24 New sUpdate उदयपुर। जिले के उदयपुर के सुखेर थाना क्षेत्र में सामने आया एक सनसनीखेज मामला जमीन विवाद से कहीं आगे जाकर अब कथित तौर पर भू-माफिया, पुलिस तंत्र और राजनीतिक प्रभाव के गठजोड़ की कहानी बनता जा रहा है।
गोपाल लाल भील नामक युवक ने विशिष्ट न्यायाधीश (SC/ST एक्ट) की अदालत में परिवाद पेश कर गंभीर आरोप लगाए हैं कि उसकी वैध रूप से खरीदी गई करीब 2.09 करोड़ रुपए की कृषि भूमि पर कब्जा करने के लिए न सिर्फ दबंगों ने हमला किया, बल्कि पुलिस और प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत से उसे ही फंसा दिया गया। मामले को गंभीर मानते हुए अदालत में धारा 175(3) BNSS के तहत परिवाद प्रस्तुत किया गया। प्रारंभिक जांच में अपराध प्राइमा फेसाई पाया गया, जिसके बाद जांच नीतु राठौड़ (RPS, SC/ST सेल) को सौंपी गई है।
जमीन खरीदी, कब्जा लिया… और फिर शुरू हुआ खेल
परिवादी गोपाल लाल भील, निवासी आकोडिया कुंवालिया, जिला चित्तौड़गढ़, ने बताया कि उसने 15 अक्टूबर 2025 को भुवाणा क्षेत्र (तहसील बड़गांव) में खाता संख्या 137, आराजी नंबर 1961, रकबा 0.1000 हेक्टेयर कृषि भूमि को विधिवत पंजीकृत विक्रय पत्र के जरिए खरीदा था। विक्रेता पक्ष में कुकीबाई, चम्पाराम और नाबालिग पुनिया कुमारी (संरक्षक के माध्यम से) शामिल थे। गोपाल का दावा है कि खरीद के बाद उसे विधिवत कब्जा भी सौंप दिया गया था और वह नियमित रूप से भूमि का उपयोग कर रहा था।
26 अक्टूबर: जब खेत में घुसे हथियारबंद लोग
घटना 26 अक्टूबर 2025 की बताई गई है। परिवादी के अनुसार, जब वह अपनी जमीन की साफ-सफाई के लिए जेसीबी मशीन से काम करवा रहा था, तभी आरोपी—
हेमन्त शर्मा, सतीश जांगिड, ईरफान, कुलदीप पालीवाल, दिनेश मोनी और ब्रिज कुमावत—लाठी और कुल्हाड़ी लेकर मौके पर पहुंचे।
आरोप है कि आरोपियों ने जेसीबी का काम रुकवाया, गाली-गलौच की और खुद को “भू-माफिया” बताते हुए जमीन पर कब्जा करने की धमकी दी। उस समय मौके पर मौजूद अनवर, कालू मेघवाल, जसवंत और अफरोज के साथ भी कथित तौर पर मारपीट और अभद्र व्यवहार किया गया।
पुलिस आई… लेकिन कहानी पलट गई
मामले में सबसे गंभीर आरोप पुलिस की भूमिका पर हैं। परिवादी के अनुसार, आरोपियों ने ही सुखेर थाना पुलिस को बुलाया, जिसके बाद पुलिस ने उल्टा गोपाल के साथियों को ही पकड़ लिया और शांति भंग के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। बाद में उन्हें जमानत पर छोड़ा गया।
गोपाल का आरोप है कि जब उसने अपने दस्तावेज पेश किए, तब भी पुलिस ने कोई सुनवाई नहीं की।
जातिगत गालियां और जान से मारने की धमकी
परिवाद में उल्लेख है कि आरोपियों ने सार्वजनिक रूप से जातिसूचक गालियां दीं और कहा—“भील होकर जमीन खरीद ली… अब दिखाएंगे असली औकात।” साथ ही जान से मारने और झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकियां दी गईं।
इसी आधार पर प्रकरण में BNS की धारा 329, 126, 351, 61 तथा SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r), 3(1)(s), 3(2)(v) के तहत अपराध बताया गया है।
राजनीतिक संरक्षण और बंधक बनाकर रजिस्ट्री का आरोप
मामला यहीं खत्म नहीं होता। परिवादी ने आगे आरोप लगाया कि हेमन्त शर्मा ने कथित राजनीतिक पहुंच का उपयोग करते हुए पुलिस के साथ मिलकर उसे फर्जी FIR (नंबर 630/2025) में फंसा दिया।
गोपाल का दावा है कि उसे और मूल खातेदारों को जबरन हिरासत में लिया गया,यूनिवर्सिटी गेस्ट हाउस में बंधक बनाकर रखा गया,जान से मारने की धमकी देकर जबरन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए, और उसकी खरीदी हुई जमीन को “डमी खातेदार” गुमानाराम के नाम पर 4 दिसंबर 2025 को रजिस्ट्री करवा दी गई।
इस दौरान कुछ पुलिस अधिकारियों के नाम भी परिवाद में उल्लेखित हैं, जिन पर दबाव बनाने और प्रक्रिया में शामिल होने के आरोप लगाए गए हैं।
सवाल जो उठ खड़े हुए
यह मामला अब कई बड़े सवाल खड़े करता है— क्या वाकई भू-माफिया और सत्ता का गठजोड़ जमीन हड़पने के लिए सक्रिय है? पुलिस ने निष्पक्षता खो दी है या यह सिर्फ एक पक्ष की कहानी है? क्या SC/ST एक्ट के तहत पीड़ित को न्याय मिल पाएगा या मामला दबा दिया जाएगा? फिलहाल मामला जांचाधीन है, लेकिन आरोपों की गंभीरता ने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है। यदि परिवादी के आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह सिर्फ एक जमीन विवाद नहीं बल्कि कानून व्यवस्था और न्याय प्रणाली पर बड़ा सवाल बन सकता है।

