24 News Update उदयपुर। कानून लागू करने वाली मशीनरी पर ही कानून तोड़ने के आरोपों ने मांडवा थाना प्रकरण को साधारण ट्रैप केस से कहीं आगे खड़ा कर दिया है। एसीबी द्वारा 8 लाख रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गए थानाधिकारी और एक कांस्टेबल के खिलाफ अब पीड़ित परिवारों ने जो एफआईआर दर्ज कराई है, उसने पूरे घटनाक्रम को नई दिशा दे दी है।
एफआईआर के मुताबिक, रिश्वत की मांग पूरी नहीं होने पर पुलिसकर्मियों ने न केवल दबाव बनाया, बल्कि कथित तौर पर घर में घुसकर 15 हजार रुपए नकद और चांदी के जेवर तक अपने कब्जे में ले लिए। विरोध के बावजूद कार्रवाई जारी रही। पीड़ितों ने यह भी आरोप लगाया है कि पुलिस की इस ‘दबिश’ के दौरान घर में बंधे बकरे को भी मार दिया गया—एक ऐसा आरोप जो इस मामले को और अधिक संवेदनशील बना देता है।
जांच से वसूली तक: कैसे बदला घटनाक्रम
20 मार्च को इलाके में सर्च के दौरान डोडा-चूरा बरामदगी के बाद दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज हुईं। कार्रवाई में सामने आए दो नाम—मानीया गमेती और नाथू गमेती—मामले के बाद से फरार बताए गए। लेकिन आरोप है कि जांच यहीं तक सीमित नहीं रही। फरार आरोपियों के परिजनों को निशाने पर लेकर दबाव बनाने का सिलसिला शुरू हुआ।
परिजनों को केस में घसीटने की चेतावनी
बार-बार गांव में दबिश और धमकियां, “नाम जोड़ने या बचाने” के बदले पैसों की मांग की,
‘रेट’ तय, फिर मोलभाव होता था। पीड़ितों के अनुसार, शुरुआत में प्रति व्यक्ति 5 लाख रुपए की मांग रखी गई। रकम नहीं जुटा पाने पर यह कथित ‘डील’ घटाकर 2 लाख रुपए प्रति व्यक्ति कर दी गई। 22 मार्च को कसारी गांव में पैसे लाने के लिए कहा गया। इसी बीच शिकायत एसीबी तक पहुंची और एक योजनाबद्ध ट्रैप बिछाया गया। जैसे ही कांस्टेबल पैसे लेने पहुंचा, टीम ने उसे पकड़ लिया।
ट्रैप के बाद बढ़ी जांच की दिशा
अब तक सामने आए तथ्यों के आधार पर मामला सिर्फ रिश्वत लेने तक सीमित नहीं रह गया है। जबरन वसूली, धमकी और कथित दुरुपयोग जैसे गंभीर पहलू भी जांच के दायरे में आ गए हैं। एसीबी की कार्रवाई के बाद विभागीय स्तर पर भी जांच तेज होने की संभावना है, क्योंकि मामला सीधे पुलिस की साख से जुड़ा हुआ है।

