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सूँघकर ली जाने वाली इंसुलिन से डायबिटीज मरीजों को बड़ी राहत, इंजेक्शन निर्भरता होगी कम, 13वां वार्षिक एंडो डायाकॉन राष्ट्रीय सम्मेलन उदयपुर में सफलतापूर्वक संपन्न

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देशभर से 25 वरिष्ठ विशेषज्ञ फैकल्टी और लगभग 200 चिकित्सकों की सहभागिता

उदयपुर। डायबिटीज और हार्मोन संबंधी रोगों के उपचार में हो रहे नवीन शोध और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों को साझा करने के उद्देश्य से एमएमएस द एंडोक्राइन एंड डायबिटीज रिसर्च ट्रस्ट के तत्वावधान में आयोजित 13वां वार्षिक एंडो डायाकॉन राष्ट्रीय सम्मेलन उदयपुर के रमाडा रिसोर्ट में दो दिवसीय कार्यक्रम के साथ सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस वैज्ञानिक सम्मेलन में देश के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों से आए 25 राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विशेषज्ञ फैकल्टी और करीब 200 डेलीगेट्स ने भाग लिया।

सम्मेलन का मुख्य आकर्षण इनहेलेशनल (सूँघकर लेने वाली) इंसुलिन रही, जिसे डायबिटीज के उपचार में एक क्रांतिकारी विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि इस नई तकनीक से मरीजों को बार-बार इंसुलिन इंजेक्शन लेने की मजबूरी से बड़ी राहत मिल सकती है, जिससे इलाज के प्रति मरीजों की स्वीकार्यता और जीवन गुणवत्ता दोनों में सुधार होगा।

सम्मेलन के दौरान कुल 9 वैज्ञानिक सत्रों का आयोजन किया गया, जिनमें डायबिटीज के आधुनिक प्रबंधन, हार्मोनल विकारों और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों पर गहन मंथन हुआ। पहले सत्र में पोस्ट-प्रांडियल यानी भोजन के बाद बढ़ने वाले ब्लड शुगर स्तर की समस्या, उसके दुष्प्रभाव और नियंत्रण के उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई।

डॉ. अतुल धिंगरा ने अपने विशेष व्याख्यान में इनहेलेशनल इंसुलिन की कार्यप्रणाली, लाभ और भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह तकनीक उन मरीजों के लिए वरदान साबित हो सकती है जो लंबे समय से रोजाना इंजेक्शन लेने से परेशान हैं।

ऑस्टियोपोरोसिस पर आयोजित विशेष सत्र में एम्स भोपाल के डॉ. अल्पेश ने उच्च जोखिम वाले मरीजों की समय पर पहचान, संदेह की स्थिति में सतर्कता और डेक्सा (DEXA) स्कैन के महत्व को रेखांकित किया। वहीं डॉ. राहुल सहलोत ने ऑस्टियोपोरोसिस के उपचार से जुड़े आधुनिक विकल्पों और दीर्घकालिक प्रबंधन पर विस्तार से जानकारी दी।

मोटापे को लेकर आयोजित पूर्ण सिम्पोजियम में विशेषज्ञों ने इसे एक गंभीर हार्मोनल और मेटाबॉलिक बीमारी बताते हुए समय पर निदान, सही मूल्यांकन, जीवनशैली में बदलाव, कैलोरी नियंत्रण और नई दवाओं जैसे टिर्जेपेटाइड (Tirzepatide) की भूमिका पर विस्तृत चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि मोटापे का सही इलाज डायबिटीज और हृदय रोग जैसी कई जटिलताओं को रोक सकता है।

सम्मेलन में हार्मोनल असंतुलन और पुरुष एवं महिला बांझपन पर भी विशेष सत्र आयोजित किए गए। डॉ. दीपक खंडेलवाल ने थायरॉयड हार्मोन विकारों का महिला प्रजनन स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता पर पड़ने वाले प्रभाव को वैज्ञानिक तथ्यों के साथ स्पष्ट किया, जिसे चिकित्सकों ने अत्यंत उपयोगी बताया।

इस राष्ट्रीय सम्मेलन में युवा चिकित्सकों और शोधकर्ताओं को भी मंच मिला। मेडिसिन के पोस्टग्रेजुएट छात्रों द्वारा 25 फ्री पेपर्स प्रस्तुत किए गए, जिससे शोध, नवाचार और अकादमिक चर्चा को प्रोत्साहन मिला।

इस भव्य आयोजन को सफल बनाने में डॉ. डी. सी. शर्मा, डॉ. एस. के. शर्मा, डॉ. संदीप कंसारा, डॉ. जय चोरडिया, डॉ. मोना सूद, डॉ. राहुल सहलोत और डॉ. विनोद बोकाडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
एमएमएस द एंडोक्राइन एंड डायबिटीज रिसर्च ट्रस्ट के चेयरमैन एवं वरिष्ठ कंसल्टेंट एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. डी. सी. शर्मा ने सम्मेलन के समापन पर सभी फैकल्टी सदस्यों, डेलीगेट्स और आयोजन समिति का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे वैज्ञानिक सम्मेलन चिकित्सा क्षेत्र में ज्ञानवर्धन के साथ-साथ मरीजों के बेहतर इलाज की दिशा में मील का पत्थर साबित होते हैं।

कुल मिलाकर, उदयपुर में आयोजित यह सम्मेलन डायबिटीज, हार्मोनल विकार और जीवनशैली संबंधी बीमारियों के आधुनिक उपचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली पहल के रूप में याद किया जाएगा।

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