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काम निकलते ही टॉयलेट पेपर की तरह फेंक दिया” पाक संसद में अमेरिका पर फूटा रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का गुस्सा

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24 News Update इस्लामाबाद। अमेरिका–पाकिस्तान रिश्तों की दशकों पुरानी हकीकत पर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बुधवार को संसद के भीतर ऐसा बयान दिया, जिसने न सिर्फ वॉशिंगटन को कठघरे में खड़ा किया, बल्कि पाकिस्तान के अपने सैन्य–राजनीतिक अतीत पर भी तीखा सवाल उठा दिया।
आसिफ ने कहा कि अमेरिका ने अपने रणनीतिक फायदे के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल किया और काम निकलते ही उसे टॉयलेट पेपर की तरह फेंक दिया। रक्षा मंत्री ने अफगानिस्तान में लड़ी गई दो जंगों को पाकिस्तान की ऐतिहासिक भूल करार देते हुए कहा कि इन्हें इस्लाम और मजहब के नाम पर लड़ा गया, लेकिन असल में यह फैसले सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक और परवेज मुशर्रफ ने वैश्विक ताकतों का समर्थन हासिल करने के लिए किए।
उन्होंने 1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान में हस्तक्षेप का जिक्र करते हुए कहा कि यह कदम अफगान सरकार के निमंत्रण पर उठाया गया था, लेकिन अमेरिका ने इसे “हमला” बताकर अपनी सुविधा का नैरेटिव गढ़ा—और पाकिस्तान उस नैरेटिव का मोहरा बन गया।

9/11 के बाद की कीमत आज भी चुका रहा पाकिस्तान
ख्वाजा आसिफ ने 11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद अमेरिका के साथ खड़े होने के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि पाकिस्तान आज भी उसकी कीमत चुका रहा है।
उन्होंने साफ शब्दों में माना कि पाकिस्तान ने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया और कभी अमेरिका, कभी रूस, तो कभी ब्रिटेन की ओर झुकता रहा। नतीजा यह हुआ कि आज इन ताकतों का प्रभाव देश में पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुका है।
आतंकवाद हमारी ही गलतियों की उपज
रक्षा मंत्री ने संसद में यह स्वीकार किया कि पाकिस्तान का आतंकी अतीत रहा है। उन्होंने कहा, “आज देश में जो आतंकवाद है, वह अफगानिस्तान की जंगों में शामिल होने और सैन्य शासकों की नीतियों का ही नतीजा है।” आसिफ ने यह भी कहा कि पाकिस्तान को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।

जंग को जायज ठहराने के लिए बदला गया शिक्षा तंत्र
आसिफ का सबसे गंभीर आरोप यह रहा कि इन युद्धों को सही ठहराने के लिए पाकिस्तान की शिक्षा प्रणाली में जानबूझकर बदलाव किए गए, और वे बदलाव आज भी सिस्टम में जिंदा हैं।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अपनी गलतियों को स्वीकार करने से बचता रहा—और यही सबसे बड़ी त्रासदी है।

क्लिंटन का ‘कुछ घंटों का पाकिस्तान’
रक्षा मंत्री ने वर्ष 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की इस्लामाबाद यात्रा का हवाला देते हुए कहा कि भारत दौरे के बाद क्लिंटन का पाकिस्तान में कुछ घंटों के लिए रुकना इस बात का साफ संकेत था कि दोनों देशों का रिश्ता सिर्फ जरूरत तक सीमित था।
उस समय पाकिस्तान में लोकतंत्र नहीं, बल्कि परवेज मुशर्रफ का सैन्य शासन था।

शिया मस्जिद हमले की निंदा, राजनीतिक एकता की अपील
यह बयान ऐसे समय आया है, जब संसद ने इस्लामाबाद की शिया मस्जिद में हुए आत्मघाती हमले के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया। 6 फरवरी को हुए इस हमले में 31 लोगों की मौत और 169 के घायल होने की पुष्टि हुई है। हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली है। आसिफ ने राजनीतिक दलों से अपील की कि आतंकवाद जैसे मुद्दे पर भी अगर देश एकजुट नहीं हो सकता, तो यह राष्ट्रीय विफलता है।

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