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वन अधिकार के लिए ढोल-नगाड़ों संग रैली, 43% दावों पर ही पट्टे जारी; बड़े आंदोलन की चेतावनी

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24 News Update उदयपुर। उदयपुर में वन अधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग को लेकर आदिवासी समुदाय ने भीषण गर्मी के बीच जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए सैकड़ों आदिवासी महिला-पुरुषों ने ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक गीतों के साथ रैली निकालकर अपना आक्रोश जताया। ‘जंगल जमीन जन आंदोलन’ के बैनर तले आयोजित इस राज्य स्तरीय कार्यक्रम में उदयपुर, सलूम्बर, पाली, सिरोही और बारां जिलों के लोग शामिल हुए। रैली नगर निगम टाउन हॉल से शुरू होकर शहर के विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए जनजाति आयुक्त कार्यालय पहुंची, जहां आमसभा आयोजित कर प्रदर्शन किया गया।
रैली में शामिल लोग अपने वन अधिकार दावों की प्रतियां भी साथ लेकर आए और “जंगल जमीन किसकी है, हमारी है” जैसे नारों के साथ अपनी मांगें रखीं। वक्ताओं ने बताया कि राजस्थान में अब तक 1,18,667 दावे प्रस्तुत किए गए हैं, लेकिन केवल 51,775 को ही अधिकार पत्र जारी किए गए हैं, जो कुल दावों का मात्र 43.63 प्रतिशत है। सामुदायिक वन अधिकारों की स्थिति पर भी चिंता जताते हुए कहा गया कि 10 हजार से अधिक वन क्षेत्रों वाले गांवों में से सिर्फ 2088 गांवों को ही सामुदायिक अधिकार मिल पाए हैं।
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि जिन लाभार्थियों को व्यक्तिगत अधिकार पत्र मिले भी हैं, उनके नाम अब तक राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किए गए, जिससे वे सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पा रहे हैं। आंदोलन से जुड़े नेताओं ने प्रशासनिक उदासीनता पर सवाल उठाते हुए चेतावनी दी कि यदि जल्द ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो एक महीने बाद व्यापक आंदोलन छेड़ा जाएगा।
कार्यक्रम के दौरान एडवोकेट रमेश नंदवाना, लखमाराम गरासिया, रईसा राम, लखन सहरिया, विरमाराम, संयोजक धरमचंद खैर, सह-संयोजक दुर्गा खराड़ी और राजेंद्र कुमार सहित कई वक्ताओं ने संबोधित किया। अंत में प्रतिनिधिमंडल ने जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग के आयुक्त से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। आयुक्त ने लंबित दावों के निस्तारण और रिकॉर्ड अपडेट करने के लिए जल्द विशेष अभियान चलाने का आश्वासन दिया।

प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में वन अधिकार कानून को उसकी मूल भावना के अनुरूप लागू करना, लंबित दावों का शीघ्र निस्तारण, पात्र लोगों को अधिकार पत्र जारी करना, राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज करना, सामुदायिक अधिकारों का विस्तार और वन विभाग के हस्तक्षेप को सीमित करना शामिल है।

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