुकी है। तब मैनें मूंछोंवाली बात भी कही थी। आपने पारस जी व दिग्विजय जी से बात की और कहा अब मैं उनके लिये कुछ नहीं कहूगां। वो बात पुरानी हो गयी, फिर भी शायद आप भूले नहीं होगें। आपने एक बार फिर अनर्गल आरोप लगाते हुए मीडिया में लगातार पांच साक्षात्कार दिये हैं। यह आपकी कुंठा व पूर्वाग्रह का प्रतीक हैं। आपने मनगढंत बाते कही, जिनका कोई आधार नहीं। साक्षात्कारों में आपके बयानों का विरोधाभास उदयपुर में हास्य व मनोविनोद का विषय बना हुआ है। मेरा निवेदन है आप मेरे धैर्य की परीक्षा न लें। आप मुझसे असहमत है, कोई बात नहीं विरोध करें, लेकिन मुद्दों पर तथ्यात्मक विरोध करें, वाणी की मर्यादा रखे, कृपया असत्य न बोले, जिससे मर्यादा बनी रहे।

2005 के भाजपा सदस्यता अभियान में आप स्वयं शहर जिले में सदस्यता का काम देख रहे थे। उस समय विजय जी विप्लवी भाजपा राणा प्रताप मण्डल के अध्यक्ष थे। उदयपुर शहर जिला में मेरे सहित अनेक प्रमुख कार्यकर्ताओं को सदस्य नहीं बनाया जा रहा था। तब श्री विप्लवी ने आपसे अपने मण्डल के लिये एक अतिरिक्त डायरी की मांग की और उस डायरी उन सभी को सदस्य बनाया। डायरी जमा कराते समय आपने कहा विप्लवी ये अच्छा नहीं किया। जब आपको हमारी सदस्यता पर ही आपत्ति थी, आप सोच रहे थे, मैं प्रभारी हूं, देखता हूं, ये सक्रीय सदस्य कैसे बनते है? विप्लवी जी ने आपकी योजना असफल कर दी। ये आपकी सोच व कार्यपद्वति का उदाहरण है।

पत्र बहुत लम्बा हो गया पढने में निश्चित ही आपको समय लग रहा है लेकिन आपके चरित्र का यह पक्ष प्रकाश में लाकर आपको स्मरण नहीं कराया तो पत्र अधूरा ही रह जायेगा। आपातकाल के समय आप सरस्वती निकेतन में कार्यरत थे। संघ पर प्रतिबंध था। प्रचारक से लेकर स्वयंसेवक तक सब संघर्ष कर रहे थे। संस्था के संस्थापक मदनलाल जी मूंदडा स्वयं जेल मे थे। इसी बीच सरकार ने स्कूल का अधिग्रहण कर लिया। मदन जी भाईसाहब के बच्चे छोटे थे, घर में कोई बडा सदस्य नहीं था। आपका दायित्व और अधिक था, आपने संघर्ष का मार्ग नहीं चुना। अपनी शिक्षण संस्था से मुंह मोडा। संघ के प्रतिबंध के खिलाफ बहुत काम था। जेल में बंद स्वयंसेवकों के परिवारों की देखभाल के साथ संगठन की सूचनाएं स्वयंसेवकों तक पहुचाने का महत्वपूर्ण काम था। आपातकाल में कई महिनों तक मदन जी भाई साहब के घर की रखवाली के लिये मैं रात उनके घर पर रहा। पुलिस ने हमें पकडा, मारा पीटा, मेरे जैसे अनेक कार्यकर्ता जब आपातकाल में संगठन की योजना से काम कर रहे थे। तब आप उदयपुर छोडकर वाटी गांव में सरकारी नौकरी में चले गये थे।
आपातकाल में आपने बडी बहादुरी दिखाई उदयपुर से बाहर दूर वाटी गांव में सरकारी शिक्षक की नौकरी ज्वाईन कर ली। वहीं से मदन जी भाईसाहब को पत्र लिखा, अपना स्कूल वापस कब मिलेगा पता नहीं ? मैंने वाटी में सरकारी नौकरी कर ली है। आपातकाल के बाद आप वापस सरस्वती निकेतन में आ गये, जिससे आपको राजनीति में काम करने का अवसर मिला, वो आपको वाटी से वापस न लाये होते तो साठ वर्ष की उम्र में 2010 में सेवानिवृत्त होकर वर्तमान में मात्र पेंशनभोगी शिक्षक होते। सरस्वती निकेतन आपने जहां पूरे जीवन नौकरी करके अपनी उदरपूर्ति की। स्कूल छोडने के समय आपने जो दुर्व्यवहार किया वो पराकाष्ठा है, पूरा शहर जानता है। मै केवल एक घटना का उल्लेख करूगां। न्यू भूपालपुरा में गजेन्द्र जी व्यास के मकान का गृह प्रवेश था। सभी प्रमुख पदाधिकारी वहां थे। आपने मदन जी को देखते ही कहा- ’’चोर बनिये, मेरी तनखा के पैसे खा गया, मेरे पैसे दे।’’ मदन जी भाईसाहब ने आपकी बात का कोई प्रतिवाद नहीें किया। आपने अपने परिवार के संरक्षक सदस्य पर सार्वजनिक रूप से यह व्यवहार किया, आपको गुरूजी कहना भी मेरी राय में गुरूजी शब्द की गरिमा पर आघात है। फिर भी आप नहीं रूके जिला प्रशासन में अपने राजनीतिक प्रभाव का उपयोग कर सरस्वती निकेतन के विरूद्ध जिला प्रशासन सतर्कता में तीन बार जांचें करवाई, आप स्कूल को दोषी नहीं ठहरा सके। फिर आप जयपुर ट्रिब्यूनल में न्याय मांगने चले गये। वहां भी आप नहीं जीते, लेकिन आपके द्वारा तीन वेतनवृद्धियां अधिक ले लेने की बात सामने आई, तो आप चुप हुए।

आपके जीवन में कृतज्ञता शब्द है ही नहीं, आपने सदैव कृतघ्नतापूर्ण व्यवहार किया। हमेशा एक ही धुन रही, चाहे जो समझौता करना पडे, इस बार कुछ बन जाऊं। लेकिन ईश्वर भी शायद नेकनियति जरूर देखता है, इसलिये उदयपुर में पार्षद बनने की आपकी तमन्ना भी मन की मन में रह गई। ईश्वर सबके साथ न्याय करे, यही प्रार्थना है।
अंत में एक निवेदन वाणी में धैर्य व मर्यादा रखें। व्यक्ति को अपने कर्म व व्यवहार से ही अपने सम्मान की रक्षा करनी पडती है, मैं भी चाहता हूं आपका सम्मान व मर्यादा बनी रहे। यदि स्वयं के गलत फैसलों से मिली असफलताओं से मानस में तनाव अधिक रहता है, तो मीडिया में अनर्गल बयानबाजी के स्थान पर किसी योग्य चिकित्सक से सलाह और उपचार लेवें।


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(धर्मनारायण जोशी)

प्रति,
श्रीमान् मांगीलाल जी जोशी
शिव सदन, कालकामाता रोड,
उदयपुर

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